
*साधु का पुरुषार्थ और प्रारब्ध मनोरथ-रथ के दो पहिये है।।*
*मनोबल और प्राणबल मनोरथ रूपी रथ के घोड़े हैं।।*
*बलभद्र,सुभद्र और जगभद्र इस रथ के साक्षी है*
*मनोरथ का लक्ष्य सत्य,प्रेम और करुणा है।।*
*गुरु रथ नहि,सारथी है।*
*गुरु मन का ज्ञाता भी है,निर्माता भी है।।*
*रथी तो परमात्मा है।।*
*सदगुरु और सदग्रंथ हमारे साथ-साथ चलते हैं।।*
*जब तक रथी को भव सिंधु से पार ना करा दे तब तक सारथी रुपी सद्गुरु उतरेगा नहीं।।*
*हिम्मत करके परमात्मा के पास ऐश्वर्य नहीं आंसू मांगना।।*
केरिचो-केन्या की खूबसूरत धरा पर चल रही भीतरी यात्रा करवाती रामकथा आज शुक्रवार सातवें दिन में प्रवेश कर रही है तब इस पावन भूमि को नमन करते हुए जगन्नाथ मंदिर अहमदाबाद के सद्गुरु दिलीप दास जी और निर्मोही अनीह अखाड़े के महामंत्री राजेंद्र दास बापू,वृंदावन धाम के रचयिता, और महामंडलेश्वर गोपाल बाबा,शास्त्री जी,पार्थ बापू,कबीर बापू,गुणु बापू,सभी वारकरि संप्रदाय के साधक,परभणी महाराज-सबको प्रणाम करते हुए साथ में आए हुए भद्रायु भाई और नितिन भाई और व्यासपीठ की सेवा में निरंतर लगे रहते ऐसे कठिन के कठिन काम सरल करने वाले अहमदाबाद से आए दाणी चाचा,चाहे गंगोत्री हो,यमुनोत्री,केदार, बद्रीनाथ हो कि कदंब गिरी हो कुटिया की मावजत करते हुए निरंतर मेहनत करते शीतल जी और गुणवंत साउंड के नीलेश वावडिया और नरेश काका निमित्त मात्र मनोरथी परिवार और सभी संगीत गण का भी परिचय करवाते हुए बापू ने कहा कि सबके साथ तलगाजरडी मिट्टी से बने बुद्धपुरुष का एकमात्र आश्रित-आपका मुरारी बापू!!
कल पूछा गया था कि गुरु को रथ बना सकते हैं? नहीं,गुरु सारथी है।गुरु मन का ज्ञाता भी है,निर्माता भी है।।हम और आप अपने गुरु को सारथी बना सकते हैं।रथी तो परमात्मा है।।
गुरु और ग्रंथ दोनों महत्व के हैं।कोई सारथी ऐसा नहीं देखा होगा जो रथी को बिठाकर लगाम छोड़ दे और रथी को नीचे उतरने से पहले खुद उतर जाए! गुरु और ग्रंथ तटस्थ रहकर,दूर रहकर मार्गदर्शन करते हैं,लेकिन सदगुरु और सदग्रंथ हमारे साथ-साथ चलते हैं।।वेदांत और उपनिषद में केवल गुरु शब्द है।लेकिन मध्यकालीन काल में सद्गुरु शब्द आया।।सद्गुरु सदैव साथ चलता है।विवेक चूड़ामणि में शंकराचार्य जी कहते हैं:
*तटस्थिता बोधयंति गुरवः श्रुतयो यथा।*
*प्रज्ञयैव तरेद्विद्वानीश्वरानुगृहीतया॥476॥*
गुरु और शास्त्र किनारे रहकर,तटस्थ रहकर हमें मार्गदर्शन करते हैं लेकिन सदगुरु और सदग्रंथ हमारे साथ-साथ चलते हैं।।गुरु खड़े होकर मार्गदर्शन के द्वारा कहते हैं कि तेरी प्रज्ञा से अब तुं तैर! ईश्वर के अनुग्रह के कारण तेरी प्रज्ञा जागृत है।।जब तक रथी को भव सिंधु से पार ना करा दे तब तक सारथी रुपी सद्गुरु उतरेगा नहीं।।राज्य का सच्चा सारथी सचिव होता है। हनुमान जी सचिव है इसलिए रथ के ध्वज में सदैव साथ-साथ रहे हैं।।
