
व्यासपीठ बनी सप्तपदी की साक्षी।।
महापुरुषों के आशीर्वाद के कूप में डूबे रहे तो वजन नहीं लगता।।
यहां सभी लोगों का मत एक नहीं होता,लेकिन सत एक होता है।।
हर वक्त मुंह बिगाड़ दिया वह दुर्मुख है।
निंदा,शिकायतें आए तो दुर्मुख है।।
निरंतर क्रोध में बैठे तो हम दुर्मुख है।।
मैं और आप बार-बार झूठ बोलना शुरू करें तो दुर्मुख है।।
दूसरों की प्रगति देखकर अच्छा ना लगे तो हम दुर्मुख है।।
हरिद्वार की तीर्थभूमि में बह रही पापविमोचनी मॉं गंगा के प्रवाह में मानसिक स्नान करते हुए आठवें दिन का संवाद शुरु करते हुए व्यास पीठ पर आज तीन मंगल और सुंदर प्रकल्प रचे गए।।
आज अष्टम दिन,वैदिक परंपरा में अष्टम दिन का बहुत महत्व है।आज संयोग हुआ।व्यासपीठ वचनात्मक ही नहीं,सर्जनात्मक और रचनात्मक भी है और नई पीढ़ी व्यासपीठ का परम स्थान है। मनोरथी परिवार में ज्यादातर युवाएं व्यासपीठ की ओर मीट लगाए बैठे हैं।।वहां आज आनंद का उत्सव था।व्यास पीठ सप्तपदीका बनी।।
मनोरथी परिवार का समीर भाई और विनाबहन की पुत्री वृक्षा और जगदीश भाई और गीताबहन के पुत्र प्रेम-दोनों युवक-युवती लग्न ग्रंथि से जुड़े।।व्यास पीठ के सामने वरमाला पहनकर,बापू से आशीर्वाद प्राप्त करके जब सप्तपदी क्रियाविधि हो रही थी तब बहुत अच्छी तरह संचालन संकलन करते हुए भद्रायु भाई वच्छराजानी ने मंगलाष्टक का एक अष्टक गाकर वैदिक विधि से यह पूरा किया।।
साथ ही ओशो सन्यासी काठमांडू के तपोवन आश्रम से बोधिसत्व स्वामी आनंद अरुण जी ने अपनी एक पुस्तक को व्यास पीठ के हाथों से लोकार्पित किया और साथ ही अपने शब्द भाव रखते हुए कहा कि: २००२ में पूज्य बापू को भारत सरकार की ओर से भारत का श्रेष्ठ पद्मश्री सम्मान अर्पण हो रहा था। बापू ने अपने विनम्र भाव से शालीनता से इनकार किया और कहा कि साधुओं को यह शोभा नहीं देता साधु अपने आप से सम्मानित ही है-ऐसे एकमात्र व्यक्ति बापू है।। बापू ने राम और रामकथा का कई देशों में प्रचार प्रसार किया है।।साथ यह भी बताया कि हमारे वहां रामकथा का गान भी किया है और कथा के माध्यम से दुनिया भर में कहां-कहां गए हैं बापू को ईश्वर लंबी उम्र दे,क्योंकि दुनिया के और देश में भी रामकथा का गान हो सके।।
भद्रायुभाई ने भी और एक तीसरा प्रकल्प-जब गुजरात के महुआ के पास भादरा वीरबाई मां का नेस (यह स्नेह शब्द से नेह और नेह से नेहडा़ शब्द आया है)में इस छोटे गांव के,छोटे नेस में पाटोत्सव हुआ था।।वहां का डॉक्यूमेंटेशन करने के लिए भद्रायु भाई को कहा गया था।तब बापू ने कहा था कि मेरे लिए बोले गए शब्द निकाल के पुस्तिका तैयार करना।।वह पुस्तिका महामंडलेश्वर सतुआ बाबा,शिवराम बापू-कबीर आश्रम और स्वामी जी के हस्तों व्यास पीठ को अर्पण की गई।।
बापू ने भी कहा कि सप्तपदी के मंत्र एक परम नगर ब्राह्मण(भद्रायु भाई) ने बहुत अच्छे से गान किया। और अपनी तरफ जब प्रशंसा की बारिश होती रही उन पर बापू ने कहा कि जब घड़ा पानी में रहता है तो वजन का अनुभव नहीं लगता। महापुरुषों के आशीर्वाद के कूप में डूबे रहे तो वजन नहीं लगता यहां सभी लोगों का मत एक नहीं होता,लेकिन सत एक होता है।।
पुणे में (मानस नृत्य) कथा ओशो को अर्पण की, फिर काठमांडू के तपोवन में और जबलपुर में भी एक कथा की।।साथ ही यहां पाटोत्सव में छोटे से गांव में छोटे नेह में समझदार साक्षर आए।।
बापू ने यह भी मनोरथ व्यक्त किया कि दो महान फिलॉस्फर सर्वपल्ली राधाकृष्णन और जिदु कृष्णमूर्ति पर एक कथा-मानस राधा कृष्णमूर्ति करने का मनोरथ है।।केंद्र में कृष्ण होगा।कहां करें कब करें मालूम नहीं।। हो तो हरिकृपा ना हो तो हरी इच्छा!!
