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अग्रवन कथा का भावमयी विराम, आगामी कथा स्वस्तिक कथा के रुप में, विशेष कथा १० ऑक्टोबर से ट्रेइन के साथ-साथ बहेगी।।

वैराग्य ढाल है तो वह प्रदर्शन ना बने,दर्शनीय बने।।

न भूतो,न भविष्यति जैसी आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक स्वस्तिक कथा,दक्षिण से उत्तर तक सेतुबंध से जोड़ती १० से २३ ऑक्टोबर तक स्पेश्यिल ट्रेइन से चलेगी।।

आध्यात्मिक उड़ान के लिए दो पंख चाहिए:वैराग्य और बोध की।।

जीव और शिव एक ही शाखा पर बैठे दो पक्षी है।।

मोक्ष भी एक प्रकार का बंधन है।।

जो साधक तिनके की तरह तीनों गुना को त्याग देता बै वह है वैराग्य।।

वैराग्य ढाल है और संतोष किरपान है।।

कली प्रभाव है इसलिए यह ढाल आगे आ गई है!

मानस वेद है, चौपाइयां रुचा है।।

 

कृष्ण रुपा कालिन्दी के तट पर बसी आध्यात्मिक ऐतिहासिक नगरी अग्रवन-आग्रा में बह रही रामकथा धारा बुधवार को जब विराम के दिन पर आ पहुंची तब बापु ने समग्र आयोजन,व्यवस्था पर ‘अधिकारी’ ललित जी और परिवार के प्रति अपनी नीजी प्रसन्नता और साधुवाद का भाव व्यक्त किया।।

शेष कथा और उपसंहारक बातों को रखते हुए ये बीज पंक्तियों के गायन से आरंभ किया:

 

बीज पंक्तियां:

एक  बार  त्रेता  जुग  माहीं।

संभु गए कुंभज रिषि पाहीं।।

बालकाण्ड, दोहा क्रमांक-४७ चौपाई-१

रिषि पूछी हरि भगति सुहाई।

कही संभु अधिकारी पाई।।

बालकाण्ड, दोहा क्रमांक-४७ चौपाई-४

जासु कथा कुंभज रिषि गाई।

भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई।।

बालकाण्ड, दोहा क्रमांक-५० चौपाई-७

कथा के आरंभ में ललित भाई परिवार के पूरे परिवार की ओर से छोटे से लेकर बड़े,सभी ने अपनी काली और भोली बातों से कथा विराम पर कोई गलती हुई हो तो सजल नेत्रों से सब का आभार दर्शन भी किया।।

बापू ने बताया की विदाई लेते हुए इस भूमि को और इतने सालों के बाद व्यास पीठ आई इस नगर में आध्यात्मिक भौतिक और ऐतिहासिक सभी स्थानों के प्रति आदर और सभी देवस्थानों को प्रणाम करते हुए बताया कि इस नगरी में साहित्य का,कहीं विद्यालयों में कोई शिक्षक,कहीं लेखक है।।

लेकिन मेरा चातुर मास मौन चलता है।।आप सबको समय ना दे पाया इसकी बड़ी पीड़ा है।।

सबको नमन करते हुए आज विशिष्ट महापुरुष का आगमन हुआ है,जैसे कोई यज्ञ के बाद फल मिलता है इस तरह रामकथा के अंतिम दिन फल के रूप में चित्रकूट कामदगिरि कांतानाथ पीठ के जगत गुरु आशीर्वाद देने के लिए उपस्थित रहने वाले है।।

कथा का यह विशेष फल है।बापू ने मनोरथी परिवार के सभी सदस्यों और इस कथा के आयोजन पर अपनी खुशी व्यक्त की और बताया कि जीवन में प्रसन्नता की बाढ़ आ रही है,यह हमारी महसूसी है।। जगतगुरु शंकराचार्य को स्मरण करते हुए बताया विवेक चूड़ामणि में एक श्लोक है:

