
श्री कृष्ण का वचन है कि भक्त, भक्ति और भगवान का कभी अपराध नहीं करना चाहिए।
कथा में हरिनाम का संकीर्तन मन को वश में करने का अभ्यास है।
रामायण के नौ पात्रों में नौ व्रतों का दर्शन होता है। ये नौ व्रत का भगवान श्री कृष्ण में जागरण दिखाई हैं।
परात्पर ब्रह्म, पूर्णावतार भगवान द्वारिकाधीश की कृपा से, पूज्य बापू ने आज की कथा के आरंभ में “मानस कृष्ण अवतार” की केन्द्रीय चोपाईयों के अर्थ घटन के साथ किया।
काम दहन के बाद, काम की पत्नी रति आक्रंद करती हुई भगवान शिवजी के पास आई और खूब रोने लगी। शिवजी आशुतोष हैं, कृपालु हैं और उनकी नज़र सबसे पहले खिन्न, दीन हीन पर जाती है।
शिवजी ने रति को मानस की इन दो पंक्तियों में दो बताया है कि वह अपने पति कामदेव से कब मिलेगी। बापू ने कहा कि
“मेरी नज़र में, इन दो पंक्तियों में महाभारत का बीज हैं।”
शिवजी रति को वरदान देते हैं कि द्वापर युग में, पृथ्वी का बोझ कम करने के लिए यदुवंश में कृष्ण अवतार लेंगे। उस कृष्ण के पुत्र के रूप में, तुम्हारे पति तुम्हे सदेह मिलेंगे।
कामदेव की पत्नी रति, कृष्ण अवतार के काल में मायावती के रूप में जन्म लेती है।
कृष्ण चरित्र में, माँ रुक्मिणी, मोर- मुकुट और पिताम्बर धारी भगवान कृष्ण को प्रेम पत्र भेजती हैं, जिसमें भगवान कृष्ण को पति के रुप में पाने का मनोरथ व्यक्त करती है। कृष्ण, रुक्मिणी का अपहरण कर के द्वारिका ले आते है।
योग्य समय पर, पटरानी रुक्मिणीजी एक पुत्र को जन्म देती हैं। उस समय, कृष्ण का विरोधी समरसुर, कृष्ण-पुत्र का अपहरण करके उसे समुद्र में फेंक देता है। वहाँ, एक मछली बच्चे को निगल जाती है। मछुआरे के जाल में फंसी मछली आखिर में समरसुर के रसोई घर में पहुँच जाती है।
समरसुर के लिए खाना बनाने वाली मायावती एक बहुत सुंदर युवति है, जो कि रति है और मछली के पेट से निकले कृष्ण-पुत्र के प्रद्युम्न काम देव हैं। इस तरह, रति और कामदेव आखिर में मायावती और प्रद्युम्न के रूप में पति-पत्नी के रूप में फिर से मिलते हैं।
“कृष्ण अवतार” के चिंतन में प्रवेश करते हुए पूज्य बापू ने कहा कि शिवजी ने वादा किया है कि जो कोई भी सनातन धर्म के किसी भी पवित्र ग्रंथ की शरण लेगा, उसे आखिरकार श्री कृष्ण के चरणों में जगह मिलेगी।
भगवान शिवाजी और माँ भवानी ने श्री कृष्ण को बिना माँगे आठ वरदान दिए हैं। भगवान कृष्ण ने सामने से भगवान और भगवती से आठ और वरदान माँगे हैं। कृष्ण को मिले ये चौबीस वरदान, मेरी नज़र में, चौबीस अवतारों की ओर संकेत करते हैं।
कृष्ण हमें समझाते हैं कि किसी महान व्यक्ति से क्या माँगना चाहिए!
