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ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर की पूण्य भूमि पर छठ्ठे दिन की कथा का गान हुआ।।

आध्यात्मिक स्वास्तिक का केंद्र ओमकार है।। ओमकार परमात्मा की परम विभूति है।

भारत का नाथ ही नवनाथ है।।

ओमकार स्वास्तिक का पर्याय है।।

ओम निराकार है,स्वस्तिक सगुण साकार रूप है।।

गुरु से शिक्षा दीक्षा के बाद भिक्षा का अधिकार है।।

हमारी यात्रा पैरों से नहि,प्रसाद से हो रही है।।

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मध्य प्रदेश की परम पावन भूमि,ज्योतिर्लिंग ओमकारेश्वर में गुरुवार छठ्ठे दिन की कथायात्रा पहुंची तब बापू ने बताया कि परम अव्यवस्था का नाम ही परमात्मा है।वो हर रोज अनुभव में आ रहा है।जब ट्रेन यात्रा में समय पत्रक के साथ नहीं चल पा रहे हैं।।फिर भी इतनी कठिन काम में व्यवस्था करने वाले सबके पति प्रसन्नता व्यक्त की।।

ओंकारेश्वर जहां आदि शंकराचार्य के गुरु भगवत पाद,गुरु गोविंद पाद मिले।।स्वयं वेदांती है, बहाना तो यह है कि बुड्ढा ब्राह्मण व्याकरण रच रहा था तब शंकराचार्य जी ने कहा कि कब तक व्याकरण रचता रहेगा! भज गोविंदम्! यह बहाना मगर इशारा अपने गुरु की तरफ है।।हमारी सनातनी परंपरा में गुरु का स्मरण स्पष्ट नहीं करते शंकराचार्य जी ने भज गोविंदम स्तोत्र की रचना की।।

ओमकार स्वास्तिक का पर्याय है।।ओम निराकार है स्वास्तिक सगुण रूप है।।

आज छठा नवरात्र स्कंद माता का दिन है और आध्यात्मिक स्वास्तिक का अर्थ दिखाते हुए कहा कि आध्यात्मिक स्वास्तिक का केंद्र ओमकार है।। ओमकार परमात्मा की परम विभूति है।

*तैतरीय उपनिषद की प्रार्थना मंत्र का गान,उच्चार किया

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा ।

शं न इंद्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुक्रमः ।

नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो ।

त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ।

ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि ।

तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु ।

अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

यहां सूर्य,वरुण आदि देवताओं को ऋषि ने प्रार्थना की और कहा कि शुभ करो,हमारा मंगल करो।इस व्याख्या में प्रवेश करते हुए बापू ने कहा हमारे यहां नव-नव वस्तु बहुत है।।

ओशो ने कहा था नाथ परंपरा में जितनी ध्यान पद्धति है उतनी शायद किसी में होगी। हमारे नवनाथ है।भारत का नाथ ही नवनाथ है।। नवमी तिथि,रंग नव है।नव खंड।नवधा भक्ति।नवनिधि और नवनाद में पहला नाद ओमकार है।।प्रणव का ओमकार नाद। शंखनाद,वेणु नाद,सिंह नाद, मेघनाद,डमरू नाद,समीर वायु का नाद,वरुण नाद, और एक वंश नाद वंश तो यहां वंश नाद।

बापू ने कहा कि अभिमान,अस्मिता वैसे अच्छा शब्द है फिर भी अस्मिता भी अच्छा नहीं।।खुमारी होनी चाहिए और खुमारी पचाना है,बरकरार रखना है तो जरूरत अनुसार संपदा होनी चाहिए।।थोड़ी संपन्नता होना गुनाह नहीं,पाप नहीं है।।गुरु से शिक्षा दीक्षा के बाद भिक्षा का अधिकार है।।आरोग्य जरूरी है।खुमारी से जी सके।।अच्छी संतान की खुमारी। कूल परंपरा की खुमारी। नाम की खुमारी, अपने इष्ट ग्रंथ की खुमारी और गुरु की खुमारी।। ओमकार कल्याणकारी ही है।।जगत की बहुत सी धर्म परंपरा में ओमकार का स्वीकार हुआ है।।किसी ने आमीन के रूप में स्वीकारा।

भारत रत्न मदन मोहन मालवीय जी ने ओमकार की व्याख्या करते हुए अ-उ-म और अर्धचंद्र बिंदी को बताते कहा अ-अमरत्व की प्राप्ति।।उ-उन्मनी दशा की प्राप्ति।।म-महद आकाश की प्राप्ति और अर्धचंद्र बिंदी बिंदु मध्य का संकेत करता है-ऐसा बताया।

