
हनुमान जी निवृत्ति परायण और भरत जी प्रवृत्ति परायण साधु है।।
स्वीकृति परायण,संस्कृति परायण,संसृति परायण और गुरु की स्मृति परायण हो वो परम साधु है।
जो सरल हो,सबल हो और सजल हो वो परम साधु है।।
दुख में उद्वीग्य न हो,सुख में छलके नहि,स्पृहा,आसक्ति,राग से मुक्त हो,क्रोध से वितरागी हो वो है मुनि।।
रिषि वो है जो दोषों को क्षीण करते करते मन में द्विधा न रहे।।
शरीर से जूडा,मन,बुध्धि,चित्त और इंन्द्रियों को नियंत्रित किया हो वो रिषि है।।
प्राणि मात्र के कल्याण के लिये जीवन जीता हो वो रिषि है।।
निरंतर कर्म का मार्गदर्शन कराती यमुना जी के तट पर बसा अग्रवन-आग्रा की भूमि पर रामकथा मंगलवार आंठवे चरण पर पहुंची।
कल भगवद्गीता के न्याय से रिषि मुनिओं की व्याख्या कर रहे थे।।
दुख में उद्वीग्य न हो,सुख में छलके नहि,स्पृहा,आसक्ति,राग से मुक्त हो,क्रोध से वितरागी हो वो है मुनि।।
वो उस ब्रह्म को,निर्वाण को,मुक्ति को,परम लक्ष्य को प्राप्त करने का अधिकारी है।।
जो तमाम दोषों से मुक्त हुआ हो या तमाम दोषों हरि भजन से घीसते घीसते,जो पूर्व में तिक्ष्ण थे वो क्षीण कर दे।।नाश तो धीरे धीरे होगा।।रिषि वो है जो दोषों को क्षीण करते करते मन में द्विधा न रहे।।शरीर से जूडा,मन,बुध्धि,चित्त और इंन्द्रियों को नियंत्रित किया हो वो रिषि है।।
प्राणि मात्र के कल्याण के लिये जीवन जीता हो वो रिषि है।।
रिषि मुनि की संयुक्त चेतना को मैने साधु कहा है।।
ञुषि की ञुतुंभरा वाणी,मुनि का मनन पूर्ण मौन,दोनों का समन्वय है साधुता।।
रामचरित मानस में कंइ साधु है इनमें से दो की ओर आप ध्यान आकर्षित करुं।एक है हनुमान जी।।हनुमान जी तो साधु संत के रखवारे है,साधु भी है।।हनुमान शंकर के अवतार है,ब्रह्मा के कथन पर शिव साधु है।।
किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू।
जिमि जग जामवंत हनुमानू॥
यद्यपि साधु के वेश की भी महिमा है फिर भी साधु वेश न हो फिर भी साधु है।।
आप श्रध्धा न रख सको तो दूर रहो मगर श्री,संत,विष्णु की निंदा अच्छी नहि।।
साधु वेश ने नींदे एने धीक् छे रे.. ऐसा गुजराती में लिखा वहां जोडूंगा कि
साधु वेश ने वंदे तेने धन्य छे।
हनुमान जी निवृत्ति परायण और भरत जी प्रवृत्ति परायण साधु है।।और परम साधु कौन?स्वीकृति परायण,संस्कृति परायण,संसृति परायण और गुरु की स्मृति परायण हो वो परम साधु की तरफ गति है।।
कबीर जी ने कहा है:
बच्चे कैसे सुखे तेरे खेत।
न दीनता,न बंदगी,न साधु से हेत।।
तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू।
राम चरन अनुराग अगाधू।।
साधु,सब बिधि साधु और परम साधु का परिचय करवाते बापु ने कहा साधु में एक वस्तु है वो सरल होता है।।सब बिधि साधु सबल होते हुए भी सरल हो।।
धृतराष्ट्र से संधि का प्रस्ताव लेकर योगेश्वर कृष्ण गये।सब को पता चला ञषी मुनि बरसों की साधना छोडकर दौडे,कृष्ण को सुनने के लिये।।कुरुसभा में गोविंद की वाणी सुनने सब इकठ्ठे हुए।।परशुराम अवतार कार्य पूरा होने के बाद भी गये थे।।धृतराष्ट्र को भारत कहकर कृष्ण ने पूरे कूल परंपरा की याद दिलाइ तब परशुराम ने कहा की कृष्ण सबल होते हुए भी सरल है।।कृष्ण बोल रहे है तब चार को छोडकर-दुर्योधन, दु:शासन,कर्ण और शकुनि को छोडकर सब तालियां बजा रहे है।
जिन के पास रुदन है वो ञुषि है।।
भरत जी सबबिधि साधु है।।सबल है,बीना फने का बाण चलाया और अयोध्या के उपर से निकले पर्वत उठाकर निकले हनुमान जी गिरे।।लेकिन पर्बत उपर ही तैरते रहे तब भरत जी ने बताया की की ये तेरे गुरु के बल से उठे है,तुने उठाया होता तो तेरे साथ ही गीर जाता।।
कोइ पदगुरु,दूसरा सदगुरु और तिसरा मदगुरु-नीज गुरु है।।
जो सरल हो,सबल हो और सजल हो वो परम साधु है।।
बापु ने नव प्रकार की पंचमी पंचाग के आधार पर बताइ।जहां
१-कार्तिक शुक्ल पंचमी-लाभ पंचमी,उसे ग्यान पंचमी भी कहते है।
२-मागशिर्ष शुक्ल पंचमी-विवाह पंचमी।।
३-महा शुक्ल पंचमी-वसंत पंचमी।
४-फाल्गुन कृष्ण पंचमी-रंग पंचमी।।
५-चैत्र शुक्ल पंचमी-श्री पंचमी।
६-अषाढ शुक्ल पंचमी-स्कंद पंचमी।
७-सावन सुदऔर सौराष्ट्र में कृष्ण पंचमी-नाग पंचमी
८-भाद्रपद शुक्ल पंचमी-ञुषि पंचमी।।
९-आसो शुक्ल पंचमी-ललिता पंचमी।।
कथा प्रवाह में अयोध्याकॉंड का आरंभ हुआ और भरत मिलाप और अन्य प्रसंगो को संक्षेप में कहकर राम यात्रा में अत्रि अनसुया,सुतिक्ष्ण,शरभंग मुनि और वाल्मीकि से रहने की जगह पूछकर पंतवटी निवास,सुर्पणखा को दंडित करना और ललित नर लीला के अंतर्गत सिता जी का हरण,सुग्रीव और राम की मित्रता के बाद हनुमान जी से मिलन,सीताखोज का अभियान,हनुमान जी द्वारा लंका गमन,लंकादहन और आगमन के बाद राम जी ने लंका के तट पर सागर तीर सेतुबंध रामेश्वर का स्थापन किया वो सब प्रंसंगों को संक्षेप में गाते हुए आज की कथा को विराम दिया कया।।
कल इस रामकथा का विराम का दिन है।।
== समाप्त ==

