
जगत का शोषण ना हो लेकिन पोषण हो ऐसी कोई भी बात,नवलकथा,घटना सब कुछ हरिकथा है।।
सावधान रहकर जगत को सावधान करें वह सयाना है।।
मंथन कठिन है मंचन बिल्कुल सरल है।।
मेघाणीसर्वधर्मा है।।
गुजरात के बगसरा शहर में चल रही रामकथा ने छठ्ठे दिन में प्रवेश किया।।राष्ट्रीय शायर और बहुमुखी प्रतिभा झवेरचंदमेघाणी के जीवन कवन पर चल रहे संवाद में रामकथा और साहित्यीक कार्यक्रम भी साथ साथ चल रहे है।।
मेघाणी की सागर जैसी गहराइ और विशालता में छीपे अनेक रत्नों में से बापुहररोजकोइ न कोइ रत्न को उजागर कर रहे है।।
जगत का शोषण ना हो लेकिन पोषण हो ऐसी कोई भी बात,नवलकथा,घटना सब कुछ हरिकथा है।। हरि का अर्थ बहुत व्यापक है।।प्राकृत हुए फिर भी जो समझदार है उसे समाज याद करते हैं।।वो केवल सयाने नहीं लेकिन परम सयाने कवि है ऐसा तुलसी जी ने कहा है।।
आज लोक साहित्य के कार्यक्रमों के कोई रात ऐसी नहीं होगी जहां गुजरात के कवि ‘दाद’,मेघाणी और कवि ‘काग’ बापू को याद ना किया गया हो।। सयाने का मतलब होशियार नहीं,लेकिन सावधान रहकर जगत को सावधान करें वह सयाना है।।
हमारे गुजरात के रविशंकर महाराज ने कविता लिखी ऐसा ध्यान में नहीं है ।।मंथन कठिन है मंचन बिल्कुल सरल है।।पुराण में समुद्र मंथन दानव और देवों ने मिलकर किया है।।
मेघाणी का मंथन भी कोई साधु को करना चाहिए जो सुरी और आसुरी प्रकृति और प्रवृत्ति से बाहर है ऐसे किसी साधु को मंथन करना चाहिए।।
तुलसी जी कहते हैं सभी प्रकार के कपट छोड़कर प्रणाम कर रहा हूं।।व्यापकता सीमित नहि है। कविता लिखकर या गाकर ही केवल गुणगान नहीं गाए जाते।।
मेघाणी ने लिखा है:
सूर असुर ना आ नवयुगीउदधिवलोणे,
शीछेगतागमरत्नाेना कामी जनों ने,
झट जाओ रे बापू!
सागर पिनारा अंजलि नव ढोळ जो बापू!
सभी को मेघाणी के लिए कुछ न कुछ कहना है। यहां एक श्रोता दादू भाई गढवी ने भी मेघाणी के लिए एक छोटी सी बात लिखकर भेजी है:
पाळियाआंसु पाड़ता धरती भिंजाणी।
दुखाणी कलम ‘दाद’ ‘के ते’दी मरता मेघाणी!
रामचरितमानस में नव प्रकार के मेघ का वर्णन मिलता है।वैसे तो शास्त्रीय रीत से बारह प्रकार के मेघ की बात है लेकिन मेघानी में साधु नव प्रकार के मेघ भी दिखाते हैं।।सभी ने अपने-अपने चश्मे से मेघाणी को देखा है।।
मेघाणी भाई का धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष क्या है? वैसे तो महाभारत में इसका जवाब मिलता है। लेकिन डेट्रोयट अमेरिका में गाइ गई एक रामकथा जिनका संपादन नितिन भाई ने किया वहीं से इनका जवाब मिला है।।जहांभिष्म दादा युधिष्ठिर को कहते हैं। हर एक वर्ण का धर्म क्या है वही धर्म मेघाणी का है।।मेघाणीसर्वधर्मा है।।
भिष्म दादा ने नव लक्षण बताए हैं। इस श्लोक को गाकर बापू ने अर्थ समझाते हुए कहा कि इन पर मेघाणी का मूल्यांकन होना चाहिए।
भिष्म दादा युधिष्ठिर को कहते हैं:अक्रोध,सत्य वचन,सम विभाग-जो विनोबा जी ने सबसे ज्यादा पालन किया है-क्षमा,शौच-आंतरबाहया पवित्रता, हर एक अपनी पत्नी द्वारा ही प्रजोत्पति,अद्रोह, सरलता और आश्रित का जीवन भर का पोषण करना-यही धर्म है।।
और मेघाणी में भी वही दिखता है।।मेघानी का अर्थ क्या है?समाज को अपने साहित्य के सच्चे अर्थ दिखाना वही अर्थ है।।मेघाणी का काम(यहां कर्म कार्यक्षेत्र)-50 साल की उम्र में इतना बड़ा सर्जन करना।।और500 साल का काम करके जाना वहीं मेघाणी जी का मोक्ष है।।
आनंद की प्राप्ति करनी है? बापू ने कहा कि आनंद की प्राप्ति के तीन प्रयोग करो:
एक-जरूरियात से ज्यादा यदि ईश्वर ने दिया है तो उसे बांट दो।।
दूसरा-किसी की निंदा,इर्षा और द्वेष ना करो ।।
तीसरा-इष्ट देव का सदैव स्मरण करो।।
यह करने से आप नित्य आनंद में रहेंगे।।
शिव चरित्र का गान करते हुए बापू ने कहा की 87 हजार साल की समाधि के बाद जब शिव जागे और सती को सम्मुख बैठा कर रसाल कथाएं कहने लगे। इस वक्त दक्ष प्रजापति के यज्ञ में जाने के लिए देवताओं के विमान कैलाश के ऊपर से जाने लगे।। यह देखकर सती को लगा कि मुझे भी यज्ञ में जाना चाहिए।।लेकिन शिव और सती को निमंत्रण नहीं था बिना निमंत्रण नहीं जाना चाहिए ऐसा शिव ने कहा लेकिन सती ने जब हठ पकड़ी तब अपने गणो के साथ सती को दक्ष प्रजापति के यज्ञ में शिव ने भेजा वहां सती का अपमान हुआ।। और जब सती ने देखा कि यज्ञ में शिव, ब्रह्मा और विष्णु का कोई स्थान नहीं, यह देखकर सती को बहुत अपमान लगा और यज्ञ का विध्वंस करके यज्ञ के अंदर कूद कर सती ने अपना आत्मदाह कर दिया।।हाहाकार मच गया।।शिव के गणो ने यज्ञ का विध्वंस कर दिया। और शिव को पता लगा तब सती का शव अपने ऊपर लेकर पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे।।शिव को दोबारा शादी करने के लिए भगवान ने समझाया उधर सती का दूसरा जन्म हिमाचल के वहां हुआ और नारद जी ने सती को तप करने के लिए कहा अति कठिन तप करने के बाद पार्वती दूसरे जन्म में शिव को पाने के लिए ज्यादा तप करती है।। शिव की समाधि को खंडित करने के लिए कामदेव ने अपना काम शुरू किया।।

