Homeगुजरातपरम अस्तित्व का एक स्वभाव है वह है-साधु।।

परम अस्तित्व का एक स्वभाव है वह है-साधु।।

मुक्ति बांटने वाले ही सबको बांधते रहे हैं,कभी तिलक से,कभी कंठी से बांधते हैं।।

जिसको कितना भी दुख पड़े फिर भी कभी उद्वेग ना पड़े,सुख में जो छलके नहीं वो मुनि।।

जो भय और क्रोध से मुक्त रहे,सत्य की साधना के कारण किसी का भय नहीं वह स्थिर बुद्धि वाला मुनि है।।

सबके कल्याण के लिए जीवन जीता हो,कोई द्वेष,अवढव नहि,सबके शुभ के लिए जो सांस लेता हो उसे ऋषि कहते हैं।।

वैष्णव के पास तीन वस्तु होनी चाहिए:विवेक,धैर्य और आश्रय।।

रामकथा अमूल्य है,फिर भी ‘मुफ्त’ है।।

त्याग मतलब कुछ छोड़ना नहीं,श्रेष्ठ को पकड़ो वह त्याग है।।

 

यमुना जी के तट पर बसी आध्यात्मिक और ऐतिहासिक नगरी अग्रवन-आग्रा में गाइ जा रही रामकथा ने सोमवार को सातवें दिन में प्रवेश किया तब सबसे पहले एक विनय की बात बताई।

बापू ने कहा कि जब बहुत बात आगे बढ़ती है तो मैं यह स्पष्टा करता हूं।।कई लोग ऐसा समझते हैं, मानते हैं या ऐसा प्रचार करते हैं कि बापू की कथा में आगे बैठने के चार्ज ₹5000 है! यह सब भ्रामक बातें हैं।।स्पष्ट करूं कि यहां कोई चार्ज नहीं।व्यवस्था मैंने नहीं कि,मैंने किसी को नियुक्त नहीं किया है।अपने आप सब जुड़े हैं।और ऐसा कुछ होता हो तो भी किसी को पैसे मत देना।।

मैंने किसी की नियुक्ति नहीं की।।

बापू ने सब गायक लोग की पूरी टीम का परिचय करवाते हुए कहा कि इनमें से जब विनुभाई सामने से कहे कि मैं हारमोनियम बजावुं।मैंने नियुक्त नहीं किया और सब कई सालों से जूड़ते गए वह पूरा परिचय बापू ने करवाया।।

यह भी कहा कि मैंने 14 साल की उम्र से कथा की शुरुआत की तब से अकेला ही जाता आता-जाता रहा।।मेरी व्यासपीठ कभी किसी को बांधती नहीं। किसी को निकल जाना है तो उतने ही सन्मान से जा भी सकते हैं।।

मुक्ति बांटने वाले ही सबको बांधते रहे हैं,कभी तिलक से,कभी कंठी से बांधते हैं।।

यहां बैठने का,भोजन का,सुनने का कोई चार्ज नहीं आप रिचार्ज हो इसलिए आओ।।

मेरी व्यास पीठ को मूल रूप में आप कब समझोगे! प्यास पीठ का मूल स्वभाव क्या है।।

जब साधु शब्द आता है तो मैं कहता हूं साधु संज्ञा नहीं,नाम नहीं,विशेषण,क्रियापद,कर्म,कृदंत नहीं, साधु एक स्वभाव है।।

परम अस्तित्व का एक स्वभाव है वह है-साधु।।

और गोस्वामी जी ने कहा तो बल मिलता है:

सरल सुभावु न मन कुटिलाइ।

जथा लाभ संतोष सदाइ।।

बापू ने कहा कि मेरे यज्ञकुंड के पास जो भी चीज आती कभी मेरे कमरे में कुटिया में नहीं जाती।। क्योंकि यह स्वभाव नहीं।।

गीता में मुनि और ऋषि की व्याख्या करीब 20 बार आई।।जिसको कितना भी दुख पड़े फिर भी कभी उद्वेग ना पड़े,सुख में जो छलके नहीं।।जो भय और क्रोध से मुक्त रहे,सत्य की साधना के कारण किसी का भय नहीं वह स्थिर बुद्धि वाला मुनि है।।

सबके कल्याण के लिए जीवन जीता हो,कोई द्वेष,अवढव नहि,सबके शुभ के लिए जो सांस लेता हो उसे ऋषि कहते हैं।।

