
साधन बगैर इच्छा बोझ है।।
बाप इच्छा मुक्त हो और मां निंदा मुक्त हो वहां जानकी प्रकट होती है।।
जहां आश्रम है वहां अश्रु होते हैं।
जहां आश्रम है वहां आश्रय होना चाहिए।
आश्रम है वहां अभेद होता है।
आश्रम है वहां अभय होना चाहिए।
यवतमाल विदर्भ महाराष्ट्र की भूमि से चल रही रामकथा,मुख्य मनोरथी विजयबाबु दर्डा ‘लोकमत’
मिडिया से जूडा़ दर्डा परिवार और स्थानिक श्रोता एवं महेमानों और साधु संतो और ये वीर और धीर भूमि के महानायको को वंदन करते हुए छठ्ठे दिन की रामकथा का आरंभ हुआ।।
कथा आरंभ से पहले बापु की हर कथा का संकलन एवं संपादन करते नीतिनभाइ वडगामा ने पूर्व हूइ दो कथा-मानस रत्नावली(रत्नावली धाम उ.प्र.) एवं मानस हनुमाना(आफ्रिका)-व्यासपीठ को अर्पण करते हुए वो कथाओं में गाये गये प्रसंगों की बात करी।।
शास्त्र कहता है पिता अनीय- सभी एषणाओं से जैसे की पुत्रेष्णा, वितेषणा- से मुक्त होना चाहिए। हमारी एषणायें भी सम्यक होनी चाहिए।। और मां अनींद यानी की निंदा उसे मुक्त होनी चाहिए।
राम कथा का तात्विक सात्विक और वास्तविक संवाद करते हुए बापू ने कल विनोबा जी के आश्रम पवनार की मुलाकात के बारे में बताया और कहा कि यदि कोई मुझे पूछे तो मैं कहूं कि चार धाम के अलावा पांचवा कोई धाम है तो वह पवनार आश्रम होना चाहिए।।
यहां जनक और सुनैना की बातें करते हुए कहा कि सुनैना जिनकी आंखें सुंदर है।।
किस्म किस्म की आंखें यहां होती है। किसी की आंख शिकारी होती है,किसी की आंख पुजारी है, किसी की आंख में तिरस्कार,किसी की आंख में निमंत्रण होता है।।
हमने जहां पर देखी किस्म किस्म की नजरे।
चकोर चांद जैसी हम एक टगर चाहते हैं।।
बापू ने कहा की कथा के दिन बीते है वैसे एक डर सा लगता है कि जल्दी कथा खत्म हो जायेगी! यह आध्यात्मिक डर है।।
इच्छा पूर्ति के लिए साधन है तो ही इच्छा करें। साधन बगैर इच्छा बोझ है।। यदि इच्छा मुक्ति की इच्छा करें या तो किसी को नुकसान ना हो ऐसी इच्छा हमें करना चाहिए।। किसी इच्छा में मेरा कल्याण है ऐसा लगे तो इच्छा करना चाहिए।
माता को अनिंद जिसकी बुद्धि किसी की निंदा ना करें वह हमारी मॉं है और एक पाठ मिलता है माता अनिंद्रा यानी कि बच्चों के लिए जगती रहे।।
दोनों सूत्र जनक और सुनैना को लागू होते हैं। जनक अनिह है कोई इच्छा नहीं है और सुनैना अनिंदा है किसी की निंदा करते नहीं।बाप इच्छा मुक्त हो और मां निंदा मुक्त हो वहां जानकी प्रकट होती है।। दक्ष ने अपनी 13 कन्या को कहां-कहां ब्याह करवाया वह भी बताते हुए बापू ने कहा कि परमात्मा ने सबसे पहला रूप मां का भेजा है।। दूसरे रूप में पिता बनाकर, तीसरा आचार्य रूप से और चौथा कोई अतिथि बनकर परमात्मा आता है।।
लय माता है ताल पिता है।।
राम कथा में राम जन्म के बाद चारों भाइयों के नाम करण संस्करण हुए।। जो विश्व को आराम,विराम और विश्राम प्रदान करते हैं ऐसे महा तत्व को राम नाम पुकारा गया।। सबको प्रेम से भरण पोषण करें उसे भरत और शत्रु नहीं लेकिन शत्रुता को मार दे उनका नाम शत्रुघ्न और समस्त लक्ष्नों के धाम लक्ष्मण नाम द्वारा पुकारे गए।।
जो राम-राम रटते हैं उन्हें पीछे के तीनों नाम पर ध्यान देना चाहिए। राम राम रटने वाला सब का पोषण करें शोषण न करें। किसी से शत्रुता ना रखें और समाज का आधारक बने।।
जहां आश्रम है वहां अश्रु होते हैं। जहां आश्रम है वहां आश्रय होना चाहिए। आश्रम है वहां अभेद होता है।आश्रम है वहां अभय होना चाहिए। आश्रम सबको आराम प्रदान करें। सबको आरोग्य प्रदान करें और सबको पौष्टिक अन्न प्रदान करें उसे हम आश्रम का सकते हैं।।
विश्वामित्र का शुभ आश्रम यज्ञ रक्षा के लिए राम लक्ष्मण को लेने के लिए अयोध्या आए और रास्ते में चट्टान रूप से पड़ी शीला रूपी अहल्या का उद्धार करके आगे बढ़े।।
यहां कौन भूल नहीं करता! लेकिन जिस चंचलता ने हमें भूल करवाई है उसी को स्थिर कर देने से अयोध्या वाला खुद चलकर हमारे पास आएगा। जानकी मातृ पूजन के लिए पार्वती की पूजा के लिए पुष्प वाटिका में जाती है।।
जय-जय गिरिवर राज किशोरी।
जय महेश मुख चंद्र चकोरी।।
जय गज बदन षडानन माता।
जगत जननी दामिनी दुति गाता।।
मूर्ति मुस्कुराई, मूर्ति हीली,डोली और माला दी और पार्वती ने सीता मैया को आशीर्वाद दिया।।
बाद में धनुष्यभंग का प्रसंग और मंगल मूल लग्न दिन आया… चारों भाइयों के विवाह के बाद अयोध्या में आनंद हुआ और पैदल आए हुए साधु विश्वामित्र पैदल ही वन में लौट गए।।
तब बापू ने कहा कि कोई आए तो दुख देता है और किसी का गमन दुख देता है किसी का आगमन दुख देता है।।अयोध्या सुख संपत्ति से भरी हुई है और बाल कांड का समापन किया गया।।