वैराग्यबोधौ पुरुषस्य पक्षिवत्

पक्षौ विजानीहि विचक्षण त्वम्।

विमुक्तिसौधाग्रतलाधिरोहणं

ताभ्यां विना नान्यतरेण सिध्यति।।

–विवेकचूडामणिः ३७४

एक भूमि तल से एक पक्षी को ऊपर जाना है तो दो पंख चाहिए।।परमात्मा ने पक्षी की अद्भुत रचना बनाई है।।प्रमाण नाप बहुत अद्भुत है।।हम भी पक्षीवत् उड़ान करें।एक कथा के बाद दूसरी कथा में कितने ऊपर उठें?उर्ध्वगमन हुआ कि नहीं प्रत्येक साधक को अपना अवलोकन करना चाहिए।। जगदगुरु ने यह दिखाया जीव और शिव एक ही शाखा पर बैठे दो पक्षी है।।वैसे भी पक्ष,विपक्ष प्रतिपक्ष ऐसे पक्षपात होते हुए हम भी पक्षी है! कालडी से कैलाश गए जगतगुरु चाहते हैं त्रिभुवन का प्रत्येक पक्षी उड़ान करें।और उड़ने के लिए दो पंख चाहिए:वैराग्य और बोध की।।यह दोनों रामचरितमानस के शब्द है। बहुत सरलता से मानस में समझाया है:मोर मन प्रमोद जेहि किन्हा।। हमारा बोध एक पंख है।।बोध बहुत प्यार शब्द है।। ज्ञान से भी ज्यादा महिमा है,क्योंकि माहिती को हम ज्ञान मान सकते हैं।।इसलिए तुलसी जी ने लिखा है:

वंदे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररुपिणम्

बोध का सटीक अर्थ कहना मुश्किल है।।पक्षी की दो पंख बिराग दांइ और बोध बांई पंख है।। रामचरितमानस के हर कांड के समापन में वंदना आती है।।मगर मेरे दादा-गुरु जी ने समापन पर मुझे सिखाया:विमल वैराग्य संपादनो-यह समापन में खास हम कहते हैं।।

गाय को दोहने के बाद फिर मक्खन निकलता है। वह विमल होना चाहिए।।लेकिन नवनीत में जो कचरा रह जाए(किटा) वह वैराग्य संपादन होता है मोक्ष भी एक प्रकार का बंधन है।।फिर हम कभी लौट कर नहीं आ सकते! निर्वाण का मतलब हम गए और बंद गए! फिर कभी लौट के नहीं आ सकते वह भी एक प्रकार का बंधन है।।

वैसे भी हम मार्गी साधु बावा को उपेक्षा के रूप में उपहास करके बैरागी बावा शब्द कहकर बुलाते हैं एक वैराग्य की व्याख्या लक्ष्मण जी के सामने हुई है जो साधक तिनके की तरह तीनों गुना को त्याग देता है।।जैसे हम कुछ काम ना हो और बिल्कुल जमीन पर बैठकर तीनके तोड़ते हैं और फिर भूल जाते हैं वैसे ही वैराग्य यह है कि त्याग को याद ना रखें।। दूसरा मक्खन की तरह व्याख्या की है।।मक्खन इतना शुद्ध नहीं।।कभी इनमें कचरा रह जाता है ममता रूपी कीट रह जाती है।।वह निकल जाए फिर नारायण रूपी घृत-घी रहता है।।सच्चे मक्खन से दीप नहीं जलत।।शुद्ध घी की ज्योत से ही प्रकाश फैलती है।।

तीसरा वैराग्य धर्मरथ की चर्चा में लंकाकांड में विभीषण के पास व्याख्या हुई है।वहां लिखा है: बिरती वैराग्य ढाल है और संतोष किरपान है।।

ढाल हमेशा पीछे रहती है।।वैराग्य ढाल है तो वह प्रदर्शन ना बने,दर्शनीय बने।।आगे रहने से अभद्र दिखेंगे।पीछे नहीं रहेगा तो हम कंफर्टेबल महसूस नहीं होंगे।।हृदय में बोध आगे,पीछे वैराग्य ऐसे उड़ान भरते हैं।।

बापू ने बताया महुआ के डबगर लोग रहते थे उनसे जानकारी पाकर कहा कि गेंडे की चमड़ी से ढाल बनती है।।वहां बताया कि चमड़ा पकाने के लिए बहुत सुखाना पड़ता है। एक बूंद भी रक्त रह जाए तो चमड़ा पकता नहीं और फट जाता है।। वैसे थोड़ा सा रक्त रह जाए तो हमारा वैराग्य रक्त युक्त होगा तब अंदर के रक्त की रक्षा नहीं होगी।।परमात्मा के प्रति हमारी आरती के लिए वैराग्य रुपी ढाल रक्त मुक्त होना चाहिए।।