भगवान द्वारा माँगे गए आठ वरदान इस प्रकार हैं।
(1) मेरे माता-पिता को मेरी वजह से कभी दु:ख न पहुंचे।
(2) मैं अपनी ज़िंदगी में कभी किसी के साथ पक्षपात न करुं – मैं हमेशा सम में रहूँ।
(3) मैं कभी परद्रोह न करुं।
(4) मैं कभी पर धन का अपहरण न करुं।
(5) मैं कभी परापवाद न करुं।
(6) मेरे मन में कभी भी परस्त्री प्रवेश न करें।
(7) मैं कभी परधर्मी न बनुं।
(8) मुझे परम भोग प्राप्त हो और साथ में परम योग भी प्राप्त कर सकुं।
बापू ने बताया कि भगवान कृष्ण के सुदर्शन चक्र में 108 तीलियाँ थीं। हम भक्ति मार्ग में नाम निष्ठा रखनेवाले साधक अपनी माला में 108मनके रखते हैं। वह माला ही हमारा सुदर्शन चक्र है!
कथा के चिंतन में आगे बढ़ते हुए पूज्य बापू ने कहा कि भागवत् में प्रह्लादजी कहते हैं कि जो साधक कृष्ण की छह बातों को समझ लेगा, उसे परम गति मिलेगी।
(1) सबको नमस्कार करना। अहंकार छोड़कर सबको प्रणाम करना।
(2) श्री कृष्ण की स्तुति करना।
यहाँ स्तुति का अर्थ प्रशंसा
नहीं बल्कि पुकार है।
(3) पूजा कर्म करना। भगवान की पूजा, इश्वर उपासना संध्या वंदन…. आदि।
(4) कृष्णार्पण करना। हम जो भी कर्म करें, श्री कृष्ण को अर्पित कर दें।
(5) कृष्ण के चरणों का लगातार स्मृति रखना।
(6) कथा का श्रवण करना।
जो लोग इन छह बातों को अपने जीवन में अपनाते हैं, उन्हें परमहंस की गति प्राप्त होगी।
अर्जुन चंचल मन को वश करने का उपाय पूछते हैं। जवाब में, श्री कृष्ण उसके लिए दो उपाय बताते हैं – अभ्यास और वैराग्य।
बापू ने कहा कि कथा में किया जाता संकीर्तन मन को वश में करने के लिए अभ्यास है। नाम- संकीर्तन का अभ्यास बढ़ेगा, उसके परिणामस्वरूप वैराग्य प्रकट होगा।
अंत में, पूज्य बापू ने रामनाम के भाव पूर्ण संकीर्तन के साथ आज की कथा को विराम दिया।
मनोज जोशी (महुवा)
7-2-2026
[07/02, 5:34 pm] Manoj Joshi: रत्ना कणिका
(1) माता-पिता का स्वभाव कैसा भी हो, माता-पिता को कभी भी अपने बच्चों से दु:ख नहीं पहूंचना चाहिए।
(2) कृष्ण अवतार से हमें यह सीखना होगा कि हमारे माता-पिता सदैव प्रसन्न रहें।
(3) अखिल धर्म का मूल वेद हैं। हमने पंथ खड़े करके संघर्ष पैदा किये हैं।
(4) कुछ खास योग्यताएं पाने के लिए मंत्र की नहीं, वर्तन की ज़रूरत होती है।
(5) भगवान को पुकारने का कोई बंधारण नहीं है, रूदन कोई निश्चित लय नहीं होता!
(6) राम का सत्य, कृष्ण का प्रेम और शंकर की करुणा – ये तीनों शब्द अनादि हैं।
(7) असत्य को साबित करने के लिए सबूत ढूंढना पड़ता है। सत्य स्वयंसिद्ध है, उसे साबित करने के लिए किसी सबूत की ज़रूरत नहीं होती।
(8) जो विद्या हमें श्री कृष्ण तक ले जायें उसे दूनिया न भी स्वीकारें तब भी कृष्ण भक्ति की विद्या को थामे रखना।
(9) यहाँ बेट द्वारका भी है और भेट द्वारका भी! श्री कृष्ण ने यहीं पर सुदामा को गले लगाया था।
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बॉक्स आइटम
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हम राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं, लेकिन मैं आपको बता दूं कि कृष्ण जैसा कोई दूसरा मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं है।
हम राम की मर्यादाएं देख सकते हैं, लेकिन कृष्ण जिन मर्यादाओं का पालन करते हैं, वे हम नहीं देख पातें।
कृष्ण ने महाभारत में कहा है कि मैं काल और नियति की मर्यादाओं का स्वीकार करता हूंँ क्योंकि मैं मानव देह धारण करके आया हूं।
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