Homeगुजरातस्वस्तिक का केंद्रबिंदु ब्रह्म है, परम तत्व ही केंद्र है।।

स्वस्तिक का केंद्रबिंदु ब्रह्म है, परम तत्व ही केंद्र है।।

कथायात्रा का सातवां मुकाम ऐतिहासिक धरा झांसी में।

श्रद्धा से ज्ञान,विश्वास से भक्ति प्राप्त होगी।।

आधिदैविक स्वस्तिक के चार पथ है।।

देवमार्ग-दिव्यमार्ग,पितृमार्ग,मित्रमार्ग,गुरुमार्ग-स्वस्तिक के चार पथ है।।

बुद्धपुरुष के चरण में दंडवत करते हैं तब पृथ्वी ग्रहण करी वो प्रज्ञा की विद्युत शक्ति हमारे मस्तिष्क में आ जाती है।।

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बुंदेलखंड की ऐतिहासिक धरा,खंडहर ही बता रहे है इमारत कीतनी बुलंद थी-ऐसी अनुभूति सब को हूइ, जब कथायात्रा शुक्रवार सातवें दिन में प्रवेश कर रही है।।

शौर्य,धैर्य राष्ट्रभक्ति से भरपूर वीरांगना की दिव्य भूमि और वीरांगना की चेतना को प्रणाम करते हुए बापू ने कहा यह पूरा भूभाग राष्ट्रभक्ति और तुलसी जी की भी भूमि भी है।।विरांगना ने देशभक्ति के लिए अपना बलिदान दिया वह भूमि पर सुबह दर्शन राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का गान भी किया गया।। दंडवत का वैज्ञानिक उद्घाटन हमारे मनीषियों ने किया है।।वैसे दंड की तरह किसी के चरणों में गिर जाना यह आध्यात्मिक अर्थ है।।लेकिन वैज्ञानिक अर्थ,प्रत्येक मानवी के मस्तिष्क में बहुत ऊर्जा होती है।यह ऊर्जा सम्यक होनी चाहिए।अधिक हो जाए तो पागलपन आ जाता है।।ऊर्जा का संतुलन होना चाहिए।।पृथ्वी का गुण गंध है।।एक गुण ग्रहण है। बीज और धैर्य को,वर्षा के बिंदुओं को और हमें भी पृथ्वी धारण करती है।।गुण ग्रहण करती है।।इस भूमि में बुद्धपुरुष के चरण में दंडवत करते हैं तब पृथ्वी ग्रहण कर लेती है।।उसी की रज में वह ऊर्जा फैल जाती है।।जिसके चरणों में हम दंडवत करते हैं उनकी प्रज्ञा की विद्युत शक्ति जो धरती ने ग्रसी है वह हमारे मस्तिष्क में आ जाती है।।चरणों को छूकर स्पर्श करके साधक में विद्युत शक्ति आती है।।

बिंदु जी महाराज ने विश्वामित्र को वैश्विक विचार कहा और दशरथ को जीव कहा है।।

आज कात्यायनी का नवरात्र है और यहां की मातृ शक्ति झांसी की रानी है।।

हमने स्वस्तिक को आधिभौतिक,अध्यात्मिक कहा आज आधिदैविक स्वस्तिक की बात:चार चरण चतुष् पाद या चतुष्पथ मिलने से स्वस्तिक मिलता है यह चार पथ के गुरुमुखी अर्थ समझाते हुए कहा एक मार्ग देव मार्ग है।।लेकिन देवताओं को रामचरितमानस में स्वार्थी बताया।। इसलिए मैं उसे दिव्य मार्ग कहता हूं।।दूसरा पितृ मार्ग, एक मित्र सूर्य का मार्ग और एक गुरु का मार्ग।।यह चार पाथ है देव मार्ग भी अद्भुत है।। हर एक मार्ग पर सब अपनी रीति से यात्रा करते हैं।।यह दिव्य मार्ग सत्य,प्रेम और करुणा से यात्रा करनी होगी।।जितनी मात्रा में सत्य के साधक हो।।राम के चरण में अगाध प्रेम हो।।भरत प्रेम मारग के पथिक है। सब विधि साधु है गुरु के पास नव प्रकार की साधुता का संवाद आए दिन करेंगे।।

प्रेम मार्ग का पथिक भरत है।।जिसमें करुणा भी होगी वह दिव्य मार्ग का मार्गी भी होगा।।

जिसमें करुणा होगी वह दिव्य मार्ग का मार्गी होगा स्थूल शरीर अन्न पर आधारित है।इंद्रियों का खुराक वायु है।।आत्मा का खुराक बुद्धपुरुष की वाणी है।। दूसरा पितृ मार्ग।।वहां तीन पक्ष है:तर्पण,पितृ निमित्त यज्ञ और पितृओं का श्रवण।। पितृ मार्ग के यात्री के यह लक्षण है।।

