Homeगुजरातसमूह गान का परिणाम है-रुदन।।

समूह गान का परिणाम है-रुदन।।

समूह कीर्तन की फलश्रुति है आंसू।।

रुदन से होता है कृष्ण प्रागट्य।।

आंसू से होता है हरि प्रागट्य।।

कलियुग में आश्रय करो तो हनुमान का करो।।

रामकथा नव ग्रंथि से मुक्त करती है।।

भगवान राम की कथा गाने से मन की गांठ छूट जाती है।।

आर्जेन्टिना के मनमोहक मनोहर बर्फबारी के बीच बह रह रामकथा के पांचवे दिन आरंभ में कहा कि जब कथा में आते हैं तो हनुमान चालीसा बजता है। वेद मंत्र,फिर चौपाइयों का गान,स्तुति,आखिर में भूशुंडी रामायण और आरती…सब का आप गान कीजिएगा।। पूरा हॉल गुंजना चाहिए।।हर पल को एंजॉयकरो।अवसर फिर नहीं मिलेगा।।

गोपी जनों ने समूह में गान किया तब कृष्ण प्रकट हुए।। समूह गान का परिणाम है-रुदन।। चैतन्य चरितामृत का प्रसंग जहां चैतन्य भाव में डूब कर दीवार पर सर पटकते थे और रक्त निकलता था। बुद्धपुरुष अपने समग्र आश्रित की सुरक्षा है।। लेकिन चैतन्य की सुरक्षा के लिए २४ घंटे शंकर पंडित को नियुक्त किया गया और शंकर पंडित चैतन्य के चरणामृत गोद में लेकर बैठते थे।। रोना, सिसकना,पुकारते गौरांग कहते हैं मुझे वृंदावन जाना है।।समूह कीर्तन की फलश्रुति है आंसू।। और रुदन से होता है कृष्ण प्रागट्य।।आंसू से होता है हरि प्रागट्य।।

बापू ने कहा मैं सेंजल की समाधि को याद करता हूं तो मेरा ध्यान ठीक रहता है।आपके सामने कथा में जीवन की सांप्रत बातें करता हूं तो जीवन दास बापा की समाधि प्रेरित करती है। ज्ञान-विवेक में प्रवेश करते हैं तो हनुमान जी ध्यान में रहते हैं।चौपाइयों का गान करता हूं तो तुलसी प्रेरित करते हैं।।उपनिषद की यात्रा करता हूं तो विष्णु दादा पकड़ लेते हैं। वात्सल्य,व्हाल,प्रेम,करुणा,सत्य,हरि नाम की बातें आती है तब मुझे पघड़ी(त्रिभुवनदास दादा) दिखती है।। यह मेरा अनुभव अन्यथा ना लेना।। एकमात्र उपाय है नाम।चैतन्यपरंपरामें कीर्तन नाम है।।

भागवत का यह श्लोक हनुमान जी के बारे में है:

सरूपा सूत भूतस्यभार्यारूद्रांश्वचकोटिश:

रैवतो अज भवोभीमो वामा उग्रोवृषाकपि:

अजैकपाद: मूर्धन्योबहुरुपोमहानेतिरूद्रस्य

पार्षदाचान्येघोरा भूत विनायक:।।

(श्रीमद भागवत स्कंद-६,अध्याय-६,श्लोक १७-१८)

हनुमान जी ११वें रुद्र का अवतार नहीं लेकिन ११ रूद्र मिलकर हनुमान हुए हैं।यह ११ रुद्र स्वरूपा नाम की भूत की एक पत्नी है वहां कोटि रूद्र उत्पन्न हुए हैं।।

पहले रुद्र का नाम है: रैवत-बहुत गति होती उसे रैवत कहते हैं।गुजराती भाषा में घोड़े की गति को रेवाल की गति का यह शब्द यहां से आया है।

अज-जिसका जन्म नहीं हुआ तो यह शंकर रूप हनुमान है।।

भव-आशीर्वादक शब्द है, कल्याण वाचक है।

भीम-भयंकर है वह।।

वाम- उल्टी गति है ऐसा।।सूर्य के सामने उल्टे चले शंकर का एक नाम वामदेव है।वामदेव यानी हनुमान उग्र-आसुरी वृत्ति के सामने उग्र हूए है।।

वृषाकपि-वृष मतलब धर्म।इसलिए धर्म पुरुष है।। अजैकपाद- बकरी के चरण वाले।।

धन्य-जिनके गले में सांप रहते हैं ऐसा।।

बहू रूपों-अनेक रूप लेने वाला।।

महानेति- बहुत महान।।

इसीलिए कलयुग में आश्रय करो तो हनुमान का करो।। वाल्मीकि रामायण में हनुमान खुद कहते हैं मैं ईश्वर हूं।।श्री हनुमानजी ब्रह्म है,शिव है,मंगल मूर्ति और संकट मोचन है।।

हमे साधु के लिए कहा जाता है:

त्रेता में बंदर भये,द्वापर में भयेग्वाल।

कलियुग में साधु भये, तिलक छाप

और माल(माला)

सनातन धर्म को नीचा दिखाने के लिए हर रोज एक वीडियो आता है। उन पर बापू ने कहा कि लज्जा और शर्म को छोड़ दिया है! रोज नया पाखंड दिखता है!कलयुग के वर्णन में कागभुशुंडि कहते हैं वह तुलसी ने लिखा है।।आज जगत में पाखंड और प्रपंच चल रहा है।।एक अर्थ में यह कली प्रभाव है। और उत्तर कांड में कलयुग का वर्णन किया वह पूरा बापू ने संक्षिप्त रूप में रखते हुए बताया कि मानस सनातन धर्म पर जब कथा करेंगे तो यह सब का विस्तार करेंगे।

उपनिषद में पांच ग्रंथि है: मन ग्रंथि,प्राण ग्रंथि, इच्छा ग्रंथि,लघुता ग्रंथी और पूर्वग्रह की ग्रंथि।। मन शांत कैसे हो?अशांत रहना मन का स्वभाव है।।शांत हो जाए उसको मन नहीं कहते। मन की ग्रंथि में तीन है लघुता ग्रंथी, द्वेष, ईर्ष्या आदि।।

नवमी तिथि में राम जन्म होता है तो नव प्रकार की ग्रंथि से मुक्त कर देते हैं।। राम कथा नव ग्रंथि से मुक्त करती है।। भगवान राम की कथा गाने से मन की गांठ छूट जाती है।।प्राण में जिजिविषा होती है इच्छा रूपी ग्रंथि भी होती है।।सत्व ग्रंथि है पूण्य की भी ग्रंथि है।। पाप ग्रंथि भी है।।

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