
इंद्रियां जिनके पास दासी होने के लिए तैयार होती है उसी को हम गोंसाई कह सकते हैं।।
कृष्ण की प्रत्येक चेष्टा प्रत्येक अदा में कुछ न कुछ संदेश है।।
कृष्ण ने और राम ने तीन प्रतिज्ञा की थी।।
तळाजा के पास गोपनाथ(गुजरात) से स्वान्त: सुखाय बह रही रामकथा के छठ्ठे दिन कथा से पहले एक छोटा सा उपक्रम रहा:गुजराती लोक साहित्य और लोक वार्ता के एक बहुत समर्थ और आदर पीत्र नाम बापालाल भाई गढवी ने 50 जितनी लोकवार्ता के संग्रह की 1994 में पहली आवृत्ति प्रकट की थी।। और तीन दशक 30 साल के बाद उनके सुपुत्र गिरीश भाई द्वारा तीसरी आवृत्ति व्यास पीठ की साक्षी को लेकर बापू के हंसते ब्रह्मार्पित हुई।।
साथ में हास्य कलाकार जगदीश त्रिवेदी और समर्थ लोक नायक भी खड़े थे।।
बापू ने भी इन कार्यक्रम पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह पुस्तक ‘कोन रंग दे’ विशेष प्रयत्न है और ब्रह्मार्पण होता है तो शब्द ब्रह्म तक बात पहुंचती है और सर्जक का शब्द घूम फिर के वही आता है।।
साधु के नाते प्रसन्नता और बधाई कहते हुए बताया कि बच्चों को ऐसे ही तर्पण अपने पिता के लिए करने चाहिए जो गिरीश भाई ने किया।।
शब्द दो रीत से आते हैं: ऊपर से आते हैं और कंठ में बैठते हैं या नीचे कोठे अपने पेट से आते हैं और कंठ में विराजमान होते हैं।। ऐसे कवियों के शब्द कोठे में से निकलकर कंठ में आए तो बैकुंठ तक भी पहुंचते हैं।।
इन कविता वार्ता दोहों का में 60-62 साल पहले का अनुभव कहता हुआ बापू ने कहा कि मेरे छोटे गांव तलगाजरडा से हम ट्रेन बहुत छोटी ट्रेन में बैठते थे वहां एक विश्राम स्थल पर ट्रेन की राह देखने के लिए 2 घंटे तक हमारा सत्संग हुआ।। बापुलाल भाई ने पूछा था कि रामचरितमानस में आतंक और आततायी शब्द है कि नहीं?आततायी शब्द गीता जी में है और उनका मतलब आतंक ही होता है।। फिर उसने पूछा था कि गोस्वामी गोसाई शब्द का अर्थ क्या है?गो का मतलब इंद्रिय है साइं, मालिक स्वामी हमारा नाथ है।।इन्द्रीयों के स्वामी हम हैं इसी को हम गोसाई कहते हैं।।लेकिन मेरे मत से इंद्रिय किसी का दमन करना स्वामित्व स्थापित करना वह हिंसा है इसीलिए इंद्रिय जिनके पास दासी होने के लिए तैयार होती है उसी को हम गोंसाई कह सकते हैं।। मूर्ति की बात आई,नरसिंह मेहता की मूर्ति बहुत पुरानी है,बुड्ढे दिखते हैं।।बापू ने कहा कि मैंने एक बार कहा था कि युवा नरसिंह मेहता की मूर्ति होनी चाहिए और मूर्ति अलग-अलग रूप से होती है: शैली-यानी कि पत्थर की,लोहीत्व, ताम्र से या तो तांबे की मूर्ति भी बना सकते हैं।वैसे ही दारूनी, लेैपी अपने हाथों से दीवाल को लीपन से बनाई हुई मूर्ति, मिट्टी का यह आदमी मिट्टी के लोगों के साथ पहुंचा है।।लेकिन लैख्यी यानी की चित्र रूप में बने मूर्ति भी रहती।सीक्त रेत में से बनाई हुई मूर्ति भी हो सकती है।। लेकिन सबसे अच्छी मूर्ति मनमयी मन मैं मूर्ति अपने मन में जो भाव आकर ले उसे मनोमयी कहते हैं।।
वैसे लकीर तीन प्रकार की होती है: लोहे में लकीर पानी में लकीर और रेत में लकीर जो जल्दी मिट जाती है।।
नरसिंह के बारे में बहुत से संशोधन है लेकिन कुछ मालूम नहीं होता और थकावट ही महसूस होती है तो ढूंढने के बजाय हरि का भजन कर लेना।।
कृष्ण की प्रत्येक चेष्टा प्रत्येक अदा में कुछ न कुछ संदेश है।।कृष्ण ने तीन प्रतिज्ञा की थी:
पहले कहा था कि मैं हाथ में हथियार नहीं लूंगा लेकिन सुदर्शन लिया।। कृष्ण समर्थ है और सुदर्शन चक्र को हथियार नहीं है शस्त्र नहीं शास्त्र है।। हर एक को समदृष्टि से देखना वह शास्त्र है।। दूसरा कहा था है अर्जुन! मेरे भक्ति का कभी अहित पतन, नाश नहीं होने दूंगा।। और तीसरा बताया था संभवामी युगे युगे।।हर एक युग मैं खड़ा रहूंगा।। और कृष्ण ने अपनी तीनों प्रतिज्ञा पूरी की है पालन किया है।।
राम ने भी तीन प्रतिज्ञा की थी अरण्य कांड में कुंभज के कहने पर पंचवटी की तरफ यात्रा करते हैं वहां हाड पिंजर के ढेर देखकर कहते हैं यह क्या है और गोदावरी तट पर प्रतिज्ञा की पृथ्वी को राक्षसविहिन में कर दूंगा।। दूसरी जटायु के अंतिम संस्कार के वक्त प्रतिज्ञा करते हुए कहा कि आप जब जाओ तो पिताजी को सीता का अपहरण हुआ वह मत बताना यदि मैं राम हूं तो रावण ही खुद आकर बताया कि मैं अपहरण किया था और राम ने मेरी यह दशा की है! और विभीषण की सुंदर कांड की कथा में विभीषण भयभीत होकर शरण में आता है तब राम ने कहा कि मेरे पास जो भयभीत होकर आता है उसे अभय करने के लिए मेरा व्रत और संकल्प है।।
कृष्ण के हर एक व्यवहार में कुछ ना कुछ संदेश है। मोर पिंछ,माला,पितांबर,रास, महाभारत के बाद ह्रास और सब संदेश पांच इंद्रियों एक ही उर जन्म ले बोले उसे पांच जन्य भी हम कह सकते हैं।।
शिव विवाह की सुंदर और रसिक कथा कहते हुए शिव का श्रृंगार एक-एक श्रृंगार के बाद शिव बारात लेकर जाते हैं और वहां जो भी रसिक और मधुर प्रसंग बनते हैं वह हास्य विनोद के साथ बापू ने संवाद करते हुए शिवजी की बारात में अलग-अलग प्रकार के भूत प्रेत आए और भोजन का वर्णन करने के बाद शिव और पार्वती के विवाह संपन्न होते हैं और उसमें कथा का गान करते हुए शिव विवाह का प्रसंग बताया।।

