Homeगुजरातजो अग्नि मय हो जाता है उसको कोई रोग नहीं होता,जरा-बुढ़ापा नहीं...

जो अग्नि मय हो जाता है उसको कोई रोग नहीं होता,जरा-बुढ़ापा नहीं आता और मृत्यु मार नहीं सकती।।

परीक्षित ने गंगा,साधु-संतो और शुकदेव का संग किया है।।

हर एक प्रश्न का उत्तर रामचरितमानस में है।।

मनुष्य शरीर कमौसमी फूल है।।

८४ लाख योनि में कभी-कभी मनुष्यत्व का फूल खिलता है।।

साधु मिल जाए तो साधुता ही मांगना।।

“मोक्ष मेरा लक्ष्य नहीं,स्वर्ग और मुक्ति मेरा लक्ष्य नहीं साधुता मेरा लक्ष्य है।।”

कृष्ण स्वयं महारोग है।।

जहां निरंतर भागवती गंगा और भागीरथि गंगा बह रही है ऐसे शुक्रताल पर चल रही रामकथा शुक्रवार को आठवें दिन में प्रवेश कर रही है तब आरंभ में बापु की कथाओं का सार दोहन कर के जो गुजराती,हिन्दी और अंग्रेजी भाषा में प्रकट किया जाता है ऐसी एक कथा-मानस गरुड (तिरुवनंतपुरम-केरल) में गाइगइ थी वो कथा सार संचय पुस्तक संकलन कार एवं संपादक नीतिनवडगामा द्वारा व्यास पीठ को अर्पण किया गया।।

यहां दिव्य और सेव्य भूमि पर आयोजित रामकथा में शुकदेव जी का परिचय और परीक्षित का उपनिषदीय परिचय के लिए जो श्लोक लिखा गया है और अवधूत शिरोमणि शुकदेव जी की स्थिति का वर्णन भी किया है वह बापू ने कहने से पहले यह बताया की रामचरितमानस पक्षीतीर्थहै।जो आगे भी बताया।।हर एक वक्ता और हर एक श्रोता मानस में पक्षी है।।यह पक्षी-पक्षी का संवाद है।तुलसी जी ने अपने ग्रंथो में कभी अपने को पक्षी कहां था?हां,कहते हैं,स्पष्ट शब्दों में लिखा है:

एक भरोसो एक बल एक आशा बिश्वास।

एक राम घनश्याम हित,चातक तुलसीदास।।

मेरा राम घनश्याम है,मैं उसका चातक हूं।।

जहां तक गुरुदत्त बुद्धि मेरी पहुंची है हर एक प्रश्न का उत्तर रामचरितमानस में है।।

भगवान शंकर पक्षी है।शिव जी ने कहा है मैं हंस बनकर भूसुंडी को सुनने के लिए गया।पार्वती क्या पक्षी है?वाल्मीकि जी कोकिल है और वही लिखते हैं जो राम-राम रटते हैं निरंतर उनकी जीभ, वह हंसिनीहै।।और जैसे चतुर्भुज विग्रह है वैसे:

जय जयगिरिवर राज किशोरी।

जय महेश मुख चंद्र चकोरी।।

तो पार्वती जी भी पक्षी है।

बापू ने एक श्लोक प्रस्तुत किया:

“न तस्यरोगो न जरा न मृत्युः

प्राप्तस्ययोगाग्निमयंशरीरम्”

[श्वेताश्वतरोपनिषद] का यह श्लोक बताता है कि जब योगी को ‘योगाग्निमय शरीर’ प्राप्त हो जाता है, तो उसे रोग (बीमारी),जरा (बुढ़ापा) और मृत्यु का भय नहीं रहता। योगाभ्यास से शरीर तपा हुआ और शुद्ध हो जाता है,जिससे वह इन तीन दुखों से मुक्त हो जाता है।

योग अग्नि साधक को बहुत चमकीला बना देता है। शास्त्रों में योग भी अग्नि है और भगवद गीता में ज्ञान भी अग्नि है।ज्ञानरोम-रोम में लग जाए वह अग्नि है एक वियोग का अग्नि।कृष्ण के वियोग विरह में गोपियों को अग्नि लग गया है।या तो व्यास को अपने पुत्र का विरह है।प्रेम को भी अग्नि कहा है। ऐसे जिसका शरीर अग्नि स्वरूप हो जाता है।भीतर तो अग्नि है ही,मूल में अग्नि ही तत्व है जैसे सूर्य।।जो अग्नि मय हो जाता है उसको कोई रोग नहीं होता,जरा बुढ़ापा नहीं आता और मृत्यु मार नहीं सकती।।

परीक्षित को यह अग्नि लागू हो गया।यहां तीव्र भक्ति योग हुआ है।।तीन का संग हो गया है इसलिए बुढ़ापा-जरा,रोग और मृत्यु नहीं आई।शरीर को मत देखो शरीर तो पांच भौतिक है।अंदर का जो सूक्ष्म शरीर है उसे कोई रोग नहीं होता।। गंगा औषधि है, सवाल श्रद्धा का है।।परमात्मा का दर्शन,स्मरण कपट नहीं रहने देगा।मनुष्य शरीर कमौसमी फूल है ८४ लाख योनि में कभी-कभी मनुष्यत्व का फूल खिलता है।। साधु मिल जाए तो साधुता ही मांगना मोक्ष मेरा लक्ष्य नहीं,स्वर्ग और मुक्ति मेरा लक्ष्य नहीं साधुता मेरा लक्ष्य है।।परीक्षित का शरीर ऐसा हो गया।उन्हें तीन का संग किया है।हर नदी को में प्रवाह मान ईश्वर मानता हूं तो गंगा का तो कहना ही क्या! परीक्षित को गंगा का संग हुआ,इतने साधु संतो का भागवत कथा के पहले दर्शन हुआ और नक्षत्र के बीच में जैसे चंद्रमा शोभाईमान हो ऐसे व्यास पुत्र शुक मिल गए।।

और शुकदेव जी का दर्शन कैसा है?१६ साल की बाल उम्र है।।उर्ध्व में तीन रेखा है। पेट अंदर और वक्ष स्थल बाहर है।।सप्रमाण शरीर है। आंख तो देखते ही रहे! वितरागी वेश है। उपनिषद के अर्थ में वजन बिल्कुल नहीं यह योगी का परिचय है।। गिरिराज-गोवर्धन गिरीयों का योगीओं का राजा है। कृष्ण आखिरी उंगली से उठा लेते हैं क्योंकि उसको वजन नहीं है।जो बड़ा होता है उसका वजन नहीं होता।।

यहां की यह छठ्ठी कथा है,बापू ने कहा कि अभी और एक कथा गाने का मनोरथ है क्योंकि शुकदेव जी ७ दिन बैठे हैं हम भी सात कथा करें।।

शुकदेव में कोई रोग नहीं है। हां कृष्ण ने रोग लगा दिया।उत्तम श्लोक कृष्ण चरित्र ने शुकदेव जी को पकड़ा है।।कृष्ण स्वयं महारोग है।।

शुकदेव जी अलोलुप्त लोभ रहित,देह कांति से अद्भुत है। पका हुआ स्वर सौष्ठवहै।शरीर में से शुभ की खुशबू आती है। एकमात्र योग प्रवृत्ति में रत है सब कुछ शुक में नजर आता है।।

फिर कागभुशुंडी जी के न्याय से संक्षिप्त में अयोध्या कांड का गान करके आज की कथा को विराम दिया गया।।

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