Homeगुजरातहरि, हरिजन और साधुजन तीनों का कार्य क्षेत्र अलग है।।

हरि, हरिजन और साधुजन तीनों का कार्य क्षेत्र अलग है।।

हरि उध्धार करते हैं,हरिजन सुधार करें और साधु स्विकार करते हैं।।

हम जितने सुखी उतने ही दुखी है।।

स्वभाव का,प्रभाव का और अभाव का ऐश्वर्य होता है।।

गुणातित भरोसा होगा तो अस्तित्व भी हमें हिला नहीं पाएगा।।

जिनमें यह तीन वस्तु न दिखे उसे जीवात्मा कहे: माया,ईश्वर और मैं कौन हूं वह पहचान ना पाए वह जीव है।।

जैसा कर्म करें ऐसे बंधन और मुक्ति प्रदान करें वह ईश्वर है।

सब से पर,साक्षी होकर माया को प्रेरणा करें वह ईश्वर है।।

पवित्र पिराणी धरा कच्छ कोटेश्वर से प्रवाहित रामकथा के छठ्ठे दिन आरंभ में बताया ईश्वर अंश जीव अविनाशी।।एक अंश है एक अंशी है।भजन करते या कोई किसी साधना पद्धति से अंश अंशी में विलीन हो सकता है।जैसे कोई बूंद सागर में विलीन होकर सागर बन जाती है।।जीव भी अविनाशी है परम तत्व से जुड़ी हुई वस्तु भी इतनी ही शाश्वत होती है।।ईश्वर भी निर्मल है।जीव भी निर्मल होना चाहिए।।सहज स्वभाव होना चाहिए लेकिन जीव के कुसंग के कारण सहजता दबी है।भूख,तरस,निद्रा, जागृति जीव के भी सहज स्वभाव है।।

बापू ने कहा कि महापुरुष ने जो भी महान वचन कहे हो वह देश काल और पात्र के आधार पर कभी बदलते हैं,प्रासंगिक नहीं भी हो सकते हैं।।जैसे बुद्ध ने कहा है आर्य सत्य बताएं:संसार में दुख है,दुख के कारण है,दुख का निवारण भी है।।लेकिन आज हम कह सकते हैं कि सुख भी है। सुख के भी कारण है।।साधु दृष्टि पड़े तो सभी सुखमय हो जाता है।।जैसे भगवान कृष्ण ने कहा है जन्म,मृत्यु,जरा और व्याधि दुख के कारण है।।लेकिन कभी हम देखते हैं झोंपडे में भी जन्म होता है तो थाली बजाते हैं।।

हरि,हरिजन और साधुजन तीनों का कार्य क्षेत्र अलग है।।हरिउध्धार करते हैं,हरिजन सुधार करें और साधु स्विकार करते हैं।।

बापू ने बताया कि हम जितने सुखी उतने ही दुखी है जैसे झूले से हम बोध ले सकते हैं।। झूला जितना आगे जाता है उतना ही पीछे जाता है।।

जैसे शिव अष्ट मूर्ति है वैसे बुद्धपुरुष भी हमारे लिए यदि अष्टमूर्ति है तो बुद्ध पुरुष के आठ मुख कौन से हैं? यह आठ ऐश्वर्य में पहला ऐश्वर्य है।‌ तीन प्रकार के ऐश्वर्य होते हैं:स्वभाव का,प्रभाव का और अभाव का ऐश्वर्य।। अभाव का भी ऐश्वर्य होता है।।भगवान शिव में सभी अभाव है जैसे वह अगुण,अमान मातुपितुहीना है,उदासीन है,सभी संशय छीन हैं,जोगी है जटिल है,अकाम मन है,नग्न है और अमंगल बेश है। बापू जब कथा में आते थे तो देवीपूजक समाज की किसी माका ने बापू की गाड़ी रोकी और प्रश्न पूछा था।।वहमॉं का प्रश्न था की कर्म बड़ा है या भरोसा? बापू ने कहा कि दिल्ली के गजल कार दिल साहब ने एक ग़ज़ल बनाई और हमारे बाढडा सनातन आश्रम के ब्रह्मलीन स्वामी दयानंद जी ने कंपोझकरी यह गजल है:

