Homeगुजरातपधरामणी में मुजे उघराणी की गंध आती है,वो हरि की वधामणी है।।

पधरामणी में मुजे उघराणी की गंध आती है,वो हरि की वधामणी है।।

और बापु ने पूरे भाव में आकर प्रसन्नता से मंच पर रास और नृत्य करके पूरे पंडाल को आंसुओं से भीगो दिया!

ग्रंथ डराते नहीं हमारी छोटी बड़ी ग्रंथि हमें डराती है।।

संकल्प का गंगाजल हाथ में लेकर कह रहा हूं रामायण और महाभारत रखो और कोई मुश्किल पड़े तो सब कुछ मेरे ऊपर!!:मोरारिबापु।।

यह काकीड़ी गांव को राम कथा मिली मूल में महाभारत है।।

उसी का यह फूल खिला है और खुशबू पूरे वायुमंडल में जा रही है।।

लोभ और भय से धर्म का आचरण होगा वह धर्म ही नहीं है।।

कृष्णा तो मिलेगी,कृष्ण को पाने के लिये क्या ध्यान में रखना है?

क्या है रामकथा का षोडोपचार?

काकीडी महूवा से प्रवाहित रामकथा का सांतवा दिन बहुत कुछ प्रसंग से भरा रहा।।

कथा के आरंभ में पूछा गया कि लोग कहते हैं महाभारत घर में नहीं रखना चाहिए।।महाभारत पढ़ना नहीं चाहिए, क्योंकि महाभारत पढ़ने से कुछ ना कुछ अघटित घटना घटती है?

बापू ने कहा कि लोगों के मन में झूठी मान्यता है कि घर में महाभारत नहीं रखना चाहिए और पढ़ने से भी कुछ होता है।।लेकिन महाभारत इतना बड़ा ग्रंथ है।गीता प्रेस गोरखपुर ने ६-७ वॉल्यूम में और अलग-अलग प्रेस ने भी अपनी तरफ से महाभारत का प्रकाशन किया है।।कोई भी आदमी महाभारत की पढ़ाई करें फिर भी पूरा महाभारत पढ़ने में एक साल कम से कम लग जाता है।।यदि मैं भी क्रम में महाभारत की कथा उठा हूं तो एक साल तक कथा चलेगी,इतनी बड़ी कथा और उपकथा व्यास जी ने लिखी है,कुछ नहीं छोड़ा है।।गाय के लिए,गाय के गोबर के लिए,गाय के घी के दीपक के बारे में भी व्यास ने कहा है।। श्लोक को लोक तक जाना है तो गाय के गोबर तक जाना होगा। इतना बृहद ग्रंथ है।। लेकिन एक साल में कुछ ना कुछ घटना जीवन में घटी ही होगी। बीमार भी होंगे, अकस्मात भी होगा। लेकिन इसी घटनाओं को महाभारत पर आरोपित करना ईमानदारी नहीं है।। बापू ने बताया कि मेरा बहुत पुराना अनुभव है। जब घाटकोपर मुंबई और कहीं पधरामनी के लिए निकलता था। उस वक्त गुजराती के हरिन्द्र दवे ने मुझे पूछा था कि पधरामनी के बारे में आपका विचार क्या है?बापू ने कहा मैंने कहा था यह रजोगुणी शब्द लगता है। पधरामनी में कुछ लेने की गंध आती है।।यह हरि आने की बधाई है लेकिन यह शब्द मुझे रजोगुणी दिखता है।। जब मैं जाता था दो-तीन अनुभव है, सूरत घाटकोपर और कोलकाता के परिवारों में से सॉल या कुछ ना कुछ द्रव्य वस्त्र दिए और साथ महाभारत का पूरा ग्रंथ भी मुझे दे दिया! यह मान्यता थी की महाभारत घर में रखने से महाभारत होगी।। ग्रंथ डराते नहीं हमारी छोटी बड़ी ग्रंथि हमें डराती है।।