महाप्रभु जी ने कहा है कि वैष्णव के पास तीन वस्तु होनी चाहिए:विवेक,धैर्य और आश्रय।।

धैर्य की कसौटी आपातकाल में होती है।सब विपरीत चले तब धैर्य की कसौटी होती है।।राम को रणरंगधीर कहा।। जो समाज के द्वैतों के बीच में भी स्थिर दिखे।।रण में भी जो धीर रहे।।

यदि यह भी ना बने तो किसी महापुरुष का आश्रय करो।। तप त्याग के बिना नहीं होता और त्याग श्रेष्ठ को पकड़े बिना नहीं आता।। त्याग मतलब कुछ छोड़ना नहीं,श्रेष्ठ को पकड़ो वह त्याग है।।

रामनाम,रामकथा पकड़ो वह त्याग है।।

बुद्ध ने कही आठ प्रकार की सम्यक्ता साधु में होती है।।साधु सम्यक वचन,सम्यक आहार,सम्यक  व्यायाम,सम्यक विहार-ऐसा मध्य की महिमा भगवान बुद्ध बताते हैं।।

गुजराती अखबार फूलछाब के पूर्व तंत्री कौशिकभाइ महेता ने साधु शब्द पर अपने भाव रखे है:

दुनिया की उसे क्या पडी है।

दुनिया को चीलम में भरकर फूंक देता है साधु।।

सप्तर्षियों में हमारे सप्तर्षि देवर्षि नारद भी है और २०० साल पुरानी एक पुस्तक सनातन धर्म का वहां ऋषियों की यादि में सबसे पहले भारद्वाज ऋषि का नाम बताया है।।

मुजे तीन कोने मिले है:एक घर का कोना जहां मानस पढता था।दूसरा रामजी मंदिर का कोना जहां दादा जी बैठते थे।तीसरा सावित्री मॉं की आंखो का कोना।ये कोने से मैं धन्य हुआ हुं।।

गुजराती में लिखा है:

अनुभवी ने एटलुं,आनंद मां रहेवुं।

समरवां श्री हरि ने कोइ ने कांय न कहेवुं।।

भारद्वाज की दो विशेषता है:शरीर चिकित्सा आयुर्वेद के आचार्य और व्याकरण के आचार्य है। दूसरे महापुरुष महर्षि कुंभज-अगस्त्य।।जन्म घडे से हुआ लेकिन तीन अंजलि में पूरे समुद्र को पी गए।। सांख्याचार्य कपिल महाराज,सुश्रुत भी है जो आरोग्य के ऋषि है,सुश्रुत संहिता ग्रंथ लिखा है। चरक महाराज ने चरक संहिता की रचना की। कश्यप के नाम से भी संहिता है।।स्मृतिकार मनु जो हमारे आदि पुरुष है।।बीच के काल में कोई क्षेपक डाला गया और मनु को बदनाम भी किया गया है।। मनुज जन्म में हम सब मनुष्य है।।वशिष्ठ आदि आधुनिक ऋषियों की याद करें तो बौध कालीन नागार्जुन जो रसायन शास्त्री था और शून्य पर संशोधन किया है।।हम सबको याद करके आने वाले श्राद्ध के दिनों से पहले रूसियों को एडवांस में श्राद्ध करते हैं।।

राम जन्म के बाद अयोध्या में एक महीने का उत्सव रहा।।शिवजी ज्योतिष बनाकर भुशुंडी को चेला बनाकर राम को देखने के लिए अयोध्या गए।। नामकरण संस्कार हुआ।।राम तो आदि अनादि है दशरथ के घर आए सगुन अवतार को राम नाम दिया गया।। चारों भाई के वैश्विक नाम वशिष्ठ के द्वारा रखे गए।।फिर विश्वामित्र के साथ राम की यात्रा होती है।।

वहां जन्म से सीता,शक्ति,शांति,श्रध्धा तक की यात्रा के पांच विघ्नों में पहले घर के किसी आदमी की ममता का विरोध,फिर बीच में राक्षसी आई उन का वध किया और जनकपुर के धनुष्य भंग,सिता विवाह और चारों भाइओं के विवाह के बाद विश्वामित्र का अयोध्या से पुन: वनगमन गा कर बालकॉंड का समापन हुआ।।

== समाप्त ==

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