यह दुख जो तुझको मिलता है,तुज करम का लेखा चुकता है।

जो पहले दिया सो अब मिलता है।

फरियाद न कर फरियाद न कर।।

यह जन्म तुझे अनमोल मिला बर्बाद न कर बर्बाद न कर।।

कर नेक अमल और हर को सिमर।

उत्पात न कर उत्पात न कर।।

बापू ने कहा कि मुझे आपके तक पहुंचना है। इसलिए कभी हमारे कर्म प्रधान के कारण जीवन में संकट आते हैं और हमें अच्छा ना लगे ऐसा फल भी भोगना पड़े तब वह पचाने के लिए भरोसा ही सबसे बड़ा है।।गुणातित भरोसा होगा तो अस्तित्व भी हमें हिला नहीं पाएगा।।

सुख और दुख जीवन का झूला है।।अपने स्वभाव का भी आनंद होना चाहिए ऐसा बापू ने बताया।।

बुद्धपुरुष का दूसरा मुख् है ज्ञान।ज्ञान के भी तीन प्रकार है:वेद,ज्ञान और बोध।।ज्ञान अन्य के लिए है बोध स्वयं के लिए है।।तीसरी मूर्ति वैराग्य है। तीन प्रकार का वैराग्य है: शरीर का,मन का और धन का वैराग्य भी है।।धर्म बुद्ध पुरुष का चौथा मुख है।। पांचवा लक्षण कीर्ती है जो दुनिया भर में फैलती है। यश छठ्ठा लक्षण है।।छे प्रकार के ऐश्वर्य जिनमें दिखे वह ईश्वर है।।ईश्वरषडेश्वर है।। सातवा लक्षण स्विकार है और आठवां मुख संवाद है।।

हनुमान भी ईश्वर है वाल्मीकि रामायण का सुंदरकांड पढ़ लेना।।

लक्ष्मण अरण्यकांड में राम से पूछते हैं ईश्वर और जीव का भेद क्या है? राम ने बताया जिनमें यह तीन वस्तु न दिखे उसे जीवात्मा कहे: माया,ईश्वर और मैं कौन हूं वह पहचान ना पाए वह जीव है।।जैसा कर्म करें ऐसे बंधन और मुक्ति प्रदान करें वह ईश्वर है। सब से पर,साक्षी होकर माया को प्रेरणा करें वह ईश्वर है।।गीता में 16 बार ईश्वर शब्द लिखा है चाहे योगेश्वर महेश्वर भी है।कृष्ण की 16 कला है।। हमारे द्वादश ज्योतिर्लिंग के मूल शब्द ईश्वर लगे हैं।। ईश्वर शब्द आए तब आंख में महादेव ही होना चाहिए।। कथा क्रम में पार्वती हिमाचल के वहां जन्म लेती है नारद के द्वारा पार्वती को कैसा पति मिलेगा वह बताते हैं।।जो सभी भगवान शंकर में दिखाते हैं।। और फिर काम प्रभाव के कारण संसार की हालत और शिव के द्वारा काम का दहन होने के बाद संसार कैसा दिखता है वह दिखाकर शिव पार्वती के विवाह के बाद पार्वती योग्य समय देखकर शिव से राम जन्म के कारण पूछती है।। पांच कारण बताकर शिव राम जन्म के बारे में कहते हैं और प्रसाद की खीर सभी रानियां को बांटते हैं और ईश्वर मां कौशल्या के उदर में अवतरण करते हैं।। बाद में राम जन्म अयोध्या में और चारों भाइयों की जन्म की बधाइयां के साथ कोटेश्वर की भूमि से त्रिभुवन को राम जन्म की बधाई देते हुए आज की कथा को विराम दिया गया।।

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