Homeगुजरातरथयात्रा का विषय बहिर यात्रा नहीं, अंतर यात्रा से जुड़ा है।।

रथयात्रा का विषय बहिर यात्रा नहीं, अंतर यात्रा से जुड़ा है।।

पुण्य से पाप को,फिर पुण्य के अहंकार को हरि की कृपा से धोना पड़ता है,साबुन भी निकल जाना चाहिए।।

गाथा लिखी जाती है,कथा कथी-जानी जाती है। गाथा के केंद्र में भाषा है,कथा के केंद्र में भाव है। गाथा निबंध प्रबंध है,कथा संबंध है।।

गाथा की सीमा होती है,कथा असीम होती है।।

गाथा लेन देन है,कथा पुण्य से मिलती है।।

गाथा का पूजन होता है,कथा का सेवन होता है।। गुरु का पूजन ही नहीं सेवन करना चाहिए,गुरु परम औषधि है।।

कथा तत्व हमारे अंदर के रावणत्व को हरा देता है।।

 गाथा मंगल करनी है और कथा कलीमल हरनि है।।

चाय के खूबसूरत बगीचें और प्राकृतिक सुंदरता से भरी भरी केरिचो(केन्या) की भूमि पर बह रही रामकथा धारा सोमवार तिसरे दिन में पहुंची तब कथा के आरंभ में रामकथाओं का सारदोहन करते संपादक संकलन कार नीतिनभाइ वडगामा की और से संपादित हुइ ‘मानस क्षमा'(जामनगर कथा) पुस्तिका बापु के शुध्ध हस्तों से व्यासपीठार्पित और ब्रह्मार्पित हुइ।।नीतिनभाइ ने ये कथा प्रसाद के बारे में अपने शब्द पुष्प भी रख्खे।।

यहां होते संध्या कार्यक्रमों में विचारक और हास्य कलाकार डॉक्टर,पद्मश्री जगदीश भाई त्रिवेदी अपने विद्या से बिल्कुल अहेतु भाव से जो कुछ अर्पण कर देते हैं इसी श्रृंखला में एक परिवार ने केरिचो में ११ पुस्तकालय करने का संकल्प किया।इनमें से एक का विधि वत लोकार्पण कल शाम हुआ।।

बापू ने दाताओं को साधुवाद दिया और जगदीश भाई का संकल्प ११ करोड रुपए इकट्ठे करने का था जो आरोग्य,विद्या,कला जैसी संस्था को दे देते हैं लेकिन अब २५-करोड़ से ज्यादा की राशि हो गई है और सात्विक कार्यक्रम चलाते रहते हैं।।कठोपनिषद का एक मंत्र जो रथ का रूपक है वहां से आरंभ किया गया:

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।

बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥

-कठोपनिषद(१.३.३)

यह श्लोक में यम नचिकेता को आत्मज्ञान का उपदेश देते हैं।

रथ रूपक के माध्यम से मानव जीवन के तत्वों को समझाता है।

आत्मा को रथी (स्वामी) समझो,शरीर को रथ ही मानो।

बुद्धि को सारथी (चालक) जानो और मन को लगाम समझो।

भावार्थ और व्याख्या: यह श्लोक जीवन को रथ की यात्रा के रूपक से दर्शाता है:आत्मा मालिक है, शरीर आत्मा मोवाहन, बुद्धि ड्राइवर, मन लगाम, इन्द्रियाँ घोड़े तथा विषय उनके रास्ते। बुद्धि द्वारा मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण से मोक्ष तक पहुँचती है।

यह रूपक हमारे जीवन के प्रबंधन और मन इंद्रियों पर नियंत्रण के महत्व को दर्शाता है।।रथयात्रा का विषय बहिर यात्रा नहीं,अंतर यात्रा से जुड़ा है।।यहां मानस हृदय जुड़ा है।।भागवत में देह का रूपक जो ह्रदय में मिलता है।यह रथ यात्रा तत्वत: अंतर यात्रा है।। महाभारत के रथ का सारथी ईश्वर है,यहां सारथी ईश्वरभजन है।।वह सारथी निरंतर रथी को हतोत्साहित करता है।।सारथी हरा भी सकता है जीता भी सकता है।।स्वर्ग का रथ,मातली,बुद्ध के रथ का सारथी और राम जी दशरथ के रथ का सारथी सुमंत,सूर्य के रथ का सारथी अरुण।। लंका कांड के रथ का सारथी इश भजन है।।

सारथी के तीन कर्तव्य होते हैं:घोडों को काबू में रखना,लक्ष्य तक ले जाना और रथी को इजा ना पहुंचे वह ध्यान रखना।।कृष्ण ५-वस्तु का ध्यान रखते हैं।ईश्वर भजन सात वस्तु से हमारी रक्षा करता है।।

मानसिक सुख पांच प्रकार के होते हैं।किसी व्यक्ति के अच्छे शब्द सुनते ही सुख प्राप्त होता है।।बौद्धिक सुख विद्वानों एक दूसरे को मिलने से पाते हैं।।चैतसिक सुख योग की क्रिया में जाता है।। अहंकारी अभिमानी सुख पैसों का,धन का,बल का सत्ता का,तेजस्ववती पना और विद्या का होता है।। पुण्य से पाप को,फिर पुण्य के अहंकार को हरि की कृपा से धोना पड़ता है,साबुन भी निकल जाना चाहिए।।

विवेक रूपी बुद्धि से आंखें,कान,कहां जाते हैं वह देखना और अहंकार नहीं करना फिर परमात्मा तक हमें पहुंचा देना।।

रथयात्रा में घोड़े नहीं होते,लगाम नहीं,सारथी भी नहीं,केवल रथी है।। बलभद्र,सुभद्रा और जगभद्र है क्योंकि रथ यात्रा के रथ को चलाना नहीं,खींचना होता है।।अंतर यात्रा का रथ हमें खुद को खींचना पड़ेगा।बुद्ध की वाणी में अप्प दीपो भव है। बहिर यात्रा नहीं हृदय यात्रा करना है।।धर्म बहिर हो गया छाप तिलक में समा गया।।धर्म की हानि हुई उसी की ग्लानी होती है।।

रथी तीन है:जगन्नाथ ज्ञान,बलभद्र वैराग्य और सुभद्रा भक्ति करुणा।।गोरखनाथ कहते हैं:

करनी करे सो शिष्य है, वेद पड़े सो नाती।

रहनी में रहे वो गुरु हमारा।।

रामचरितमानस के दो शब्द गाथा और कथा में अंतर है।।गाथा लिखी जाती है,कथा कथी-जानी जाती है। गाथा के केंद्र में भाषा है,कथा के केंद्र में भाव है। गाथा निबंध प्रबंध है,कथा संबंध है।।गाथा की सीमा होती है,कथा असीम होती है।।गाथा लेन देन है,कथा पुण्य से मिलती है।।गाथा का पूजन होता है,कथा का सेवन होता है।। गुरु का पूजन ही नहीं सेवन करना चाहिए,गुरु परम औषधि है।।कथा तत्व हमारे अंदर के रावणत्व को हरा देता है।। गाथा मंगल करनी है और कथा कलीमल हरनि है।।

शिव चरित्र का वर्णन करते हुए शिव पार्वती के विवाह तक और पार्वती की विदाई तक का करूण प्रसंग भी बापू ने छेड़ा और अपने दादा गुरु और मां की याद को भीगी आंखो से बापू ने सबको भिगोया।।

== समाप्त ==

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read