Homeगुजरातपंचवटी पहुंची मोरारी बापू की मानस रामयात्रा: स्मरण और ज्ञान की साधना

पंचवटी पहुंची मोरारी बापू की मानस रामयात्रा: स्मरण और ज्ञान की साधना

पंचवटी, महाराष्ट्र | 27 अक्टूबर 2025: “ऐसे रहो कि मैं भीड़ में नहीं, एकांत में हूं; मौन हूं, और स्मरण में हूं।” मोरारी बापू की मानस रामयात्रा के तीसरे दिन की कथा ने यह संदेश दिया कि सच्ची कथा वह होती है जो केवल कथा-मंडप को नहीं, बल्कि तीनों लोकों को शांति से भर दे। बापू ने कहा कि कथा का स्वभाव शांति का है, प्रभाव का नहीं।

तीसरे दिन की रामयात्रा महाराष्ट्र की पावन भूमि पंचवटी पहुंची।बापू ने ‘पंचवटी’ नाम का अर्थ समझाते हुए कहा कि ‘वटी’ आयुर्वेदिक शब्द है, जिसका अर्थ औषधि या बूटी है। यहाँ पाँच औषधियों का आध्यात्मिक महत्त्व बताया और कहा कि यहाँ हर वृक्ष, हर तट मानो सभी तीर्थ रामकथा की प्रतीक्षा में हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2027 में यहां कुंभ मेला और 2028 में उज्जैन कुंभ मेला आयोजित होगा, और दोनों स्थलों पर कथा का आयोजन करने का संकल्प है।

कथा में तीन प्रसंगों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया। पंचवटी में लक्ष्मण द्वारा भगवन राम को पूछे गए पाँच आध्यात्मिक प्रश्न, शूर्पणखा का प्रसंग, और मारीच प्रसंग। मानस के साधक इन प्रश्नों को रामगीता के रूप में जानते हैं।

बापू ने कहा कि पंचवटी में लक्ष्मण ने प्रभु श्रीराम से पाँच प्रश्न पूछे। पहला माया क्या है? दूसरा ज्ञान किसे कहते हैं? तीसरा वैराग्य की परिभाषा क्या है? चौथा ईश्वर और जीव में क्या अंतर है? और पाचंवा भक्ति कैसे प्राप्त होती है?

प्रभु राम ने उत्तर दिया।“मैं, मेरा, तू और तेरा, यही माया है। माया के दो रूप हैं, विद्या और अविद्या। अहंकार-मुक्ति ही ज्ञान है। जो तिनके के समान तुच्छ भाव रखे वही परमहंस वैरागी कहलाता है।

बापू ने शूर्पणखा के प्रसंग को प्रवृत्ति का प्रतीक बताया, वह जो निरंतर आकर्षक इच्छाओं में उलझी रहती है। मारीच प्रसंग और सीता के अग्नि प्रवेश की लीला को उन्होंने आत्मशुद्धि और अंतर्मुखता का प्रतीक कहा। बापू ने आगे कहा कि रामायण को केवल पढ़ो मत, उसका पाठ करो, क्योंकि पाठ निरंतर चलता है। कथा का सार यही है कि हम स्मरण में रहें, मौन में रहें, और प्रभु में लीन रहें।

बापू ने भगवान बुद्ध के उपदेशों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा, “बुद्ध ने बताया कि जो संन्यासी संयोजन-मुक्त जीवन जीता है, वही सच्चा ब्राह्मण है, क्योंकि बंधन निर्भयता को छीन लेते हैं।” बापू ने बुद्ध के छोटे भाई शारिपुत्र के पुत्र रैवत का प्रसंग सुनाया जो गृहस्थ जीवन के बंधनों से पूर्व ही विरक्त होकर जंगल में चला गया और दीक्षा प्राप्त की।

उन्होंने कहा, “साधन का अर्थ है कि परमात्मा के सिवा किसी और का साध न रह जाए। ध्यान न भी हो, तो भी इष्ट का स्मरण साधना का सर्वोच्च रूप है।”

अंत में मोरारी बापू ने कहा कि यदि इष्ट का स्मरण भी मौन में विघ्न डाले, तो स्मरण भी छोड़ देना चाहिए। तभी साधना का मर्म मिलता है। तीसरे दिवस की कथा बापू ने पंचवटी के ऋषि-मुनियों और मारीच को समर्पित की।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read