Homeगुजरातसाधु के गुणों को साधु बनकर ही गाया जा सकता है।।

साधु के गुणों को साधु बनकर ही गाया जा सकता है।।

साधु गुणातित है,भावातित है।

साधु अवस्थातित है‌।

मौन साधु की भाषा है।।

साधु देशातित और कालातित है।।

समूह में रहकर भी वह समूहातित है।।

साधु ग्रंथातित है।।

साधु समस्त शास्त्रों का पुनरावतार है।

वारकरि संप्रदाय की रचना केवल कविता नहीं धरती पर बहती सरिता और आकाश में दैदिप्यमान सविता है।।

प्राकृतिक संपदा से भरी भरी टी-नगरी केरिचो (केन्या) की भूमि से जब बुधवार को संवाद यात्रा पांचवे दिन में पहुंची की नई-नई चेतनायें प्रगट हो रही है यह नए भारत का शगुन है।वारकरी संप्रदाय का भजन संकीर्तन प्रवचन हुआ।सौराष्ट्र और महाराष्ट्र का नाता अभंग और असंग का है।। गांधी गीता का भाष्य करते हुए कहते हैं ये अनासक्त योग है।। यह असंग भाव और वारकरि संप्रदाय की रचना केवल कविता नहीं धरती पर बहती सरिता और आकाश में दैदिप्यमान सविता है।।

ज्ञानेश्वर आदि का आदर करता हूं लेकिन तुकाराम भगवान मुझे प्रिय है।।मैं उससे मोहब्बत करता हूं तुकाराम जी कहते हैं यमराज ने अपने दूतों को हूकम किया कि जहां कथा और संकीर्ण होते हैं खबरदार! वहां मत जाना।क्योंकि वहां कृष्ण का सुदर्शन चौकी करता है-ऐसा पद लिखा है। उनके वचनों को कौन खंडित कर सकता है,वह अभंग है साधु के गुणों को साधु बनकर ही गाया जा सकता है।।साधु गुणातित है।भावातित है। अवस्थातित है‌ मौन साधु की भाषा है।।साधु देशातित और कालातित है।।समूह में रहकर भी वह समूहातित है ग्रंथातित है।। साधु समस्त शास्त्रों का पुनरावतार है ऐसा ओशो ने कहा है।साधु अपना एकांत खोज लेता है।।वह समुद्र मंथन नहीं आकाश मंथन करता है।।

भीतरी रथयात्रा धर्म यात्रा,अर्थ यात्रा,काम यात्रा और मोक्ष यात्रा बने।।बापू ने गुरु पूर्णिमा की प्रथम से लेकर पूर्णिमा तक की विशिष्ट व्याख्या करी। जीवन रथ की अंतर यात्रा में धर्म में सबसे पहले सत्य,तप,शौच,दान अथवा दया।।सत्य का विचार, सत्य का उच्चार,सत्य का आचार और सत्य का स्वीकार होना चाहिए।।तप ऐसा हो जो दूसरों को ताप ना लगने दे।।अंतर शुद्धि के लिए हो,वरदान मांगने के लिए नहीं देने के लिए हो और तप की सिद्धि किसी को परेशान ना करें।।हमारे ग्रंथों ने बाह्य और आंतर पवित्रता की बात की।।तन, मन,चित् और अहंकार की शुद्ध होनी चाहिए।।सबसे श्रेष्ठ दान क्षमा दान है।।

मनु ने आठ प्रकार के ब्याह की काम यात्रा की।।चार उत्तम ब्याह फिर आसुरी, राक्षसी,गन्धर्वी और प्रेत ब्याह है।। यज्ञ वाली पवित्रता,आहुति,स्वाहा, समर्पित्ता,पवित्रता भजन की सहजता को मोक्ष मार्ग की यात्रा है।जो हमें चारों पुरुषार्थ की ओर ले जाते हैं।।

शंकराचार्य का एक मंत्र कहता है कि जैसे पदयात्रा में दो पैर होते हैं वैसे पक्षी को उड़ने की दो पंख वैराग्य और बोध है।।और साधक को जानने के लिए संकेत करते हैं।।और आज की कथा को विराम दिया गया

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