प्रत्येक कथा रियाज है।।
यदि सेवा ही करनी है तो अमेरिका अफ्रीका और इथोपिया के उन विस्तरों में जाइए जहां बहुत गरीबी है,हमारे यहां रोटी के नाते आकर धर्म परिवर्तन की बातें करते हैं।।
हम भी थोड़े देरी से आए हैं।।
आकार और प्रकार देखना बंद करके स्विकार करना शुरू करो।।
कथा सुनकर प्रवीण नहीं प्रामाणिक बनना चाहिए।।
जिनकी वाणी सत्य को सुनती है उनके सत्य को वाणी सुनती है।।
सोनगढ-व्यारा और आदितीर्थवासी क्षेत्र पर बह रही रामकथा के चौथे दिन आरंभ में कल कह गए श्लोक की बात करते हुए बापू ने कहा वेदांत में एक कहानी है,बहुत पुरानी कहानी है:10 मित्र घूमने निकले। लेकिन आगे पीछे हो गए।और जब फिर इकट्ठे हुए तो सब ने कहा कि हम 10 निकले थे लेकिन दोबारा हम गीन ले इसी में से कोई कम तो नहीं हुआ! एक ने गिनती शुरू की:एक-दो-तीन-चार…और नौ तक पहुंचे।दूसरे ने कहा कि तेरी भूल हो रही है। दूसरे ने गिरना शुरू किया उसने भी नौ तक गीना।। तीसरे ने भी किया लेकिन हर एक आदमी खुद को गिनना भूल जाता है! यह कहानी का सार है कि आत्म तत्व को जहां तक पहचान नहीं पाए सर्व साधना झूठी है। भक्ति मार्ग में हम खुद को भूल जाते हैं।। हमें खुद को पहचान लेना चाहिए। हमने किसी और के धर्म की बहुत बातें की,अपने खुद के धर्म को भूल गए।।
बापू ने आज कहा कि राजस्थान के बांसवाड़ा में एक पूरा गांव है जो अन्य धर्म में परिवर्तित हो गया था लेकिन कल पढा कि पूरा गांव वापस सनातन धर्म में आ गया है।।
बापू ने कहा कि ऐसी प्रवृत्ति इशु ने नहीं की। इशू बहुत मासूम व्यक्ति है।।कालांतर में उनके बाद यह काम हुआ है।। वह भ्रमित करते हैं। बच्चों को कहानी और चमत्कार दिखाकर भ्रमित करते हैं।। बस में जाते हैं और एक ही रंग रूप और कद की दो मूर्ति लेते हैं।।उनके भगवान की लकड़े की मूर्ति और हमारे भगवान की लोखंड की मूर्ति लेकर फिर कहते हैं कि पानी में परीक्षा करते हैं और उनकी मूर्ति पानी के ऊपर तैरती है हमारे भगवान डूब जाते हैं। तब कहते हैं, ब्रेइनवॉश करते हैं और कहते हैं कि आपके भगवान डूब गए!डूब जाते हैं वह आपको क्या तैरायेंगे!लेकिन एक समय ऐसी एक चलती बस में एक साधु गया।।उसने कहा कि मुझे भी परीक्षा करनी है, लेकिन हमारे यहां जल परीक्षा नहीं अग्नि परीक्षा होती है। हमारी शबरी, हमारी जानकी माता अग्नि परीक्षा में से पसार हुए।।दोनों मूर्तियों को अग्नि में डाला गया लकड़े की मूर्ति जल गई और हमारी मूर्ति और अच्छी होकर बाहर निकली।।
बापू ने कहा कि ऐसा कहकर भ्रमित करते हैं लेकिन बांसवाड़ा में पूरा गांव फिर वापस आया। चर्च मंदिर बन गया और पादरी पुजारी बन गया।।
यदि सेवा ही करनी है तो अमेरिका अफ्रीका और इथोपिया के उन विस्तरों में जाइए जहां बहुत गरीबी है हमारे यहां रोटी के नाते आकर धर्म परिवर्तन की बातें करते हैं।। हम भी थोड़े देरी से आए हैं।। आकार और प्रकार देखना बंद करके स्विकार करना शुरू करो।।
जिनकी आंख में सूरज की समझ और चंद्र का समर्पण है वहां आंसू मीठे होंगे।।
कथा के तीन हेतु तुलसी जी ने बताएं: श्वात: सुखाय- निज सुख के लिए है। कथा उपदेश नहीं स्वाध्याय है।। प्रत्येक कथा रियाज है।। वाणी पुण्यशाली बने और अपने मन को बोध करने के लिए कथा है।। कथा सुनकर प्रवीण नहीं प्रामाणिक बनना चाहिए।। कथा का सार क्या है?
एहि महं रघुपति नाम उदारा।
अति पावन पुराण श्रुति सारा।।
पिपासा जगे वही श्रोता है।। मनोरथी कथा करवाता है। कथा के अधिकारी कौन है?जिन्हें सत्संग प्रिय हो और कथा का सार है:प्रभु का नाम।। कथा का नायक आदि मध्य और अंत में राम तत्व, सत्य तत्व उनके नायक है।। हम ऐसे पुरुष के पास जाए जो सबको सुनता हो।। शरीर चंचल,वाणी चंचल,आंख चंचल,मन चंचल,बुद्धि और सांस भी चंचल। वायु जैसे पुरुष के पास जाए जो हमारी चंचलता को खत्म कर दे।।
उपनिषद कहता है जिनकी वाणी सत्य को सुनती है उनके सत्य को वाणी सुनती है।।
भरद्वाज ने रामकथा पूछी और शिवकथा से शुरु हुवा।।एसे ही तुलसी जी हनुमान चालीसा में लिखते है:बरनउ रघुवर बिमस़ल जसु….लेकिन सुनाये चालीस पंक्तियों में हनुमंत गुण!क्यो?
भरत राम के प्रेम का अवतार है।।लक्षमण प्रभु के शौर्य का अवतार है।।शत्रुघ्न राम के मौन का अवतार है और मॉं जानकी तप और त्याग का अवतार है।।ऐसे ही हनुमान राम के यश का अवतार है।।इसलिये तुलसी जी ने राम के यश के हनुमान जी का गान किया है।।ये गुरुमुखी है,शास्त्र को समजने के लिये गुरुमुख जरुरी है।।
कथा प्रवाह में कुंभज के पास सती और शिव कथा सुनने गये,सती को राम की कथा में राम की ललित नरलीला में संशय हुआ और रास्ते में वो राम की परीक्षा करने गइ।।