
*श्री भरत जी प्रेमपथ के मार्गी है।।*
*आसक्ति अनंत होती है आयुष्य सीमित होता है।*
*सुंदरकांड में श्री हनुमान जी ज्ञानमार्गी,आकाश मार्गी,गगन मार्गी है।।*
*कागभूशुंडी कथा मार्गी है।।*
*अति कृपा होती है तब जीव मार्गी बनकर चलता है।।*
*मंगल शब्द रामचरितमानस का सावित्री मंत्र है।।*
*विश्वास से भक्ति,श्रद्धा से ज्ञान और भरोसे से भगवान मिलते हैं।।*
*अन्यतोपि वस्तु उसे मिलती है जो अनन्य होते हैं।*
अपनी प्राकृतिक सुंदरता से ओतप्रोत दक्षिण अमरीकी प्रांत आर्कान्सा के लिटल रॉक स्टेट कन्वेशन सेन्टर,मारखम स्ट्रीट से मोरारिबापु के श्रीमुख से ९५९वीं रामकथा सहज एवं दिव्यता से भरा आरंभ हुआ।।
रामकथा के मनोरथी डोकटर साहब,कमलेशभाइ परिवार की और से आरंभ में शालु आदि दोनों बेटियों,बेटा सागर और कमलेश भाइ ने अहोभाव सद्भाव से स्वागत किया।।
बापु ने कथा विषय एवं कथा बीज पंक्तियों के बारे में बात करते हुए आरंभ में
*अति हरिकृपा जाहि पर होइ।*
*पॉंउं देहि एहि मारग सोइ।।*
*मिलेहू गरूड मारग मंह मोहि।*
*कवन भांति समजाउं तोहि।।*
बीज पंक्तियों का गान किया और कथा भूमिका को रखते हुए बताया कि:
परमात्मा की असीम कृपा से फिर एक बार इस देश में राम कथा के नाते हम नव दिन के लिए मिल रहे हैं।।
डॉक्टर साहब और परिवार ने अहोभाव व्यक्त किया वह बापू ने कहते हुए बताया कुछ दिनों से तलगाजरडा-चित्रकूट में वैष्णव साधु समाज के अग्रणी मिलने आए और बार-बार आग्रह करते थे कि एक बार नव दिन तक मार्गी,बैरागी साधु पर संवाद करें।।इसीलिए ‘मानस मार्गी’ शीर्षक बनाकर हम संवाद करेंगे।।
और युवाओं को समझाते हुए कहा कि मार्गी शब्द का अर्थ पथिक,यात्री,परिव्राजक,विचरण करने वाला,चरैवेति,ट्रावेलर्स,सतत यात्रा करने वाला और सतत मार्ग पर चलने वाला- ऐसा होता है।।
एक बार मानस मारग पर मुंबई में हरीश भाई संघवी के वहां कथा गान हो चुका है।।
रामचरितमानस में मार्गी कौन है? वैसे तो चलने वाले निरंतर गति करने वाले हम सब मार्गी है।। रामचरितमानस के प्रत्येक सोपान में महत्व के मार्गी है।।
प्रथम सोपान बालकांड में चार मार्गी है।। एक है भगवान वशिष्ठ- जो प्रारब्ध के मार्ग के मार्गी है।। प्रारब्धवादी नसीबवादी है।। दूसरे मार्गी महर्षि विश्वामित्र है-यह पुरुषार्थ मार्गी या तो कर्ममार्गी है सब कुछ कर सकते हैं। पुराणों की कथा के अनुसार नया स्वर्ग भी बनाया है।। तीसरे भगवान शिव मार्गी है-निरंतर घूमते रहते हैं और चौथे मार्गी देवर्षि नारद है-हर जगह घूमते हैं।।
अयोध्या कांड में राम लक्ष्मण जानकी-वो तो ब्रह्म है ब्रह्म को पैर नहीं फिर भी वह मार्गी है।। श्री भरत जी प्रेम पथ के मार्गी है।।
अरण्यकांड में शबरी बुध्ध मार्गी है। क्योंकि शबरी बड़ी अहिंसक रही।।अपने विवाह पर पिता ने हिंसक भोज रखा तो शबरी वहां से भाग गई है। शबरी योग मार्गी भी है।।