देवताओं के गुरु बृहस्पति,उनका एक बेटा कच नाम का।वह अपने बाप के चरणों में आकर विद्या की बात करता है। सभी विद्या में पारंगत हुआ और आकर बृहस्पति के पैरों में पड़ा। तब बृहस्पति ने एक ही प्रश्न पूछा तुझे शांति मिली कि नहीं? बताया कि नहीं।। जो ग्रंथ शांति ना दे उस ग्रंथ का अध्ययन क्या काम का! बृहस्पति ने कहा थोड़ा त्याग कर! शांति त्याग से ही आएगी। फिर गया।बाद में आकर बताया,बोला अभी शांति नहीं। बताया और ज्यादा त्याग कर!ऐसे बार-बार त्यागता रहा और आखिर में कोपिन और कमंडल ही बाकी रहा।। पूछा अब शांति मिली? फिर बताया कि नहीं मिली,आप ही रास्ता बताओ।। तब बृहस्पति ने कहा कि जब तक चित् का त्याग नहीं होगा शांति नहीं आयेगी।। चित् फिसछला स्तंभ की तरह होता है।।महाभारत घर में बसाओ इसे कोई नुकसान नहीं। बापू ने कहा कि मैं संकल्प का गंगाजल हाथ में लेकर कह रहा हूं रामायण और महाभारत रखो और कोई मुश्किल पड़े तो सब कुछ मेरे ऊपर!! पूरा महाभारत जिसने लिखा कभी बीमार नहीं हुए,न वैश्यंपाय,न जनमेजय,ना मेरे दादा, ना मुझे कुछ हुआ है, लेकिन आप इतना क्यों चिल्लाते हैं! महाभारत का ही एक भाग भगवत गीता घर में रखो।।

यह काकीड़ी गांव को राम कथा मिली मूल में महाभारत है। और उसी का यह फूल खिला है और खुशबू पूरे वायुमंडल में जा रही है।। लोभ और भय से धर्म का आचरण होगा वह धर्म ही नहीं।।

बापू ने कहा हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं तो अष्ट सिद्धि और नवनिधि की बात आती है।। हनुमान जी को वंदन करके मैं थोड़ा ऐसे कहता हूं अष्ट शुध्धि और नवधा भक्ति मिलती है।।

आज बापू ने महाभारत की रसीली और अलग-अलग छोटी कथा कही: एक मच्छी मार मछली पकड़ने के लिए जाल बिछाई।। बड़ी जाल में एक ऋषि आए। पानी में ऋषि अनुष्ठान कर रहे थे। वरुण और सूर्य की साधना कर रहे थे और उसी का नाम च्यवन ऋषि है।। बाहर निकाले। पूरे शरीर पर पानी चिपक गया है। निकाल कर अपने भूल कबूल करते हुए मच्छी मार राजा के पास ले गए।। राजा ने ऋषि को कहा कि हमारा अपराध हो गया है इसमें से मुक्त करने के लिए मैं आपको एक लाख सोना मुहर देता हूं और उसी ने कहा नहीं। राजा ने कहा एक करोड़ सोना महोर? फिर भी ऋषि ने कहा नहीं राजा ने बताया आधा राज में देता हूं।। ऋषि ने कहा कि नहीं। राजा ने पूछा कि प्रायश्चित के रूप में हमें क्या करना चाहिए? च्यवन ऋषि ने कहा सिर्फ एक गाय का दान कर दो! ऐसे गाय का मूल्य व्यास जी बता रहे हैं।।

लक्ष्मी जी विचरण कर रही थे। आगे गायों का झुंड चल रहा था। लक्ष्मी ने कहा कि पूरी दुनिया मेरे पीछे दौड़ती है लेकिन मैं आपके पीछे दौड़ती हूं मुझे स्थान दीजिए! तब गायों ने कहा कि हमारे पास कोई स्थान नहीं।। लक्ष्मी जी ने बहुत कहा तब बताया कि आपके शरीर में मेरे लिए कोई जगह नही। गायों ने कहा कि शरीर में जगह नहीं लेकिन हमारे शरीर में से जो गोबर निकलता है वहां आप निवास करिए।। लक्ष्मी गाय के गोबर में निवास करती है।।

आज एक कथाकार ने यह भी पूछा था की राम कथा परम तत्व का षोडोपचार पूजन है(१६:प्रकार से पूजा)वो  कैसे हैं?

