
कृपा किसी के उपर होती है,साधुता अर्जित करनी पडती है।।
आप के मुख से साधु शब्द निकले तो आप के पूर्वजों के पाप भी कटने लगेंगे।।
मेरी वाटिका के फ्लावर मुजे तीन रीत से खिंचते है:सुगंध,पराग और मकरंद।।
मूल परस्पर टकराते है फिर भी अग्नि प्रगट नहि होगी,शाखायें टकराती है तो अग्नि प्रगट होता है,मूल को पकड के रखो।।
आज सब अपनी शाखा पर अपने घोंसले बनाकर मूल की ऐसी तैसी कर रहे है।।
श्रध्धा,भक्ति,योग ये तीन मूल है।।
मानस के रिषिओं के वंदन का चौथा चरण,रामकथा का चौथा दिन,यमुना तट पर बसी भूमि और उपस्थित महानुभावो और सब को प्रणाम करते हुए एक जिग्यासा को उठाते हुए बताया कि इतने रिषि मुनि है तो उन के बीच कोइ भेद होता है क्या?कालभेद,विचार भेद रहा है।।विचारवान आदमी होगा तो राग-द्वेष नहि लेकिन विचार का अधिकारी तो है।।साधुओं के बीच साधना मार्ग का भेद भी है।।कोइ योग मार्ग,कोइध्यान मार्ग,कोइ ग्यान मार्ग कोइ कर्मठ है।।कोइ समाज के बीच कोइ एकांत में बैठकर विश्व की चिंता करता है।।भेद शब्द लगाना पड़ता है,तत्वत: कोइ भेद नहि है।।
श्रीमद् भगवद गीता में दिखाइ ये ८ वस्तुओं में रिषि,मुनि,तापस,ब्रह्मचारी,गृहस्थ,वानप्रस्थ,संन्यासी कोइ है लेकिन भेद नहि।।
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्।।
श्रीमद भगवद गीता,आध्याय-१०,श्लोक-१३-१३
अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं कि आप ही परम ब्रह्म (परम सत्य),परम धाम (परम आश्रय/लोक) और अति पवित्र हैं।आप ही सनातन (शाश्वत) दिव्य पुरुष,आदिदेव (सबसे पहले देव), अजन्मे (अज) और सर्वव्यापिनी विभूति वाले हैं।।
कोइ भी रिषि,नारद आदि देवर्षि हो इनमें भेद नहि देखता।।
इन आठ तत्वों से भरपूर भगवान श्री कृष्ण के पास पहुंचने के मार्ग बिलग-बिलग हो सकते है।।जो मूल तत्व है इनमें कोइ भेद नहि,चाहे कितना भी कालभेद है।।
विचारभेद तो होगा।वसिष्ठ बिलकूल प्रारब्धवादी है।।रामचरित मानस में हरि इच्छा तो बलवान है ही,भावि भी बलवान है।।भगवान शंकर भावि को भी मिटा सकते है।।ये आठ परम तत्व की ज़ड है।।
रामचरित मानस के चारों घाट पर बैठे वक्ता साधु है।।किसीने शास्त्री,पंडित,पुराणी,भट्ट जी या विद्वान होने का दावा नहि किया है।।तुलसी साधु वक्ता है।।कृपा किसी के उपर होती है,साधुता अर्जित करनी पडती है।।कृपा तो राक्षसों पर भी हूइ।लंका के युध्ध के बाद राम जी ने इंन्द्र से कहा की अमृतवर्षा सब पर करो।।रण मेदान पर उपर से अमृतवर्षा हूइ।।बंदर आदि जीवित हूए और राक्षसों को परम मुक्ति मिली।।कोइ भेद नहि गोपी हो की कुब्जा।।
याग्यवल्क्य गृहस्थ साधु है।मैत्रयी और कात्यायनि के पति है।।बहूत समृध्ध है।जब संन्यास की बेला आइ तब दोनों से मिलकर बताया की सबकुछ आप दोनों के बीच बॉंट देता हुं।।कुछ भी शाश्वत नहि।।तब मैत्रेयि ने कहा की जो अशाश्वत है वो आप हमें क्यों दे रहे है।।मैं भी आप के साथ संन्यास लेना चाहती हुं।।याग्यवल्क्य वचन विवेकी है।।
साधु के बारे में बहूत कहेना है जब कोइ परम साधु कृपा करेंगे तो कथा करुंगा।कथा का शिर्षक रखुंगा:मानस-साधु साधु साधु।।
आप के मुख से साधु शब्द निकले तो आप के पूर्वजों के पाप भी कटने लगेंगे।।
मेरी वाटिका के फ्लावर मुजे तीन रीत से खिंचते है:सुगंध,पराग और मकरंद।।
फिर साधु ही भंवर बनकर ऐसे फ्लावर्स के इर्द गीर्द रामकथा की चौपाइ गुनगुनाता है।।
बापु ने कहा की आप की व्यस्तता के कारण आप बच्चों को मोबाइल पकडा देते हो।।बच्चों को मोबाइल नहि मानस पकडावो।।
अर्थ में १५ प्रकार के अनर्थ छीपे है ऐसा भागवत में लिखा है।।
मूल परस्पर टकराते है फिर भी अग्नि प्रगट नहि होगी,शाखायें टकराती है तो अग्नि प्रगट होता है।।मूल को पकड के रखो,शाखायें लडती रहेगी।।सनातन मूल है,छोटे बडे संप्रदाय शाखायें है।।शाखा तूटकर गीर सकती है।।मूल कभी तूटता,गिरता नहि।।आज सब अपनी शाखा पर अपने घोंसले बनाकर मूल की ऐसी तैसी कर रहे है।
श्रध्धा,भक्ति,योग ये तीन मूल है।।
कथा प्रवाह में तुलसी जी ने रामचरित मानस की रचना करके प्रकाशन किया,अति संक्षेप में शिव चरित्र का उल्लेख करके जब पार्वती आर्त भाव से वेदविदित वटवृक्ष के नीचे बिराजीत शंकर से रामकथा पूछती है वहां पर कथा का विराम हुआ।।
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