
जिनको साधु संग,सत्संगति अति प्यारी है वो सब भगवद कथा के अधिकारी है।।
मैं कंठी देने वाला नहीं तुम्हारे कंठ में बैठ जाने वाला साधु हूं।।
“मैं कोई कसौटी नहीं करता,प्रेम परीक्षा भी नहीं करता,यह मेरा स्वभाव भी नहीं”:बापु।।
परम साधु पंचशील से सुशोभित होता है।।
आध्यात्मिक और ऐतिहासिक भूमि से त्रिभुवन को *बीलकूल सादगी से राम जन्म की बधाइयां दी गइ।।
सूर्य पुत्री यमुना नदी के तट पर बसी आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक नगरी अग्रवन-आग्रा की भूमि से रामकथा के छठ्ठे कदम रविवार को कथा के आरंभ में एक छोटा सा प्रकल्प हुआ।चित्रकूट धाम ट्रस्ट तलगाजरडा द्वारा प्रकाशित तीन पुस्तिकाओं का लोकार्पण-ब्रह्मापण किया गया।।
बापू की राम कथा का सार दोहन करते हुए जब बापू ने आग्रा में २००३ में ‘मानस तेज महल’ कथा का गान किया था।इस कथा को पत्रकार-लेखक तखूभा सांडसूर ने सारांश और संपादन किया था।।उन्हीं के हस्तों बापू को यह पुस्तिका अर्पण की गई।।
‘मानस सनातन धर्म'(दिल्ली कथा) का संपादन, पुस्तिका ललित गुप्ता,संजीव जैन,अंशुल गुप्ता के हस्तों और ‘मानस हरिजन'(दिल्ली कथा)-जब महात्मा गांधी जी की सार्ध जन्म शताब्दी मनाई जा रही थी।।वो पुस्तिका ब्रह्मार्पित हूइ।।
यह सार दोहन भी अमूल्य है और संपादन कर्ता नितिन भाई वडगामा ने बताया कि वह तलगाजरडा के के हनुमान जी की प्रसादी जी के रूप में घर बैठे भी फ्री प्राप्त की जा सकती है।मूल्य कुछ नहि लेकिन यह अमूल्य है।।जो नीतिनभाइ ने बापुं के शुध्ध हस्तों से ब्रह्मार्पित की।।
कथा का आरंभ करते हुए बापू ने बताया कि २३ साल पहले जिस भूमि पर तलगाजरडी व्यास पीठ ने ‘मानस तेज महल’ का गान किया था और जहां यमुना के तट पर यह शहर बसा है वह आग्रा में आग(जिज्ञासा) और राग(आकर्षण) भी है।ऐसी अध्यात्मिक ऐतिहासिक नगरी में भगवत कृपा से मनोरथी परिवार की ओर से स्वांत: सुखाय आयोजन हुआ है इस बात का बापू ने हर्ष व्यक्त किया।।
बापू ने कहा कि दो दिन से बार-बार पूछा जा रहा है कि बापू अपने अधिकारी शब्द की चर्चा की है।वैसे पहले दिन भी मैंने बताया था कि मनोरथी इस कथा का अधिकारी है।।तो अधिकारी का मतलब क्या है? २३ साल से यह बंदा पूछता रहता था,आग्रा को कब कथा देंगे?मैं कोई कसौटी नहीं करता।प्रेम परीक्षा भी नहीं करता।यह मेरा स्वभाव भी नहीं और औकात भी नहीं।लेकिन अस्तित्व कथा को टालता गया और
नए-नए परिंदों को उड़ने में वक्त तो लगता है! सब भगवद कथा के अधिकारी हैं जिनको साधु संग, सत्संगति अति प्यारी है।।यह शास्त्रीय नहीं साध्वीय व्याख्या है।।
बापू ने ‘अधिकारी’ शब्द को व्याख्याित करते हुए कहा:अ-अभिमान मुक्त।जो अहंकार से मुक्त रहकर कथा सुनेगा और आयोजन करेगा।।
अब दो कथा होने जा रही है:स्वास्तिक कथा है।एक कालड़ी से केदार(दक्षिण से उत्तर) और दूसरी द्वारिका से जगन्नाथ (पश्चिम से पूर्व) वहां जो भी पसंद हुए हैं वह दूसरों को जलाने के लिए यह ना कहे की मैं पसंद हुआ हुं।क्योंकि यह अहंकार और अभिमान की घोषणा है।।
धि-बुद्धि पूर्वक जो सुनेगा।।मैं कंठी देने वाला नहीं तुम्हारे कंठ में बैठ जाने वाला साधु हूं।।
का-जो भी करो पीछे कारण को मत भूलो।।और कभी कृपा भी कारण होती है।।
री-आयोजन रीति पूर्वक हो।।
बापू ने यह भी बताया कि परम साधु में पंचशील होते हैं।।वह पंचशील से सुशोभित होता है।यह बौद्ध कालीन शब्द है।
एक-धर्मशील:साधु केवल धार्मिक नहीं,धर्मशील होना चाहिए।।
दो-कर्मशील:प्रमादी नहीं होना चाहिए।।
तीन-करुणा शील:संवेदना होनी चाहिए।।
चार-बलशील:हनुमान जी की तरह बल का भी शील हो।।
पांच-साधु प्रेमशील होना चाहिए।।
फिर पार्वती जिज्ञासा करती है और शिवजी राम जन्म के हेतु बताते हैं।।बिना हेतु भी ईश्वर प्रकट होते हैं।संक्षिप्त में सभी हेतुओं को दिखाकर अयोध्या की भूमि पर श्रृंगी ऋषि द्वारा यज्ञ होता है।।राजा दशरथ के द्वारा सभी रानियां को यज्ञ की प्रसादी के रूप में मिली खीर बांटी जाती है और समय बीतने के बाद अयोध्या के महल में,मॉं कौशल्या की कोख में भगवान राम अवतरित होते हैं।।जब नारायण स्वरूप भगवान का अवतरण हुआ और मां कौशल्या उसे मनुष्य बनाने के लिए चार में से दो भुजा वाले ईश्वर बनाती हैं।।छोटे होते होते बालक की तरह प्रभु रुदन करते हैं और यह रुदन सुनकर पूरी अयोध्या,पूरे ब्रह्मांड और त्रिभुवन में भगवान राम का प्रागट्य होता है।।
आज इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक भूमि अग्रवन आग्रा से राम जन्म के प्रागट्य उत्सव बहुत सादगी भरे रूप से मनाते हुए त्रिभुवन को राम जन्म की बधाई देते हुए आज की कथा को विराम दिया गया।।
== समाप्त ==