एक बहुत बड़ा महत्व का रथ है,जिसका नाम है: मनोरथ।। मनोरथ आंतरिक होता है।यह समझने के लिए कथा के क्रम में जाए तो कल राम प्रागट्य हुआ एक महीने का दिन हुआ।नामकरण संस्करण हुआ और भरत जी का स्वभाव,शील राम जैसा है,सब को भरता है वह भरत है।।जो किसी का शोषण नहीं विश्व का पोषण करेगा।और सुमिरण करते ही शत्रुता का नाश करें वह शत्रुघ्न है।सब नाम वैश्विक है। हिम्मत करके परमात्मा के पास ऐश्वर्य नहीं आंसू मांगना।।
विश्वामित्र दशरथ के दरबार में आए। लेकिन देर ना लगी क्योंकि उनके पास जो रथ है वह मनोरथ है।। विभीषण राम के पास मनोरथ करते-करते आया। सूतिक्ष्ण भी राम आएंगे ऐसा मनोरथ करके घूम रहे हैं।मानस में मनोरथ शब्द का बहुत बार प्रयोग हुआ है। यह गुप्त रथ है,स्थूल नहीं।आंख से देखा नहीं जा सकता महसूस किया जा सकता है।।
मनोरथ रूपी रथ के दो पहिए है।।साधुओं और समाधियों का अनुभव है की साधु का पुरुषार्थ और साधु का प्रारब्ध दो पहिये है।। मनोबल और प्राण बल रूपी घोड़े हैं।।बलभद्र,सुभद्र और जगभद्र इस रथ के साक्षी है।।इस रथ का लक्ष्य सत्य,प्रेम और करुणा है।।यह सब है लेकिन जीवन में वैराग्य ना हो तो ठीक नहीं।वैराग्य मनोबल बहुत मजबूत करता है प्राण बल भी मजबूत करता है।।
राग और वीतराग में फर्क है।।मैं विराग-वैराग्य शब्द का प्रयोग करता हूं।।हमारे पास बहुत धन होना चाहिए यह राग है और बिल्कुल धन नहीं चाहिए वह वितराग है।।लेकिन राग और वितराग दोनों से पर वह वैराग है।।मनोरथ का सबसे प्राण तत्व वैराग्य है विश्वामित्र आए और मनोरथ में राम लक्ष्मण को बिठाकर ले गए।।अहल्या के मन का मनोरथ पकड़ में आता है,वह मुक्ति चाहती है।।जैसे किसी भी मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करने के लिए साधु संत आते हैं,आज परमात्मा ने अहल्या की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा कर दी।।शील का बहुवचन शीला होता है ऐसे इंद्र के छल से जिसने शील गवाया वो एक जगह मानों बहुत शील इकट्ठा करके शीला बन गई राम ने स्पर्श किया,अहल्या की मुक्ति हुई।।जैसे स्पर्श का पाप धोने के लिए गंगा में राम ने स्नान किया।जनकपुर पहुंचे।मनोरथ करें तो सीता के गांव तक पहुंच सकते हैं,मनोरथ वैश्विक होना चाहिए।। सब मनोरथ के पीछे विश्वामित्र का मनोरथ-राम रहते थे वहीं रहने का था ।।राम लक्ष्मण और सभी भाइयों के विवाह हुए।।सीता सहित सभी की विदाई हुइ।।फिर विश्वामित्र अयोध्या से मनोरथ के रथ में सवार होकर फिर वन में चले गए और बालकांड का समापन किया गया।।
== समाप्त ==

