कबीरवड, भरूच: प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु और रामचरितमानस के मर्मज्ञ मोरारी बापू ने माता-पिता से आग्रह किया है कि वे सुनिश्चित करें कि उनके बच्चे अपने स्कूल बैग में रामायण और भगवद गीता की प्रति रखें। उन्होंने इन प्राचीन ग्रंथों को जीवन के अमूल्य मार्गदर्शक बताया।
बुधवार को भरूच के कबीरवड में चल रही “मानस कबीरवड” कथाके दौरान मोरारी बापूने युवा पीढ़ीमें सांस्कृतिक और नैतिक मूल्योंको स्थापित करनेके महत्व पर जोर दिया।
उन्होंने कहा, “हमारे प्राचीन ग्रंथ हमारी धरोहर हैं। मेरी बात सुनें और इसे अपनी भाषा में बच्चों को समझाएं। यह बहुत आवश्यक है। ये ग्रंथ अभी तक पूरी तरह से हमारे शिक्षा प्रणाली का हिस्सा नहीं बने हैं, हालांकि कुछ प्रयास किए जा रहे हैं। इसलिए, मैं आपसे निवेदन करता हूं कि जैसे आप बच्चों के बैग में कंपास बॉक्स रखते हैं, वैसे ही रामायण और गीता रखें। ये ग्रंथ बहुत उपयोगी होंगे। ये हमारे अनुपस्थिति में भी बच्चों का मार्गदर्शन करेंगे।”
मोरारी बापू ने स्पष्ट किया कि ये ग्रंथ केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक “नेत्र”हैं।उन्होंनेकहाकिहमनेइन‘नेत्रों’केमाध्यमसेदुनियाकोदेखाहै।इनकेबारेमेंबातकरनाकिसीअन्यधर्मकीआलोचनाकरनानहींहै।अगरइससेकिसीकोकोईनुकसाननहींहोता, तो यह अवश्य करना चाहिए।
एक उदाहरण देते हुए उन्होंने इन ग्रंथों की तुलना चश्मे या लेंस से की जो दृष्टि को सुधारते हैं।
उन्होंने कहा, “अगर किसी बच्चे की आंखों की रोशनी कमजोर हो जाए, तो हम उसे चश्मा या लेंस देते हैं। बड़ों के लिए मोतियाबिंद की सर्जरी करते हैं। लेकिन बच्चों को सच्चा ‘दृष्टि’ देना हो, तो उनके स्कूल बैग में रामायण और गीता रखें। अगर बच्चे इन नेत्रों से दुनिया को देखना शुरू करेंगे, तो कोई संघर्ष, विभाजन या युद्ध नहीं होगा।”
मोरारी बापू ने अपना पूरा जीवन भगवान राम और रामायण की शिक्षाओं को प्रसारित करने के लिए समर्पित कर दिया है। कबीरवड में चल रही यह कथा उनकी छह दशकों की आध्यात्मिक यात्रा में 949वीं कथा है। सत्य, प्रेम और करुणा के उनके कालातीत संदेश दुनियाभर में करोड़ों लोगों के दिलों में गूंजते हैं।