अमृत की बात शंकराचार्य शुरू करते हैं वहां कौन धारा,कौन कुंभ,शिखर कौन,कलश कौन यह सब अमृत की संज्ञा देते हैं।।गीता का भी आश्रय लेंगे और रावण की नाभि में अमृत कुंभ है और पंजाब की गुरु भूमि अमृतसर कैसे भूल पाएंगे!
बापू ने कहा चार दुश्मन को बड़े दुश्मन माने हैं।। वैसे रावण,कुंभकर्ण,इंद्रजीत सांकेतिक रूप में दुश्मन है।।जो मोह,काम,अहंकार,लोभ आदि है लेकिन रावण स्वयं कहता है कुंभकरण के पास जाकर,चार मर गए:दुर्मुख,सूररिपु,अतिकाय और महोदय।।इन चारों को राम,लक्ष्मण ने नहीं बंदर भालू ने मारा है-जो हमारे छोटे बड़े साधन है।।हमारे आंतरिक दुश्मनों को मारते हैं।।
कोई सराहना करें या निंदा करें तो सब सहन करो।। दुर्मुख ना बनो।हर वक्त मुंह बिगाड़ दिया वह दुर्मुख है।।निंदा,शिकायतें आए तो दुर्मुख है।।निरंतर क्रोध में बैठे तो हम दुर्मुख है।। मैं और आप बार-बार झूठ बोलना शुरू करें तो दुर्मुख है।।दूसरों की प्रगति देखकर अच्छा ना लगे तो हम दुर्मुख है।।सूर रिपु का अर्थ दैवी विचारों और गुणों का विरोधी।। यह मनुज आहारी मनुष्यता का,मानवता का नाश करता है। अतिकाय-अकंपन मतलब चारों ओर से चलती हवा के सामने कंपन ना आए।।महोदर बड़ा पेट जिसे संतोष ही ना हो।और महाभारत में समाधान है हमारी प्रशंसा हो तो अग्निहोत्री बनकर जला दो। अकंपन रहने के लिए स्वाध्याय करो।।आदर के साथ यज्ञ करने से महोदर का,बढ़ते लोभ का उपाय है।।
सुंदरकांड की तिहाइ: ज्ञान तितिक्षा और प्रतिक्षा है बापू ने यह भी इशारा किया कि जब राम मंदिर शुरू हो रहा था तो पिठोरिया हनुमान की कथा में १९ करोड रुपए की राशि इकट्ठी करके हमने दी थी। लेकिन रुपिया भी बहुरूपिया होता है!
शंकराचार्य की विवेक चूड़ामणि का एक श्लोक कहता है:
मोक्षस्य काङ्क्षा यदि वै तवास्ति
त्यजातिदूराद्विषयान् विषं यथा
पीयूषवत्तोषदयाक्षमार्जव-
प्रशान्तिदान्तीर्भज नित्यमादरात् ॥
८४-विवेकचूडामणि
(यदि तुझे मोक्षकी इच्छा है तो विषयों को विषके समान दूर हीसे त्याग दे।और सन्तोष,दया,क्षमा, सरलता,शम और दमका अमृतके समान नित्य आदरपूर्वक सेवन कर।।)
यह भी बताया कि ६ वस्तु:संतोष,दया,क्षमा, आर्जव( विनम्रता),प्रशांति,संयम यह सब को भजने से, नित्य सेवन करने से अमृत की तरफ गति होती है।।
अरण्य कांड के बाद सुंदरकांड का भी संक्षिप्त रूप में गान करके सुंदरकांड की तिहाइ:मैत्री,ज्ञान और स्वयं प्रभा को दिखाकर लंका कांड में सेतुबंध रामेश्वर की स्थापना की गई।।कल इस रामकथा का विराम का दिन है।।
== समाप्त ==

