निश्चित की गई दिशा में जो गतिशील है वह ईश्वर है।।
राग और द्वेष बहुत बड़े स्पीड ब्रेकर है।।
जो हमारी इस गति को रोकते हैं।।
शिव कोटेश्वर है,पार्वती दुर्गेश्वरी है।।
कोट बाहर के आक्रमण से और दुर्ग अंदर के आक्रमण से हमें बचाते हैं।।
हम अवंश के अंश है,अवंश महादेव है।।
कोटेश्वर कच्छ की धरा से प्रवाहित रामकथा तीसरे दिन में प्रवेश कर रही है तब आरंभ में
श्रीमद् भागवत में छठे स्कंद के छठे अध्याय में एक श्लोक है जहां कोटी रुद्र और महत्व के 11 रुद्र की बात की गई है।।यह 11 रूद्र जहां है वह ईश्वर है। हनुमान में कोटि रुद्र के समन्वय की बात है और महत्व के 11 रूद्र हनुमान में है।। हनुमान कोटेश्वर है और कोटेश्वर हनुमान है।।कोटेश्वर को हल्दी का श्रृंगार और महाकाल को भस्म का श्रृंगार जो वैराग्य का सिंगार है।। यहां भागवत में पहला रूद्र है रैवत- रव का मतलब आवाज है।।और वेद का सूत्र है जो अतिशय गतिमान है।।हनुमान की गति पवन जैसी बहुत तेज है,इसलिए हनुमान रूद्र है।। निश्चित की गई दिशा में जो गतिशील है वह ईश्वर है।।वाल्मीकि रामायण में हनुमान दो बार उत्तराखंड गए हैं और तुलसी के रामायण में एक बार औषधि लेने के लिए गए है।। निश्चित दिशा में लक्ष्य की ओर दिव्य गति हो उसे ईश्वर समझना।। इसलिए हनुमान ईश्वर है हमारी गति निरंतर नहीं होती।। छोटी घटना हमें बाधक होती है।।
यह कोटि-कोटि लिखा है मॉडर्न साइंस में जब अणु और परमाणु के और छोटे टुकड़े करते हैं उसे गोड पार्टिकल कहते हैं।। और जैसे ही तोड़ते हैं ऊर्जा उत्पन्न होती है।। और एडवांस साइंस में यह भी कहा है कि अणुओं को जोड़ने से भी ऊर्जा उत्पन्न होती है,लेकिन वह परम स्वतंत्र है, हमारे जोड़ने से जुड़ते नहीं है ।।फिर भी जोड़ने का काम करना चाहिए।।
राग और द्वेष बहुत बड़े स्पीड ब्रेकर है।। जो हमारी इस गति को रोकते हैं।। हमारी गति टूटती है।।यहां भगवान शिव और पार्वती नंदी पर बैठकर विचरण करते हैं और सनकादिक निकलते हैं वह कथा भी बापू ने कही।।
शिव कोटेश्वर है,पार्वती दुर्गेश्वरी है।।कोट बाहर के आक्रमण से और दुर्ग अंदर के आक्रमण से हमें बचाते हैं।।
पांच प्रकार के कोष की बात की गई है। माता द्वारा मिलता है हो अन्नमय कोष है। पिता के द्वारा प्राण मय कोष मिलता है और आचार्य हमारे मनोमय कोष को खोलते हैं।। आचार्य और गुरु मन के ज्ञाता भी है और निर्माता भी है।।
यहां गुजराती के जयमल परमार की एक रचना जहां पुरुष के और स्त्री के 16 श्रृंगार की बात की गई है वह भी बापू ने बताई।।
पुरुष के 16 श्रृंगार में वस्त्र,अंगूठी,पाघ,हार,हथियार तिलक,कुंडल,कटी वस्त्र,तांबूल,फुल,काम कला, चतुराइ,विद्या,संयम,उपानधार और क्षौर कर्म बताया है।।
वैसे स्त्री के 16 श्रृंगार में:स्नान,अभंग-नेत्र अभंग, चतुराई- कुशलता,कंकण,काजल,नूपुर,नकवेश्
शिवजी ने रामचरितमानस की रचना की और योग्य समय पाकर पार्वती को सुनाई।। काग भूसुंडी ने गरुड़ को सुनाई।। कथा धरती पर अवतरित हुई एक बार के कुंभ में प्रयाग के संगम पर याज्ञवल्क्य ने भारद्वाज को सुनाइ और तुलसी ने भाषा बद्द करके बार-बार गुरु के पास वराह क्षेत्र में सुनकर भाषा बद करके लोक बोली में अपने मन को बोध करने के लिए सुनाई।। ऐसे यह चार घाट बताए गए।। नारायण सरोवर में किया हुआ स्नान मानसरोवर के स्नान जितना ही पवित्र है ऐसा बापू ने कहा और राम कथा पूछी गई और याग्यवल्क्य ने शिव कथा से कथा का आरंभ किया।।