सर्व ग्रंथानां परितज्यम-रामभद्राचार्य जी ने यह कहा लेकिन मैं कहता हूं:सर्व ग्रंथानम परिपूज्यं,मानसं शरणम व्रज।।

तीसरा मित्र मार्ग-सूर्य का मार्ग जो उत्तरायण और दक्षिणायन है।।उदयांचल और अस्तांचल है।।यह प्रकाश का मार्ग है।।

चौथा सद्गुरु का मार्ग।।कोई मार्ग समझ में ना आए तो गुरु मार्ग पर चलें।। गुरुमार्ग पर चलने की रीति है सात्विक श्रद्धा और विश्वास।।श्रद्धा से ज्ञान,विश्वास से भक्ति प्राप्त होगी।।तीसरा संयुक्त रूप है:भरोसा स्वस्तिक का केंद्रबिंदु ब्रह्म है।परम तत्व ही केंद्र है।। आखिर में कल्याण करने वाला केंद्र परब्रह्म है।।

राम जन्म के कारण के बाद अयोध्या में,राजा दशरथ के वहां यज्ञ हुआ।।यज्ञ के बाद प्रसाद की खीर निकली और तीन भाग में बांटी गई।। अयोध्या में मानिक-मणिओं  की खदान निकली।।

फिर राज भवन में,मॉं कौशल्या के उदर में भगवान राम का अवतरण हुआ।।इस शौर्य भूमि से पूरे त्रिभुवन को राम जन्म की बधाई देकर,विरांगना राणी लक्ष्मीबाइ को समर्पित कर के आज की कथा को विराम दिया गया।।

कथा-विशेष:

मथुरा:पुराण प्रसिध्ध ऐतिहासिक नगरी से शायद ही कोइ अनजान हो।।

यहां कण-कण,कदम-कदम,सांस सांस,पल-पल,धड़कन-धड़कन भगवान श्री कृष्ण की अनुभूति होती है।।

श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा का सबसे प्रमुख स्थान है,भगवान श्रीकृष्ण का जन्मस्थान है।पास में पोतरा कुंड भी है।।

द्वारकाधीश मंदिर: वर्ष १८१४ में निर्मित यह मंदिर अपनी भव्य नक्काशी और श्रीकृष्ण-रुक्मिणी की प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है।।

विश्राम घाट: यमुना नदी के किनारे स्थित यह सबसे पवित्र घाट है।शाम के समय यहाँ की यमुना आरती देखने लायक होती है।

मथुरा संग्रहालय: यहाँ प्राचीन काल की दुर्लभ मूर्तियां,ऐतिहासिक कलाकृतियां और अवशेष रखे गए हैं।।

गीता मंदिर: बिरला मंदिर के नाम से भी जाना जाने वाला यह स्थान भगवद्गीता के श्लोकों और सुंदर चित्रों के लिए प्रसिद्ध है।।

कंस किला: यमुना तट के पास स्थित राजा कंस के किले के ऐतिहासिक अवशेष है।।

भूतेश्वर महादेव मंदिर: ब्रज के चार प्रमुख शिवलयों में से एक।।

पास प्रसिद्ध स्थान (वृंदावन, गोवर्धन और गोकुल)

है।

जहां बांके बिहारी मंदिर (वृंदावन): मथुरा से कुछ ही दूरी पर वृंदावन का सबसे लोकप्रिय मंदिर है।

प्रेम मंदिर (वृंदावन): जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा निर्मित सफेद संगमरमर का अत्यंत सुंदर मंदिर है।।

इस्कॉन मंदिर (वृंदावन): श्रीकृष्ण-बलराम को समर्पित प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय मंदिर है।।

गोवर्धन हिल (गिरिराज जी): भगवान कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी पवित्र गोवर्धन पर्वत परिक्रमा।।

गोकुल: भगवान श्रीकृष्ण के बालपन से जुड़ी स्थली,जहाँ नंद बाबा का महल और रमण रेती दर्शनीय हैं।।

इन के अलावा राधा कुंड जो राधा और कृष्ण से जुड़ा एक पवित्र स्थल है।

सनातन-हिंदू धर्म का तीसरा सबसे पवित्र शहर है।।

प्राचीन काल में यह शूरसेन साम्राज्य और कुषाण वंश की राजधानी रहा है। रामायण और महाभारत काल में भी इसका उल्लेख मिलता है।।

द्वारकाधीश मंदिर: अपनी सुंदर वास्तुकला और श्रीकृष्ण-रुक्मिणी के विग्रह के लिए प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर।।

== समाप्त ==

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