
जानने के बाद भी आदमी प्रशांत ना रह सके तो यह जानने में धूल पड़ी!
सबकुछ होने के बाद फिर भी हक्क का कोई दावा ना करे वही साधु।
भाव और छलकती अश्रुधारा के साथ बहता रहा नरसिंह के पिता का श्राध्ध प्रसंग!
एकांत पना भजनानंदी की जागीर है,चेतना है,कथा मेरे लिए सबसे बड़ा एकांत है।।
गोपनाथ और गोपीनाथ दोनों के दर्शन जहां हुए वो गुजराती आद्यकवि नरसिंह महेता की प्रेमभूमिमे चल रही रामकथा का पांचवादिन।भगवानगोपनाथ के चरणों में प्रणाम करके यहां के दो ट्रस्ट ब्रह्मचारी ट्रस्ट और महंत ट्रस्ट के गादीपति सीताराम बापू और आत्मानंद जी बापू और ऐसे संतों महंतों की हाजरी में बापू ने कहा एक दो प्रश्न आए हैं।।नरसिंह मेहता का नाम नरसिंह है।। मनुष्य में सिंह। योग ऐसा भी हुआ है कि गोपनाथ भगवान के मंदिर में नरसिंह का स्वरूप भी विराजमान है।। पहले एक व्याख्यान माला में कहीं मैंने कहा था जैसे सिंह को पंचानन पांच मुख होते हैं वैसे यह नर रूपी सिंह नरसिंह के पांच मुख क्या है?नरसिंह के पदों के अवलोकन और अभ्यास के आधार पर कहे तो एक मुख्य वेदांत मुख्य है।।अद्भुत वेदांत प्रस्तुत करते हैं। इनमें भी शांकर वेदांत का बहुत आश्रय लिया गया है।।अखिल ब्रह्मांड मां एक तुं श्री हरि जूजावेरुपे अनंत भासे…ब्रह्म ही लटकां करें ब्रह्म पासे… ऐसे पदों वेदांत दिखता है।।
कई बार वेदांत आने के बाद वेदांत के ज्ञान के कारण व्यक्ति व्याकुल रहता है।।अन्य लोग वेदांत का स्विकार नहीं करते उनकी चीड़ और पीड़ा होती है।। इसलिए शास्त्रार्थ होते रहते हैं। वाद विवाद ही आए हैं।।आने नहीं चाहिए जैसे शंकराचार्य और मंडन मिश्रा के बीच विवाद संवाद हुए है। ओशो कहते हैं वहां बुद्धि हारी है।। हकीकत में तो यहां दूसरा है ही कौन!
यहां कौन किसको पत्थर मारे! कौन पराया है?
शीश महल में हर एक चेहरा अपना लगता है।।
किस से हराना है?खरे विद्वान के लिए विनित विद्वान शब्द में बार-बार कहता हूं।।
नरसिंह का विद्वता किसी को विघ्न रूप नहीं लेकिन सहायक बना है।।
दूसरा प्रशांत मुख है।।शामलशा के विवाह के बाद एक ही पुत्र शामलशा का मृत्यु और बाद में माणिक महेती का मृत्यु होने के बाद वेदांत को पकड़ कर रखा और लिखा:भलुनथयुंभांगीजंजाळ…यह प्रशांत मुख है।।प्रशांतचित् है।
जेखरुंगण्युंजगदीशेतेतणोखरखरोफोककरवो
जानने के बाद भी आदमी प्रशांत ना रह सके तो यह जानने में धूल पड़ी!
बापू ने कहा कि धन की चोरी तो पाप है ही,लेकिन धन का संग्रह भी पाप है।।सबकुछ होने के बाद फिर भी हक्क का कोई दावा ना करे वही साधु ऐसा लाओत्सू कहते हैं।। सात पीढी तक ठीक है लेकिन फिर कहां तक संग्रह?? अर्थ के पीछे १५ अनर्थ आते हैं ऐसे भागवत में लिखा है।। ज्यादा अर्थ आने के कारण चोरी करना,झूठ बोलना,हिंसा,मद,क्रोध, कामनाएं,लोभ, स्पर्धा,अविश्वास जैसे बहुत अनर्थ भी आते हैं।।
तीसरा मुख है भेदांत मुख।। भेद की दीवार को तोड़ने की बात और चतुर्थ मुख एकांत है।।वह अकेले में कीर्तन करने के लिए दामोदर कुंड चले जाते थे और हाथ में करताल लेकर कीर्तन करते थे एकांत वह भजनानंदी की जागीर है, चेतना है।। कथा मेरे लिए सबसे बड़ा एकांत है।। और पांचवा मुख भावांतहै।।भाव में वहां तक गहरे गए कि दूसरे का भाव का अंत आ जाए।।
आज बापू ने कल जो बात कही थी कि नरसिंह मेहता के पिताजी का श्राद्ध का प्रसंग हो तब पूरे पंडाल के लिए रसोई में खीर बनाइगा,और जो पुरी है वह आयुर्वेद के अनुसार तील के तेल से तली जाए आज सब व्यवस्था करके बापू ने फिर पूरे भाव और भीगी आंखों से,आंसुओं से भरा हुआ, नरसिंह मेहता के पिताजी का श्राद्ध जो आख्यान प्रेमानंद जी ने लिखा है वह पूरा आख्यान गान करके हुए रसास्वादन कराते हुए पूरे पंडाल को आंसुओं से भर दिया।।
और मेहता जी के पिता के श्राद्ध के बाद ठाकुर जी चले गए और मेहता केदार राग सुनाकर फिर वापस बुलाते हैं।।कहीं घटना जो चमत्कार नहीं साक्षात्कार है वह आज भी हो सकती है विज्ञान भी जहां पीछे रह जाता है फिर कथा के प्रसंग में पार्वती का दक्ष यग्य में देहत्याग का प्रसंग संक्षिप्त रुप से गाया गया।।

