
विश्व योगदिन,फाधर्सडे और विश्व संगीत दिन की दी गइ बधाइयां।।
नाम के पास बैठो क्योंकि रूप मोहित भी कर सकता है,रूप भ्रमित भी कर सकता है।।
मुक्ति का मार्ग वाया भारत जाता है।।
मुक्ति,भक्ति और भुक्ति-भोग को पाना है तो मृत्यु लोक,पृथ्वीलोक और भारत से गुजरना पड़ता है।।
नाम का संग,प्रसन्नता का संग और साधुसंग यह तीन मृत्यु लोक में होते हुए भी सत्य लोक,प्रेमलोककरुणालोक में प्रवेश करा सकता है।।
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अतिसयदेखि धर्म कैग्लानी।
परम सभीत धरा अकुलानी।।
बालकॉंड दोहा क्रमांक-१८३,चौपाई संख्या-४
धेनु रूप धरिहृदयँबिचारी।
गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी।।
-बालकॉंड दोहा-१८३,चौपाइ-७
हरिहउँ सकल भूमि गरुआई।
निर्भय होहु देव समुदाई।।
-बालकॉंड दोहा-१८६,चौपाइ-७
इन बीज पंक्तियों का गान करते हुए नव दिवसीय रामकथा के विराम के दिन,रविवार को उप संहारक बातें और शेष कथा को आगे बढाते हुए कोच्चि की पूण्य भूमि से बापु ने सब को प्रणाम करते हुए कहा की:आज तीन वस्तु का विशेष सहयोग हुआ है: आज विश्व योग दिन,फादर्सडे और विश्व संगीत दिवस-तीनों का योग हुआ है।सभी को योग दिन की बधाई देते हुए बापू ने कहा हम सबको बार-बार भगवद कथा का योग हो वही प्रार्थना।।
यहां निमित्त मात्र मनोरथीरमाबहनजसाणी परिवार की बेटियों के द्वारा सभी का अभिवादन किया गया बापू ने धन्यवाद दिया।।
गई सती जहां प्रभु सुखधामा…. सती राम की परीक्षा करने गई।सुखधाम के पास गई फिर भी दुखी है! शंकर नहीं गए,वह नाम के पास बैठे रहे।।नाम के पास बैठो क्योंकि रूप मोहित भी कर सकता है,रूप भ्रमित भी कर सकता है।।
रामचरितमानस में चार विधा है।परमात्मा अवतार लेते हैं तब चार वस्तु साथआतीहै:नाम,रूप,चरित्र लीला-गाथा और धाम लेकर आते हैं।यह चार ना हो तो कथा अखंड नहीं है।कथाचतुष्पाद गाय हैं। काम दुर्गा है।गाय अपंग या लंगडी नहीं होनी चाहिए। इन चारों के साथ हमारा योग कैसा होना चाहिए? नाम के साथ तीन बात जुडीहै:नाम जप-जप से सिद्धि प्राप्त होती है।नाम स्मरण और नाम संकीर्तन।।रूप का ध्यान करें।।यद्यपि आखिरी ध्यान समाधि की ओर गति करें तब रूप भी छूट जाता है।।लीला के साथ तीन वस्तु जुड़ी है:लीला का वर्णन,लीला का श्रवण और लीला का दर्शन।।धाम में शरण होती है राम का धाम विश्राम देता है।।
और यह सब उपसंहारक बातें करते हुए बापू ने कहा विनय पत्रिका में तुलसी जी ने लिखा है:हमबड़भागी है क्योंकि भारत भूमि में जन्म हुआ। मुक्ति का मार्ग वाया भारत जाता है।।मुक्ति,भक्ति और भुक्ति-भोग को पाना है तो मृत्यु लोक,पृथ्वी लोक और भारत से गुजरना पड़ता है।।जहां सुरसरि गंगा बहती है।।दूर्भावमयी स्पर्धा ऊर्जा का क्षय करती है एक तो यह देश,भूमि पूण्य श्लोक है,काल भी अच्छा है।क्योंकि कलयुग का विस्तृत वर्णन उत्तरकॉंड में करने के बाद तुलसी जी ने कहा कि कलयुग जैसा युग नहीं।क्योंकि अन्य युगों में ध्यान, यज्ञ,पूजा अर्चना करना पड़ता है।।वह सभी केवल नाम से कलयुग में प्राप्त होता है।। मनुष्यता की महिमा उत्तरकॉंड में राम ने की। एक प्रवचन किया है वहां कहे:
बड़े भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।।
मनुष्यत्व, मुमुक्षत्व और साधुसंग सूर दुर्लभ है ऐसा शंकराचार्य भी कहते हैं।।
शरीर धर्म का साधन है,मोक्ष का द्वार है। यह शरीर भवसागर तैरने की नाव है।।अनुग्रह अनुकूल पवन है और सद्गुरु रूपी कर्णधार कप्तान है।।देश,काल, पात्र योग्य प्राप्त हुए।।मृत्यु है तो छोड़ना पड़ेगा। धन्यभाव,अहो भाव,उत्सव के साथ छोड़ना पड़े तो तीन ही काम करें:१-नाम स्मरण।२-कोई भी परिस्थिति आए मुस्कुरातेरहे।और ३-प्रभु से प्रार्थना करना तुं नहीं चाहिए कोई साधु चाहिए। नाम का संग,प्रसन्नता का संग और साधुसंग यह तीन मृत्यु लोक में होते हुए भी सत्य लोक,प्रेमलोक करुणा लोक में प्रवेश करा सकता है।।
हर प्रकार से प्रसन्नता व्यक्त करते हुए बापू ने कहा कि निर्भय रहो।।इस रामकथा का सुफलजगदगुरु आदि शंकराचार्य के चरणों में समर्पित करते हुए शेष कथा में भगवान राम का राज्याभिषेक करवाते हुए कथा को विराम दिया गया।।
अगली ९८० वीं रामकथा ४ से १२ जूलाइ से देवभूमि हरिद्वार(उत्तराखंड) से शुरु होगी।।ये कथा का आस्था टीवी चैनल एवं चित्रकूटधामतलगाजरडायु-ट्युब चैनल के माध्यम से नियत नियमित समय पर जीवंत प्रसारण होगा।।
== समाप्त ==

