Homeगुजरातराम का रथ दिव्य, रावण का भव्य और ये आंतर रथ सेव्य...

राम का रथ दिव्य, रावण का भव्य और ये आंतर रथ सेव्य है।।

बल,विवेक,दम और परहित यह चार धर्मरथ के घोड़े हैं।।

इश भजन आंतर रथ का सारथि है।।

साधु के धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष पर प्रहार किये जाते है।।

ब्राह्मण और सद्गुरु की पूजा अभेद कवच है।।

केन्या की भूमि पर राम जन्म का मंगल गान हुआ और राम प्रागट्य की त्रिभुवन को बधाइयां बांटी गइ।।

केन्या की प्राकृतिक भूमि बापु के चरणों से पवित्र बनी है तब केरिचो शहर की वादियों के बीच मंगल करनि,कलिमल हरनि कथायात्रा गुरुवार को छठ्ठे दिन में प्रवेश कर रही है।।

संतो और महापुरुषों की आशीर्वादक छांव को प्रणाम करते हुए आज रामकथा में दो विशेष महानुभावों की उपस्थिति रही।अहमदाबाद जगन्नाथ मंदिर के महंत सरल चित् दिलीप दास जी बापू और निर्मोही अखाड़ा के मंत्री राजेंद्र दास बापू की उपस्थिति को प्रणाम करके बापू ने कहा मानस रथ यात्रा लक्ष्य तक पहुंचे इससे पहले फल मिल गया! बापू ने अपनी प्रसन्नता का भाव व्यक्त किया।।

अंतर यात्रा को पूरी तरह समझने के लिए एक मंत्र गान किया। भीतर की यात्रा को समझने के लिए तीन वस्तु समझनी होगी।।लंका के रण मैदान में दो प्रकार के रथ है।रावण का रथ जो भव्य है।राम पैदल है।देवताओं देवराज इंद्र ने मातली नमक सारथी के साथ एक रथ भेजा है जो दिव्य है। पूरा रथ तेज पुंज से भरा है।यहां लिखा है:

तेज पुंज रथ दिव्य अनूपा।

हरषिं चढ़े कोशलपुर भूपा।।

रामचरितमानस में ६८ बार रथ शब्द आया है। यह ६८ तीर्थ है। धर्म रथ का ११ पंक्ति में वर्णन है। मनु महाराज ने १० लक्षण कहे,तुलसी जी ने ११ बताएं देवताओं का रथ ऊपर से आया,रावण का रथ पाताल से और यह अंतर रथ धरती पर है। यह सेव्य रथ है।।

सत्य शील दृढ़ ध्वजा पताका बल और विवेक आंतरिक है।।बल,विवेक,दम और परहित यह चार घोड़े हैं।। चारों घोड़े को तीन बागडोर से पकड़े हैं। पहले और दूसरे के बीच में एक,दूसरे और तीसरे के बीच में एक डोरी,तीसरे और चौथे के बीच में एक डोरी।।बल और विवेक के घोड़े के बीच में समता की रस्सी, विवेक और दम रूपी घोडों के बीच में कृपा की बागडोर,दम और परहित के बीच में क्षमता की रज्जू जोड़ी गई है।।यह आंतरिक रथ है इसलिए इश भजन सारथि है।।

प्रहार करने वाले चार वस्तु पर प्रहार करते हैं।साधु पर प्रहार होता रहता है।।जो धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष पर प्रहार करते हैं।।किसने कितनी सनातन धर्म की सेवा की ऐसा कहकर धर्म के ऊपर प्रहार करते हैं।सफलता न मिलने पर अर्थ के ऊपर उनके पास कितना अर्थ है वह गलत आंकड़े वायरल करते रहते हैं।सफल न होने पर चरित्र हनन, परिवार का या व्यक्तिगत चरित्र हनन पर जाते हैं।वहां भी सफल न होने पर हत्या तक पहुंच जाते हैं! लेकिन जिनके पास रथ का सारथी भजन होगा,वैराग्य की ढाल, संतोष की कटार कृपाण होगी, दान रूपी परशु कुहाडा होगा उसे कुछ नहीं होगा।। इसलिए दान शीघ्र कर देना चाहिए।।श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष्य है यह वह है जो हिंसा न करें।यह बाण चढ़ाया बगर का धनुष है।।आंतरिक रथ में बाण निकाल कर चढ़ाना नहीं।।संयम नियम रखना पर्याप्त है,दिखाने की जरूरत नहीं,वार नहीं करना चाहिए।।निर्मल और अचल मन यह बाण है।। शूरवीर के शरीर पर कवच ना हो अभेध बख्तर ना हो तो अच्छा नहीं होता।।यहां ब्राह्मण और सद्गुरु की पूजा अभेध कवच है।कवच ब्राह्मण है अभेध शब्द साधु के लिए गुरु के लिए लिखा है।।

राम के तीन सखा थे:सुग्रीव विभीषण और गृह।। सुग्रीव विषयी है,विभीषण साधक और गुह सिद्ध है।। सबसे बड़ा बलवान शत्रु संसार है इसलिए राम कहते हैं है सखा! तुं धैर्य धारण कर इस रथ से इस जीत जाएगा और जो यह मंत्र बापू ने पठन किया

वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम्।

नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुन:॥

-श्वेताश्वतरोपनिषद-अध्याय-६,श्लोक-२२

श्लोक का अर्थ:वेदान्ते परमं गुह्यम्: वेदांत (उपनिषदों) में यह सबसे बड़ा और परम रहस्य बताया गया है।पुराकल्पे प्रचोदितम्: इसे प्राचीन काल में भी परम गोपनीय ज्ञान के रूप में कहा गया था।नाप्रशान्ताय दातव्यम्: यह अशांत मन वाले या संयमहीन व्यक्ति को नहीं देना चाहिए।नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः: और न ही ऐसे पुत्र या शिष्य को जो इसके योग्य (अनुशासित) न हो।मुख्य बातेंगोपनीयता: आत्मज्ञान या ब्रह्मविद्या केवल पात्र और शांत चित्त वाले जिज्ञासु को ही दी जानी चाहिए।पात्रता: ज्ञान प्राप्त करने के लिए मन की शांति और गुरु के प्रति समर्पण जरूरी है।

आंतरिक रथ समझने के लिए शंकराचार्य जी का यह मंत्र जहां पांच बातें लिखी है। वेदों का नित्य पाठ करो। जहां रामायण गीता या हनुमान चालीसा का नित्य पाठ करो।।अपने गुरु की पादुका की नित्य सेवन करो।प्रणाम करो।। समझदार के साथ वाद विवाद ना करो।।रोज भिक्षा भाव से भोजन करो और एकांत में रहो।।यह करने से आंतरिक रथ समझ में आएगा।।

फिर राम जन्म के पंच कारण की संक्षिप्त कथा कहकर अयोध्या में पुत्र कामेष्टि यज्ञ किया गया और बाद में पृथ्वी ने प्रार्थना की और राम जन्म की स्तुतियों का गान करते हुए अयोध्या नगरी में भगवान राम का प्रागट्य हुआ।।राम जन्म की प्रागट्य की पूरे त्रिभुवन को बधाई देते हुए आज की कथा को विराम दिया गया।।

== समाप्त ==

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