
विवाद विष है,संवाद अमृत है।।
संघर्ष अग्नि ही पैदा कर सकता है,समर्पण शितलता पैदा करता है।।
इतनी ऊंचाई पर होने के बाद भी इतने ही विनम्र रहे यह महापुरुषों का स्वभाव है।।
टायर होने के बाद ही रिटायर हो!ऐसा नहीं।
एक ही जगह ट्रस्ट रखो।।
सबको पकड़ता है तो एक छूट जाता है,एक को पकड़ता है तो सब मुट्ठी में आ जाता है।।
त्याग करना है तो कोई मुहूर्त देखना नहीं चाहीई
अत्यंत प्रवृत्ति से अमृत नहीं मिलता।।
ब्रह्म सलिला मॉं गंगा के पावन तीर पर बसी देवभूमि हरिद्वार के प्रेम आश्रम से बह रही कथा धारा जब सोमवार को सातवें दिन में प्रवेश कर रही है तब गंगा जी में मानसिक स्नान करते हुए नेपाल के तपोवन आश्रम-ओशो आश्रम से पधारे स्वामी जी और विशेष ओशो सन्यासीओं का स्वागत करते हुए बापू ने कहा की हमारे बीच में प्यार और मोहब्बत का संबंध है।।इतनी ऊंचाई पर होने के बाद भी इतने ही विनम्र रहे यह महापुरुषों का स्वभाव है।
कली पावनावतार तुलसी जी दोहावलि में दोहा लिखते है:
सधन सगुन सधरम सदन सबल सुसांइ महिप।
तुलसी जै अभिमान बीनु तेइ त्रिभुवन के दीप।।
जो धनवान,गुणवान,धर्मात्मा हो,जिसके पास बहुत बड़े आश्रित हो,बलवान हो,अच्छे मलिक का आश्रयी हो,अपने अध्यात्म क्षेत्र के सम्राट हो-यह सब होने के बाद भी जरा भी अभिमान नहीं है वह त्रिभुवन के दीप है।।जलेगा,किसी कोने में जलकर भी त्रिभुवन को प्रकाशित करेगा।।जैसे स्वयं प्रभा स्वयं जली है,लेकिन अभिमान नहीं किया है।।सूर्य उदित होता है तब छोटा दिखता है लेकिन उदित होते ही त्रिभुवन का अंधेरा हरता है।। छोटा अंकुश हाथी को वश कर लेता है,फूलों का धनुष्य बान लेकर कामदेव पूरे जगत को वश कर लेता है।।मंत्र बहुत छोटा होता है मगर ब्रह्मा,विष्णु,महेश को वश कर लेता है।। ऐसे जो चीज छोटी होती है अभिमान रहित होने के कारण छोटी दिखती है।। रामचरितमानस में यह सन्मान भरत को मिला है। दशरथ जी बार-बार कौशल्या को कहते थे यह भरत राम का छोटा भाई मात्र नहीं,कैकयी का पुत्र मात्र नहीं,केवल लक्ष्मण शत्रुघ्न का अनुज नहीं।।यह केवल संत नहीं,राम के बाद अयोध्या का वारस ही केवल नहीं।। यह रघुकुल का कुल दीपक है।।राम रघुवंश मणि है और भरत दीपक है।।अहंकार ही सब वस्तुओं की बाधा है।।किसी भी उपलब्धि और क्षमता का अभिमान करने जैसा नहीं। बहुत जागृत रहना।।कैवल्य उपनिषद की एक रुचा है वहां लिखा है:
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।
परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद्यतयो विशन्ति ॥
-कैवल्योपनिषद
उस (अमृत) की प्राप्ति न कर्म के द्वारा,न सन्तान के द्वारा और न ही धन के द्वारा हो पाती है।(उस) अमृतत्व को सम्यक् रूप से (ब्रह्म को जानने वालों ने)केवल त्याग के द्वारा ही प्राप्त किया है।स्वर्गलोक से भी ऊपर गुहा अर्थात् बुद्धि के गह्वर में प्रतिष्ठित होकर जो ब्रह्मलोक प्रकाश से परिपूर्ण है, ऐसे उस (ब्रह्मलोक) में संयमशील योगीजन ही प्रविष्ट होते हैं
एक उम्र हो जाए तो प्रवृत्ति छोड़ देनी चाहीई।।टायर होने के बाद ही रिटायर हो! ऐसा नहीं।अभी एक ही जगह ट्रस्ट रखो।।सबको पकड़ता है तो एक छूट जाता है और एक को पकड़ाता है तो सब मुट्ठी में आ जाता है।।त्याग करना है तो कोई मुहूर्त देखना नहीं चाहीई।।अत्यंत प्रवृत्ति से अमृत नहीं मिलता।। समाधि के पास बैठने से आवाज आती ना आती मालूम नहीं लेकिन यह आध्यातमिक सत्य है।।मैने समाधि के पास बैठने से गंध का अनुभव जरुर किया है।।मन बडा दूसंग है और मन से बड़ा सतसंग भी कोई नहीं।।विवाद विष है,संवाद अमृत है।।संघर्ष अग्नि ही पैदा कर सकता है,समर्पण शितलता पैदा करता है।।
अरण्य कांड की कथा आगे बढ़ते ही बापू ने एक प्रसंग पंजाब का छोटा लडका,अढ़िया जो एकादशी को व्रत नहीं करता लेकिन एक शिष्य की आवाज से गुरु को भगवान मिलते हैं ये पुरा प्रसंग बहुत अच्छी तरह करके पूरे पंडाल को खुश कर दिया और कथा को विराम मिला।।
== समाप्त ==

