
वक्ता रथी और पोथी सारथी है।।
प्रिय बात और सत्य बात दो पहिये है।।
प्राणबल और मनोबल दो घोड़े हैं।।
स्वाध्याय का अर्थ है स्व का अध्याय पढ़ना।।
व्यासपीठ भी एक रथ है।
रामायण की कथा नव दिवसीय कथा ना समझे,यह विचार शिबिर है।
अपनी भूल का स्वीकार न करना सबसे बड़ी भूल है।।
जगन्नाथ जी मंदिर-अमदावाद के दिलीपदास जी बापु और निर्मोही अनीह अखाडे के मंत्री राजेन्द्रदास जी बापु जैसे विशेष महानुभावों की उपस्थिति में आठवें दिन की कथा के आरंभ में तैतरीय उपनिषद के शिक्षावलि का नवम अनुवाद का गान किया।यहां लिखा है:
ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च।
सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च।
तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च।
दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च।
शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च।
अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने च।
अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च।
अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च।
प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च।
प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च।
प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च।
सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः।
तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः।
स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः।
तद्धि तपस्तद्धि तपः।
-तैतरीय उपनिषद,अनुवाद नव
ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च”तैत्तिरीय उपनिषद (शिक्षावल्ली,नवम अनुवाक) का एक अत्यंत प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण मंत्र है।इसका अर्थ है:कर्तव्य का पालन (या सत्य आचरण) तथा स्वाध्याय (स्वयं अध्ययन) और प्रवचन (ज्ञान का प्रसार) करते रहना चाहिए।
कई प्रकार के मंत्र श्रुति और स्मृति के रूप में आये। और स्मृति और श्रुति की रचना कैसे हुई वह भी बापू ने बताया और कहा की स्वाध्याय का अर्थ है स्व का अध्याय पढ़ना।।स्मृति कहती है पहले अपना अध्ययन कर फिर प्रवचन कर! जो बहुत सुनता है और स्व का अध्ययन करता है वह प्रवचन कर सकता है।। रुत को सुनो, प्रकृति के नियम उसे रूत कहते हैं।। प्रकृति के पांच नियम बताए हैं:
छीती,जल,पावक,गगन समीरा-यह पांच तत्व है।। इनसे हमारा शरीर और सब कुछ बना है।यह प्रकृति के रूप के अपने स्वभाव है।अग्नि का स्वभाव उष्णता,जल का स्वभाव शीतलता,पवन का स्वभाव बहते रहना,धीरता पृथ्वी का स्वभाव है।आकाश का स्वभाव असंगता है।कोई आलोचना करता है तो वह दुर्जन का स्वभाव है।किसी की प्रशंसा वह सज्जन का स्वभाव है।।
भारतीय ऋषियों ने अंदर रहे पांच तत्वों का संशोधन किया और विज्ञानयों ने बाह्य पांच तत्वों का संशोधन किया,यह परिणाम तो देगा लेकिन शांति नहीं देगा।।
व्यासपीठ भी एक रथ है।रामायण की कथा नव दिवसीय कथा ना समझे,यह विचार शिबिर है। यहां बताया कि सत्य का स्वाध्याय करें।।क्रोध के रथ में द्वैत बुद्धि दो घोड़े हैं।लोभ के रथ में इच्छा और दंभ के दो घोड़े हैं।काम रूपी रथ के दो घोड़े नर और नारी है।।अपनी भूल का स्वीकार न करना सबसे बड़ी भूल है।।
बापू ने कहा की देव यज्ञ,पितृ यज्ञ,भूत यग्य,मानव यज्ञ और अतिथि यज्ञ यह पांच यज्ञ के साथ वंश वृद्धि के लिए स्वाध्याय प्रवचन कर ऐसा कहकर वेद कहता है धर्म के विरुद्ध ना हो ऐसे प्रजनन का यज्ञ और जनता,लोग समाज को आदर दे ऐसा यज्ञ कर।।
कोरोना काल में जब मैं एक घंटा बोलता था तब मैं दस प्रकार के रथ की बात करी थी।।वहां दशरथ भी है और सभी रथ के सारथी भी हमने बताए थे।। जिन में दशरथ,मनोरथ,धर्म रथ,देवरथ,जीवन रथ, राम रथ,कामरथ,सागर रथ,भगीरथ,देहरथ और अभिरथ है।।वक्ताओं का रथ व्यास पीठ है।।वक्ता उनका रथी और पोथी सारथी है।।प्रिय बात और सत्य बात दो पहिये है।।प्राण बल और मनो बल दो घोड़े हैं।।
फिर भूसुंडी जी के क्रम में संक्षिप्त में एक-एक प्रसंग और कांड का दर्शन करते और करवाते अरण्य कांड में सूर्पणखा एवं खर दूषण की गति बताई।।खर और दूषण राग और द्वेष है।यह परस्पर राम दर्शन से समाप्त होते हैं।।
राम का चातुर्मास का वर्णन आया तब आज से शुरू होते चातुर्मास की भी बापू ने बात कही।।
किष्किंधा कांड के बाद सुंदरकांड का आरंभ हुआ और सुंदरकांड के अंत में लंका के तट पर सागर के तट पर उत्तम धरनी देखकर सेतुबंध रामेश्वर की स्थापना हुई और आज की कथा को विराम दिया। कल इस रामकथा का विराम का दिन है।।
== समाप्त ==

