भाषा और भाव भी संयुक्त है।।
सुख और दुख भी संयुक्त है।।
सुख के केंद्र में ही दुख और दुख के केंद्र में सुख होता है।।
किसी के प्रभाव में मत आओ,लेकिन सामने वाले का स्वभाव जान लो।।
शरीर का मूल प्राण है,वेद का प्राण राम है।।
शास्त्र का सूर और सार उनके सम पर है।।
पीरारी,विरारी,धोरारी कच्छ धरा के कोटेश्वर में प्रवाहित रामकथा के सातवें दिन कथा के आरंभ में विश्व मातृभाषा दिन पर सभी साहित्य संस्थाओं मातृभाषा का दिन मना रही है।।बापू ने कहा मातृभाषा का गौरव गान करना चाहिए।कच्छ के पास अपनी भाषा है। देश की विश्व की सभी मातृभाषाओं को नमन करते हुए बापू ने गुजराती भाषा के कवियों के लिखे शब्द भी यहां पर पढे और कहा कि अपनी भाषा का गौरव होना चाहिए, लेकिन किसी की मातृभाषा का अपमान मत करो।। अपनी भाषा का गौरव गान जरूर करो।।
यह कलापी,आद्य कवि नरसिंह मेहता और हरिंद्रदवे सुरेश दलाल की मातृभाषा है।।जैसे कीचड़ और जल संयुक्त है वैसे भाषा और भाव भी संयुक्त है।। साहित्य दर्पण कहता है सुख और दुख भी संयुक्त है सुख के केंद्र में ही दुख और दुख के केंद्र में सुख होता है।।किसी के प्रभाव में मत आओ लेकिन सामने वाले का स्वभाव जान लो।।
रामचरितमानस में राम का स्वभाव भरत ने पहचाना है,राम का प्रभाव लक्ष्मण ने जाना है और कोलकीरात अपने अभाव को जानते हैं।।शबरी कहती है मैं कैसे स्तुति करूं मैं अधम हूं! कोलकीरतभील वनवासी फूल फल और बैर के पडिए भर भर के अयोध्या वासियों को देते हैं और सामने से कुछ लेते नहीं।।
स्वभाव का दर्शन कभी साधु के स्वरूप में मिलता है शरीर का मूल प्राण है।।वेद का प्राण राम है।। शास्त्र का सूर और सार उनके सम पर है।। यदि हम ईश्वर के अंश ना होते तो दुख आते ही नहीं! जहां चेतन होता है वहीं दुख है।।मन है इसलिए सुख-दुख है।। राम ईश्वर है। राम रूप, कृष्ण रूप, शिव रूप,दुर्गा रूप,गणेश रूप, हनुमान रूप साधु जो मिले तो उनकी पीड़ा को परखों।। ऐसे राम रूप साधु के पांच लक्षण होते हैं: प्रतिक्षा-वो किसी की राह देखते हैं। हनुमान जी साधु है,साधु संत के रक्षक है।। हनुमान जी को ईश्वर कहा है। वाल्मीकि रामायण में हनुमान कहते हैं मैं स्वयं ईश्वर होने के बावजूद सीता की रक्षा नहीं कर पाया मेरे राजसी भाव को धिक्कार हो! परीक्षा- होती है साधु की परीक्षा बहुत होती है।। समीक्षा: साधु की समीक्षा हुई है, होनी चाहिए, समीक्षा आवकार्यहै।।उपेक्षा: लोग साधु की उपेक्षा भी करते हैं।। तितिक्षा: बहुत सहन करना पड़ता है। जितने भी दुख आए प्रतिकार किए बगैर स्विकार करके, सहन करना।। शोक ना करना और विलाप ना करना वह तितिक्षा है।।
भगवान राम कृष्ण और हनुमान के जीवन में ऐसी कसौटी आई है।। ईश्वर रूप साधु पर पांच संकट आते हैं: धर्म संकट, प्राण संकट, पारिवारिक संकट, राष्ट्र संकट और सामाजिक संकट।। राष्ट्र संकट आने पर सच्चा साधु अलिप्त नहीं रहता।। प्राण संकट और राष्ट्र संकट के निवारण के लिए वेद गान करना पड़ता है। प्राण संकट के निवारण के लिए वचन का पालन करना पड़ता है। धर्म संकट वेद गान से राष्ट्र संकट भी वेद गान से दूर हो सकते हैं।। शस्त्र से शास्त्रा का महत्व ज्यादा है।। शस्त्र बूठ्ठे हो सकते हैं। शस्त्र काटे जा सकते हैं,शास्त्र अकाट्य है।। सामाजिक संकट दूर करने के लिए किसी को जवाब मत दो।।
कथा प्रवाह में चारों भाइयों के नाम करण। सुख का धाम, अखिल लोक का विश्राम, आनंद के राशि विराम आराम, विश्राम और अभिराम प्रदान करने वाले तत्व का नाम राम रखा गया।। सबको भर दे उसका नाम भरत और सब का आधार है वह लक्ष्मण।। शत्रु बुद्धि का नाश करने वाला शत्रुघ्न रखा गया।। यज्ञोपवीत और विद्या प्राप्ति के बाद राम लक्ष्मण को लेने के लिए विश्वामित्र आए।। उनके साथ वन गमन करते हुए रास्ते में मारीचसुबाहु,ताड़का को दंड देकर,अहल्या का उद्धार करके जनकपुरी में धनुष यज्ञ किया।। और सीता से विवाह के बाद चारों भाइयों का विवाह करके सब अयोध्या आए।।अयोध्या से विश्वामित्र की विदाई हुई वहां पर आज की कथा को विराम दिया गया।।