
धार्मिक होने से भी अधिक महत्वपूर्ण है धर्मशील होना।
पद मिलने पर अक्सर व्यक्ति का कद छोटा हो जाता है।
आज कई लोग स्वयं जाकर नॉबेल पुरस्कार के लिए मांग करते हैं।
हम्पी: कर्नाटक के पवित्र ऋष्यमूक पर्वत (हम्पी) में पूज्य मोरारी बापू की ऐतिहासिक मानस रामयात्रा का पांचवां दिन भक्ति, चिंतन और आध्यात्मिक संवाद से आलोकित रहा। आज की कथा में बापू ने कहा कि धार्मिक होने से भी अधिक महत्वपूर्ण है धर्मशील होना।
उन्होंने कहा कि वर्षों पहले पंपा सरोवर के तट पर भी कथा हुई थी। ऋष्यमूक पर्वत पर, जहां भगवान श्रीराम ने चातुर्मास किया था, वहां कभी जगद्गुरु शंकराचार्य परमहंसाचार्य की ऐसी अलौकिक महिमा रहती कि हर यात्री वाहन से उतरकर प्रणाम करता था।
इस भूमि को बापू ने भक्ति और परंपरा की सजीव प्रतीक कहा। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में भगवान हनुमानजी का प्रवेश हुआ था। यही अंजनी पर्वत स्थित है, जहाँ का वातावरण अत्यंत प्राकृतिक और दिव्य ऊर्जा से भरा हुआ है।
रामचरितमानस के प्रत्येक पात्र का अपना एक विशिष्ट व्रत (आध्यात्मिक संकल्प) है, जो उनके जीवन की दिशा और साधना को दर्शाता है। परमात्मा श्रीराम सत्यव्रती हैं, जानकी माता सेवाव्रती हैं, और हनुमानजी रामकाजव्रती हैं। उनका जीवन केवल प्रभु के कार्य के लिए समर्पित है। बापू ने कहा कि लक्ष्मण जागरणव्रती, शत्रुघ्न मौनव्रती और भरतजी विषमव्रती हैं, जो कठिन परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रखते हैं। इसी प्रकार देवर्षि नारद ब्रह्मचर्यव्रती हैं, और हनुमानजी भी ब्रह्मचर्य के अद्भुत प्रतिमान माने जाते हैं।
उन्होंने ओशो का संदर्भ देते हुए कहा कि “व्यक्ति को केवल धार्मिक नहीं बल्कि धर्मशील होना चाहिए, क्योंकि केवल धार्मिकता व्यक्ति को रूप और आडंबर में बांधती है, जबकि धर्मशीलता मनुष्य को आत्मा से जोड़ती है।”
हनुमानजी के तीन पर्वतों पर चढ़ने के प्रसंग का वर्णन करते हुए बापू ने कहा कि पहला पर्वत सात्त्विक अहंकार का प्रतीक था, जिसे हनुमानजी ने पैरों तले दबा दिया। दूसरा, मैनाक पर्वत, राजसी अहंकार का प्रतीक था, जिसे उन्होंने केवल स्पर्श किया और कहा कि “रामकाज बिना मुझे विश्राम नहीं।” तीसरा, लंका का कनककोट, तामसी अहंकार का प्रतीक है, जिसे मिटाना कठिन है और जिसे केवल दूर से ही देखना चाहिए।
बापू ने कहा कि जब व्यक्ति को पद मिलता है, तो अक्सर उसका कद छोटा हो जाता है। उन्होंने विनोदपूर्वक टिप्पणी की कि आज कई लोग स्वयं जाकर नॉबेल पुरस्कार के लिए मांग करते हैं। बापू ने कहा कि विरक्त व्यक्ति को कभी स्वर्ण का दान नहीं देना चाहिए, क्योंकि वैराग्य का मूल्य स्वर्ण से कहीं अधिक है।
पूज्य मोरारी बापू ने आगे कहा कि जो व्यक्ति विषयों में आसक्त है, वह सदैव भयभीत रहता है, परंतु जो प्रभु में विश्वास रखता है, वह सदैव निडर रहता है। उन्होंने कहा कि हनुमानजी वैराग्य का मूर्त रूप हैं।
आज की कथा में बापू ने देवर्षि नारद और हनुमानजी के प्रसंगों के माध्यम से साधु के लक्षण बताए, जैसा कि श्रीराम स्वयं कहते हैं। “जो छह विकारों, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर, को जीत चुका हो, वही सच्चा साधु है।” ऐसे साधु विनम्र, धैर्यवान, विवेकशील, करुणामय, यम-नियम से युक्त और प्रभुचरणों में सदैव लीन रहते हैं।
कथा के अंत में बापू ने कहा कि यह रामयात्रा केवल भक्ति का उत्सव नहीं बल्कि सत्य, प्रेम और करुणा की यात्रा है, जो हर हृदय को जोड़ती है। आज की कथा देवर्षि नारद और हनुमानजी के चरणों में समर्पित की गई।
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आधुनिक युग के छह नए विकार
पूज्य बापू ने कहा कि पारंपरिक छह विकारों, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर, के साथ आज के समय में छह नए विकार भी उत्पन्न हुए हैं।
अस्वीकार – हर बात को नकार देना।
आकार – रूप के प्रति आसक्ति।
प्रतिकार – हर बात का विरोध करना।
अहंकार – स्वयं को केंद्र में रखना।
भ्रमित निराकारता – निराकार की बातें करना पर स्वयं आकार में लिप्त रहना।
निष्क्रियता – कर्महीनता या निष्क्रियता भी एक विकार है।