बापू ने कहा कि:

आवाहन-आईये हनुमंत बिराजिये।।

आसन- सबसे ऊपर की आसन पर पोथी जी को रखते हैं।।

पाद्यम-गुरु सुमिरन में आंख गीली होती है।।

अर्ध्यं-कथा में वक्ता आत्मश्लाघा को छोड़कर आत्म निवेदन सुनाते हैं।।

आचमनियं-कथा का श्लोक चौपाई जैसे आचमन पिलाते हैं।।

स्नानं-करूण प्रसंग पे वक्ता श्रोता की आंख भीगी होती है।।

यज्ञोपवित- नवदिवसीय कथा यज्ञोपवीत के नव धागे जैसी।।

गंध-कथा की खुशबू पूरे वायुमंडल में फैलती है।। अक्षत-क्षती निवारण के लिए तीन बार हम बोलते हैं पुष्पानी- हजारो फूल मेरे फ्लावर्स ठाकुर जी के चरण में समर्पित करता हूं।।

धूप और दीप- आरंभ के वक्त धूप दीप करते हैं।।

नैवेद्य- हजारों को हरिहर का प्रसाद बांटते हैं।।

वस्त्रम-रोज मेरी पोथी जी का कपड़ा बदलता हुं।। दक्षिणा-लेता नहीं!

आरति-हर रोज शाम को आरती करते हैं।।

एक कथा यह भी है ध्रुपद और द्रोण की मैत्री। लेकिन बाद में कुछ तकलीफ हुई।एक पवित्र ब्राह्मण और एक राजा विरोधी बन गये।। द्रुपद ने तय किया कि द्रोण का वध कर सके ऐसा बेटा उत्पन्न करुं। याध नमक रिषि के पास यज्ञ करवाया और दृष्टधुम्न बेटे के रूप में प्रकट हुआ। अग्नि में से द्रौपदी निकली।।

हमारी मातृशक्ति अग्नि तत्व से प्रगटी है: द्रौपदी अग्नि में से, जानकी भूमि से,जल से लक्ष्मी,पर्वत से पार्वती, आसमान से भारती सरस्वती प्रगटी है।। पिता को हुआ की ये अग्नि कन्या यज्ञकन्या याज्ञ सैनी के योग्य वर के लिए स्वयंवर रचाउं। पुराणों में हरण अपहरण और वरण तीनों थे।।स्वयंवर में बहुत सी शर्तें रखी गई। और वहां कौरव भी आए। पांडव भी वेश बदलकर आए।। कृष्ण भी महाभारत में यहीं से प्रवेश कर रहे हैं।। दुर्योधन शल्य ने प्रयत्न किया लेकिन एक स्तंभ था जहां से फिसल जाते थे चक्र फिर रहा था,पानी भी था और मछली की आंख को बिंधना था।।कर्ण का अपमान हुआ। कृष्ण का विश्व सम्मोहित स्मित को संकेत के रूप में देखकर गुड़ाकेश अर्जुन खड़ा हुआ। और अर्जुन ने शिव आराधना की थी। शिव स्वरूप हनुमान ने सहाय की और वानर के गुण के कारण अर्जुन स्तंभ पर जल्दी ऊपर चढ़ गया। पल्ले को संतुलित रखते हुए मछली की आंख को ताककर अर्जुन ने स्वयंवर जीत लिया।। और द्रौपदी को पाया।

बापु ने कहा कि कृष्णा को पाने के लिए यह किया लेकिन यदि कृष्ण को पाना है तो हमें क्या करना चाहिए? कृष्ण को पाने के लिए संवेदना का जल, पसीने का,आंसू का जल और फिसलता हुआ स्तंभ हमारा चित् है। तुल्य निंदा स्तुति में संतुलन रखें, सुख-दुख, मान-अपमान में स्थिर रहे,और नम्रता रूपी निची दृष्टि रखकर कालचक्र घूमता है वहां अवसर का छीद्र खोज कर जो तीर चलता है वो कृष्ण को पा लेता है।।

द्रौपदी को जहां माता कुंता भेष बदलकर प्रजापति के वहां थी और रसोई कर रही थी वहां आया। माता ने कुछ देखे बगैर ही कहा कि जो भी लाया है पांचो समान भाग कर करके रख लो! लेकिन बाद में पता चला मुंह से निकल गया।। अब उकेल कैसे पाए? इस वक्त व्यास आए।नारद जी भी आते हैं। नारद ने कहा कि द्रौपदी एक-एक महीना तक एक-एक पांडव के साथ रहे। इस समय गाय को बचाने के लिए धर्म संकट आया। अर्जुन अपने हथियार लेने के लिए गया लेकिन द्रोपदी अन्य भाई के साथ थी वहां जाना पड़ा।।नियम का भंग हुआ और स्वेच्छा से अर्जुन ने वनवास का भी स्वीकार किया। ऐसी अनेक कथाओं से भारी प्रसन्नता से बापू ने भाव में आकर व्यास पीठ से नीचे उतरकर रास लिए। नृत्य प्रस्तुत किया और पूरे पंडाल को आंसुओं से भर दिया।।

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