Homeगुजरातसमर्थ है वह ईश्वर है।।

समर्थ है वह ईश्वर है।।

ईश्वर वह है जो सर्वज्ञ है,जो समर्थ है।।

सनातन के ३० लक्षण क्या है?

जो सकल कला और गुण के धाम है वह इश्वर है।।

कोटेश्वर और नारायण सरोवर की भूमि से बह रही रामकथा के चौथे दिन आरंभ में बताया रामचरितमानस में कहां-कहां ईश्वर शब्द का उल्लेख हुआ है।।केवल ईश्वर शब्द आठ बार और कवीश्वर, कपीश्वर,अखिलेश्वर जैसे शब्द मिलकर 18 बार ईश्वर लिखा गया है।।सभी ईश्वर शब्द भगवान शिव के लिए समर्पित है।।भगवान शिव कहो ईश्वर कहो वह प्रभु है। समर्थ है वह ईश्वर है।। वेदांत तो जिसे ब्रह्म कहते हैं। बौध बुद्ध कह कर और न्याय प्रिय कर्ता कह कर पुकारते हैं। जैन अरिहंत कहते हैं। मिमांसको के लिए जो कर्म है वह एक ही ईश्वर है।। बापू ने कहा कि कृष्ण के बारे में भी छोटे-छोटे प्रवाह वाले कुछ और ही कहते हैं! वह कहते हैं गीता कृष्ण ने कहीं नहीं!! क्योंकि गीता में भगवान ने कहा ऐसा कहा है!और वह खुद अपने माने हुए भगवान को वहां रख देते हैं। विचारधारा छोटी-छोटी उसे में धारा भी नहीं समझता, लेकिन पंडितों भी खरीदे जाते हैं!! गीता कृष्ण ने कही है, योगेश्वर ने सुदर्शन चक्रधारी कृष्ण ने कही है।।ईश्वर वह है जो सर्वज्ञ है,जो समर्थ है।। इसलिए एक ही दोहे में ईश्वर के लक्षण दिखाएं:

प्रभु समर्थ सर्वज्ञ शिव,सकल कला गुण धाम।

योग ज्ञान वैराग्य निधि, प्रणत कल्पतरु नाम।।

यहां शंकर चरित्र कहते हैं और हनुमान जी ने चरित्रवान के गुण गाए हैं।। सकल कला में 16-32 64 कला है।। एक कला ऐसी भी है जहां अंध श्रद्धा को निर्मूल करने के लिए कला दिखाते हैं।।

बापू ने अमरेली के पास के एक गांव में लासु बाई का प्रसंग 100 साल पहले अंधश्रद्धा निर्मूलन के लिए उसने क्या कहा था वह बताया।।

कबीर कहते हैं चींटी के पैर में नूपुर बाजते हैं वह भी साहब सुन लेता है।।

नारद जी को युधिष्ठिर ने भागवत में सनातन धर्म के लक्षण पूछे और नारद ने 30 लक्षण बताए हैं:: सनातन वह है जहां:सत्य,दया,तप,तितिक्षा, सहनशीलता,शौच,शांति,विवेक पूर्वक दमन,अहिंसा,ब्रह्मचर्य,त्याग,स्वाध्याय,सरलता, कोमलता,संतोष,समान धर्मी साधु की सेवा, धीरे-धीरे छोड़ने की वृत्ति,मौन,ज्यादा इच्छा का त्याग,आत्म चिंतन,अन्न विभाजन,करुणा,सभी में देवता बुद्धि, ईश्वर स्मरण,दास भाव से सेवा,श्रवण, कीर्तन,स्मरण,आत्मनिवेदन,सख्य भाव यह सभी लक्षण नारद ने कहे।।

राम कथा के प्रवाह में आरंभ में शिव कथा का आरंभ हुआ।। एक बार के त्रेता युग में शिव कुंभज के पास सती के साथ कथा श्रवण के लिए गए और रास्ते में राम कि ललित न लीला चल रही है। सती को संशय हुआ। परीक्षा की और शिव ने सभी देख लिया जान लिया सती का त्याग किया और सम्मुख आसान दिया।।

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