पार्वती को रामकथा पूछने पर शिवजी ने धन्य-धन्य कहकर धन्यवाद की।।राम अवतार के कारणो की बात शिव शुरु करते है।।हमारी यात्रा पैरों से नहि,प्रसाद से हो रही है।।

पांच कारणो का संक्षिप्त संवाद कर के आज की कथा इस तीर्थभूमि को समर्पित की गइ।।

 

कथा-विशेष:

सातवें दिन की कथा जहां है वो ऐतिहासिक झांसी की झॉंकी

खूब लडी मर्दानी थी,वो झांसी वाली रानी थी

झांसी उत्तर प्रदेश राज्य का एक ऐतिहासिक जिला और बुंदेलखंड क्षेत्र का प्रमुख नगर है (यह मध्य प्रदेश में नहीं,बल्कि उत्तर प्रदेश का हिस्सा है, हालांकि इसकी सीमाएं मध्य प्रदेश से लगती हैं)।

प्राचीन काल में झांसी क्षेत्र को ‘बलवंत नगर’ के नाम से जाना जाता था और यह चंदेल राजाओं के अधीन था।

झांसी के किले की स्थापना (१६१३):ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला (वीर सिंह देव) ने १६१३ में बंगरा नामक पहाड़ी पर ‘झांसी के किले’ का निर्माण कराया था।।

माना जाता है कि पहाड़ी से किले की धुंधली छाया दिखने के कारण इसका नाम ‘झांसी'(झांखी-सी) पड़ा।

मराठा साम्राज्य का प्रभाव (१८वीं शताब्दी):१७२९ में पेशवा बाजीराव प्रथम ने बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल की सहायता की,जिसके बाद यह क्षेत्र मराठों के अधिकार में आ गया।बाद में नेवलकर परिवार ने यहां शासन किया।

रानी लक्ष्मीबाई और १८५७की क्रांति:१८४२में झांसी के राजा गंगाधर राव का विवाह मणिकर्णिका (रानी लक्ष्मीबाई) से हुआ।

१८५३ में राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद,अंग्रेजों ने ‘व्यपगत का सिद्धांत’ (Doctrine of Lapse) के तहत झांसी को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने का प्रयास किया।

इसके बाद १८५७-१८५८ के स्वतंत्रता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ वीरतापूर्वक झांसी का नेतृत्व किया और अपना बलिदान दिया।

ब्रिटिश और उत्तर प्रदेश में विलय:१८५८ के बाद झांसी अंग्रेजों के सीधे नियंत्रण में आ गई।।

स्वतंत्रता के पश्चात् इसे उत्तर प्रदेश राज्य का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और प्रशासनिक मंडल बनाया गया।

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित झांसी का इतिहास बहुत प्राचीन,समृद्ध और वीरता से भरा हुआ है।

झांसी का पुराना नाम ‘बलवंत नगर’ था और इस पर चंदेल राजाओं का शासन था।

मराठा आधिपत्य:वर्ष १७२९ में बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल की सहायता करने के बाद पेशवा बाजीराव प्रथम को झांसी का क्षेत्र प्राप्त हुआ।

१७९६ में रघुनाथ राव (द्वितीय) नेवलकर यहां के शासक बने।।उनके समय में महालक्ष्मी मंदिर, रघुनाथ मंदिर और रानी महल का निर्माण हुआ।

वर्ष १८०३ की संधि के बाद झांसी पर अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ा और १८०४ से यह ब्रिटिश आधिपत्य के अंतर्गत एक स्वतंत्र रियासत के रूप में मराठा नेवलकर राजवंश के अधीन रही।।

१८५३ में राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद, ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ने ‘हड़प नीति’ के तहत झांसी राज्य को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया।

मणिकर्णिका (रानी लक्ष्मीबाई) ने वर्ष १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की कमान संभाली और अंग्रेजों के खिलाफ कड़ा संघर्ष किया।

१८ जून १८५८ को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में अंग्रेजों से लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं।।

१८६१ में झांसी का कुछ हिस्सा सिंधिया शासकों को सौंपा गया,जिसे १८८६ में अंग्रेजों ने वापस ले लिया।

आज झांसी उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख संभागीय (Divisional) मुख्यालय और बुंदेलखंड क्षेत्र का एक अहम औद्योगिक व शैक्षणिक केंद्र है।।

== समाप्त ==

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