
*बुद्धपुरुष व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व भी नहीं अस्तित्व है।*
*पांचो तत्वों का गुण साधु पुरुष में आ जाए ऐसे साधु व्यक्ति के रूप में हो तो भी स्वीकार करना।।*
*पांचो तत्व अमृत है।।*
*कथा अमृत है।।*
उत्तराखंड की देवभूमि,जहां परम पतितपावनी परोपकारिणी भगवती गंगामैया बह रही है ऐसे परम तीर्थ हरिद्वार में गुरुवार तीसरे दिन के कथा संवाद में जो हो गयी,जो है और आगे जो होंगी ऐसी प्रगट-अप्रगट चेतनाओं को वंदन करते हुए बापु ने कथा का आरंभ किया। बहुत सी बातें पूछी गई थी इनमें एक बात आई असतो मा सद्गमय,तमसो मा ज्योतिर्गमय,मृत्योर्मामृतं गमय- यह जो सूत्र है उसके बारे में कुछ और संवाद हो सकता है?
बापू ने बताया कि संवाद है तो हो सकता है। विवाद या दुर्वाद है तो नहीं हो सकता।मानस और हमारे सभी शस्त्र संवाद के शस्त्र है।।मेरी व्यास पीठ को पूछा है तो इतना ही कहूं:
असतो मां सद्गमय सत्य है।।हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो।।तमसो मा ज्योतिर्गमय हमें अंधेरे से प्रकाश की ओर लिए चलता है वह प्रेम है। रामचरितमानस के उत्तर कांड में इसका खुलासा है जब ज्ञानदीप की चर्चा और भक्ति मणि की बात आई वहां कहा है भक्ति मणि यह प्रेम प्रकाश है।।बापू ने याद किया ५५ साल पहले मस्तराम बापा को पूछा गया था तब बताया भक्ति प्रेम है।।प्रेम ऐसा प्रकाश है जहां घी,दीप और बाती की जरूरत नहीं कोई वायु इसे बूझा नहीं सकता।।तुलसी जी का बहुत लोगों ने मंथन किया इनमें साकेत वासी पंडित रामकिंकर जी महाराज भी है।
पीठ बेईमान नहीं होनी चाहिए।इनमें भी व्यास पीठ तो कभी बेईमान नहीं होनी चाहिए।।
जिनके पास राम का नाम,रूप,लीला और धाम है उसे किसी सामग्री की जरूरत नहीं ।।फिर भी कोई साहित्यकार का नाम लेकर जब बापू कहे मैं बोलता हूं तो वह भ्रांति में रहते हैं कि बापू ने मेरी सामग्री उठाई है! मेरी कथा सुन-सुन कर कभी मेरी ही बात बोलते हैं लेकिन हराम हमारा नाम बोले! तुलसी जी ने ऐसे कलिकल के वक्ता को मन वचन और कर्म से लबाड कहा है।।
राम जब भी लक्ष्मण को कहते हैं तब ‘देखहूं’ ज्यादा कहते हैं और भरत से बात करते हैं तो सुनहु शब्द कहते हैं।क्योंकि लक्ष्मण शेष का अवतार है और सर्प को कान नहीं होते।।
बुद्धपुरुष व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व भी नहीं अस्तित्व है। आप गुरु को क्या समझते इन पर यह आधार है। जिसमें पूरा अस्तित्व समाया हो।।पृथ्वी,जल,अग्नि आकाश,वायु ऐसा कोई भी ,व्यक्ति हो तो भी उसे गुरु कहने में हर्ज नहीं।रामकृष्ण परमहंस,महर्षि अरविंद वैसे अनेक है।।
वैसे प्रकृति के पांचो तत्व को जड़ बताया है।लेकिन ऊपर की जडता के भीतर बहुत चैतन्य छिपा है। पवन ऊपर से जड़ है लेकिन सदा बहती है,सक्रिय है अग्नि भी अक्रिय नहीं उर्ध्व गमन करती है। पृथ्वी जड़ बताई लेकिन गुप्त में जल बह रहा है।।खोदो तो पानी निकलता है और खुद घूमती रहती है।।आकाश जड़ है लेकिन आकाश से वाणी नाद शब्द ब्रह्म पैदा होता है।।जल को जड़ माना गया लेकिन सरितायेें बहती है। समंदर में खलबली चलती रहती है।।जीन साधु ने पांचो तत्वों की साधना की है वह पांचो अमृत बन जाता है।।
सत्य को शिव जी का त्रिपुंड कहा त्रिपुंड के बीच में जो टिका है वह सत्य का स्वीकार है।।सत्य का आचार,उच्चार और विचार के साथ स्वीकार।
यज्ञ किए बिना मौन नहीं तोड़ना यज्ञ करते हुए झूठ नहीं बोलता वह अग्नि की साधना है।।सहज रहना वह वायु की साधना।।निखालस चित असंग मनोवृति,विकार मुक्त चित् जिसे में प्रमाणिक डिस्टेंस कहता हूं- ना सट जाना न हट जाना! बिल्कुल मध्य में रहना-यह आकाश की साधना है भूमि शयन पृथ्वी की साधना।।पृथ्वी के साथ संपर्क बनाए रखना। धैर्यामृत, सहनामृत दो शब्द मिले हैं। पांचो तत्वों का गुण साधु पुरुष में आ जाए ऐसे साधु व्यक्ति के रूप में हो तो भी स्वीकार करना।।कभी लोग कहते हैं उनके हृदय में रहे राम को प्रणाम करता हूं, यह अहंकार है। सीधा प्रणाम करो।।पूरा अस्तित्व जिसमें है ऐसा व्यक्ति भी स्वीकार्य है। पांचो तत्व अमृत है।कथा अमृत है।।भागवत कहता है तव कथामृतम तुलसी ने कथा को सुधा कहा है। समुद्र का अमृत तो नमकीन होगा कथा अमृत मधुर है।।
बापू ने यह भी आनंद की बात बताई की अगली तुलसी जयंती अमेरिका के विश्वविद्यालय में मनाने जा रहे हैं।।होर्मुझ भी खुल गया है और अस्तित्व भी पूरा मदद करने जा रहा है।।
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