किष्किंधा कांड में सुग्रीव मार्गी है जो भोग मार्गी है। आसक्ति अनंत होती है आयुष्य सीमित होता है। सुंदरकांड में श्री हनुमान जी ज्ञानमार्गी आकाश मार्गी गगन मार्गी है।।
लंका कांड में रावण कुंभकर्ण आदि भोग मार्गी है आजकल जो माहौल है वैसे रावण युद्ध मार्गी है।। उत्तरकॉंड में काग भूसुंडी कथा मार्गी है।।
हम सब मार्गी है। चांद सूरज भी मार्गी है। पूरा जगत मार्गी है।। भारद्वाज से राम मार्ग पूछते हैं भारद्वाज मन में हंसते हुए कहते हैं कि आपके लिए सब मार्ग सुलभ है फिर भी चार शिष्यों को भेज कर वेद का मार्ग दिखाते हैं।। हमारे यहां वाममार्गी कुमार्गी शब्द भी है।।शंकराचार्य परिव्राजक है।। शुकदेव जी जन्म लेते ही यात्रा पर निकल पड़े हैं।। बहुत से राही,पथिक दिखते हैं।। लोग अपनी बेटियों का नाम भी मार्गी रखते हैं वह अच्छा सुकून है।। महाभारत और रामायण को संक्षिप्त अभिप्राय बतायें तो रामायण यह कहता है कि कौन से मार्ग पर चलना चाहिए और महाभारत किस मार्ग पर नहीं चलना वह हमें बताता है।। हम सब जन्म जन्म के यात्री हैं मुसाफिर है।। हमारा सनातन वैदिक रामायण गीता का मार्ग है।।
कृपा सब पर है कृपा ना होती तो हम मनुष्य नहीं होते लेकिन अति कृपा होती है तब जीव मार्गी बनकर चलता है।।
लंकाकांड में भगवान बंधन में आए तब गरुड़ को संदेह हुआ ब्रह्मा नारद को मिलकर शिवजी को मार्ग में मिला यही दो पंक्ति हमने उठाई है।।
फिर प्रवाही पवित्र और परोपकारी परंपरा के क्रम में रामचरितमानस के सात सोपान जो बाल्यावस्था से लेकर उत्तरावस्था तक की यात्रा है।। सब सोपान के तात्विक सात्विक अर्थ भी है।।
बालकांड के मंगलाचरण में सात मंत्र और वहां वाणी और विनायक को नमस्कार करते हैं।। महाभारत में सावित्री मंत्र है वैसे रामचरितमानस में मंगल शब्द प्रधान है।। मंगल शब्द रामचरितमानस का सावित्री मंत्र है।।
वाणी और विनय जीवन के लिए जरूरी है। वाणी सबके पास है विनय कहीं-कहीं नहीं है! रामचरितमानस और महाभारत में मातृशक्ति की बहुत इज्जत की गई है लेकिन लोग बिना पढ़े विरोध करते रहते हैं।। महाभारत में बहुत नारी पात्रों की वंदना की है।।
विश्वास से भक्ति,श्रद्धा से ज्ञान और भरोसे से भगवान मिलते हैं।।ज्ञान मार्गी के लिए गुरु मंत्र भी यहां दिखता है।।कपि और कवि भी सतत मार्गी है अन्यतोपि वस्तु उसे मिलती है जो अनन्य होते हैं। यहां पंचदेवों की वंदना पंचतत्व की तरफ संकेत है शिव पार्वती की वंदना शिव पृथ्वी के देव है।। विष्णु की वंदना में विष्णु जल तत्व है।। सूर्य आकाश तत्व गणेश वंदना में वायु तत्व और गुरु के वचन अग्नि तत्व है।।
पांच सोरठे के बाद गुरु वंदना का गान करने के बाद हनुमंत वंदना का गायन करके आज की कथा को विराम दिया गया।।