कली प्रभाव है इसलिए यह ढाल आगे आ गई है! तथा कथित बैरागी अनकंफरटेबल दिखते हैं।।कितने भी सत्कर्म करो।अच्छे काम करो। लेकिन खुद अपनी घोषणा खुद ना करो।।वैराग्य हम साधुओं का स्वाभाविक विषय है।।

पहले दो साधु मिलते थे तब पूछते थे और वैराग्य कितना बढा?

शंकराचार्य जी कालडी से केदार की उड़ान हमें समजाते हैं।।

जानकी जी के पास रावण आया तो सीता जी ने एक तीनके की ओट करके बताया कि तेरी सब संपत्ति तिनके के समान है।।

शंकराचार्य ने चार शिष्यों से कहा कि आप को ज्यादा क्या कहूं! आप समजदार है।।वैराग्य और बोध ही पंख से बिना कोई तैर नहीं पाएगा।।

त्याग वैराग्य के पात्र में शोभा देता है।।

निष्कुलानंद जी ने गाया और जीन धारा के महापुरुष ने यह कहा वह धारा को भी अभ्यास करना चाहिए! वह लिखते हैं:

त्याग न टके वैराग्य बिना।करिए कोटी उपाय जी। अंतर उंडी जे इच्छा रहे,ते तो केम तजाय जी।

वेश तो लीधो वैराग नो,देश रही गयो दूर जी।

उपर वेश अच्छो बन्यो,मांही मोह भरपूर जी।।

सपने में बुद्धि भटकती है।निद्रा-सुषुप्ति में शांत होती है। जागृति में बुद्धि चिंतन करती है और तुरीया अवस्था में बुद्धि निर्मल हो जाती है।।

रिषी-मुनि का संयुक्त साधु के पास अपना रूप होता है।।रूत भी होता है और श्रद्धा की ऋतु होती है।। ऋषि के पास रुचा भी होती है।।मानस वेद है, चौपाइयां रुचा है।।

शेष कथा में रावण को गति देकर पुष्पक आरूढ़ होकर राम अयोध्या में आए और अपना ऐश्वर्य दिखाते हुए सबको व्यक्तिगत रूप से मिले।।वशिष्ठ जी ने सिंहासन मंगवा कर राजतिलक किया।।राम राज्य का स्थापन हुआ।। फिर भुंसुडी का चरित्र सात प्रश्न के बाद सभी घाट पर कथा का विराम हुआ।तब बापू ने कहा इस रामकथा का सुफल जगत के तमाम ऋषियों के चरणों में अर्पण किया। फिर बहुत सरल तरल कामदगिरि के शंकराचार्य जी ने कहा कि समस्त कामनाओं का अंत वही संत है। भद्र आचरण है वह साधु है।।

कथा बहुत होती है लेकिन ऋषि पंचमी पर ऋषियों की कथा विशिष्ट है और बापू के प्रति अपना सद्भाव दिखाकर,प्रसाद के रूप में सभी को आशीर्वचन देते हुए अपना शुद्ध भाव प्रस्तुत किया।।

कथा को विराम दिया गया।।

अगली कथा खास विशेष होने जा रही है।स्वस्तिक कथा भाग-१ के तहत कालडी से केदार,कन्याकुमारी ले केदारनाथ(दक्षिण से उत्तर) ता-१० ऑक्टोबर शनिवार से २३ ऑक्टोबर के दरमियान,खास ट्रेइन के द्वारा मुख्य आध्यात्मिक-धार्मिक स्थल पर एक-एक दिन का कथागान करते हुए केदारनाथ में गंतव्य,विराम तक जायेगी।।

इस कथा का विशेष प्रसारण लाइव रुप से पहले दिन शनिवार,१० ऑक्टोबर शाम ४ बजे और बाकी दिनों में जब ट्रेन यात्रा कथा स्थल पर पहुंचेगी ऐसे जीवंत रुप में आस्था टीवी चैनल और चित्रकूटधाम तलगाजरडा यु-ट्युब चैनल के माध्यम से देखा,सुना जा सकता है।।

== समाप्त ==

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