Homeगुजरातराम सुंदर है उस पर वही बोल सकता है जो हृदय से...

राम सुंदर है उस पर वही बोल सकता है जो हृदय से सुंदर हो।।

सनाथ राम को प्रेम करते हैं।।
सही में सनाथ वो है जो प्रभु से प्रेम मांगे।।
ओशो के पास शब्दों की लीला बहुत थी,बहुत कम महापुरुषों ने शब्द ब्रह्म को ऐसे नर्तन करवाया है।।
गुरु के समान दुनिया में प्रेम करने वाला कोई नहीं।
सब कुछ छूटता है पूज्य होने का स्वार्थ नहीं छूटता।।
असली अमृत कथा का अमृत है,जो हमें जीवंत रखता है।।

इस सदी के महान दार्शनिक ओशो की भूमि जबलपुर से प्रवाहित रामकथा ओशो दिक्षित संन्यासीओं की भारी उपस्थिति एवं संतो,महंतो और विशेष लोगों की मौजुदगी में रामकथा के चौथे दिन
ओशो की प्रबुद्ध चेतना को प्रणाम करते हुए बापू ने कहा कि रामचरितमानस के उत्तरकॉंड में यह आखिरी छंद में राम को सुंदर कहा है।।राम सुंदर है उस पर बहुत बोला जा सकता है,लेकिन वही बोल सकता है जो हृदय से सुंदर हो।।क्योंकि सौंदर्य पाने के लिए पहले सुंदर बनना पड़ता है।।साधक को स्वयं अपने भीतर को सजाना पड़ता है।। वह राम बेजान नहीं सूजान है।।समझदार विवेकपूर्ण स्वभाव संवेदनशील है।।वह कृपा का खजाना है।। वह अनाथ के ऊपर प्रेम करता है।। तो सनाथ का क्या? लेकिन सनाथ राम को प्रेम करते हैं।।
जनक समृद्ध है वो राम को प्रेम करते हैं।। विदेही है राजर्षि है,मां जानकी का बाप, पराम्बा का पिता जनक राम से संवाद करता है तो जनक प्रेम की मांग करता है।।जनक ज्ञानी है लेकिन प्रेम मांगता है सही में सनाथ वो है जो प्रभु से प्रेम मांगे।।और जो अनाथ है उसे प्रभु प्रेम करते हैं। हम दाल चावल ऐसा बोलते हैं गुजराती में दाल भात बोलते हैं।। लेकिन सही क्या है?भात दाल की दाल चावल?शब्द का यहां नर्तन है, लीला और क्रीडा होती है।हर एक शब्द आकाश के फूल है।।ओशो के पास शब्दों की लीला बहुत थी।।बहुत कम महापुरुषों ने शब्द ब्रह्म को ऐसे नर्तन करवाया है।। बुद्धपुरुष के पास बैठकर हम कौन सी प्रार्थना करें? नमामि भक्त वत्सलम्… यह प्रार्थना। लेकिन तुलसीदास जी की अनुमति लेकर में इतना फेरफार करूं- नमामि शिष्य वत्सलम् कृपालु शील कोमलम्…
गुरु के समान दुनिया में प्रेम करने वाला कोई नहीं। हर एक संबंध में स्वार्थ होता है।
सूर नर मुनि सब ही की यह रीति।
स्वारथ लगी सब की प्रति।।
ओशो ने कह दिया कि आखिर में मुझे भी भूल जाना। मगर मैं उस पक्ष में नहीं।। बुद्धपुरुष हमारा जीव हमारी जीह्वा है। सब कुछ छूटता है पूज्य होने का स्वार्थ नहीं छूटता।। जिसे मुक्त होना है उनके लिए सब कुछ छोड़ना बराबर है लेकिन गुरु की स्मृति लेकर बार-बार धरती पर आना है उन्हें गुरु को भूलना नहीं है।।
दाल भात यह विशेष स्थिति का नाम है। भात दाल उतना अच्छा नहीं लगता। यहां चावल ज्ञान है,दाल भक्ति है।।लेकिन पहले रस परोसा जाता है। चावल रुखा सुखा है।।महारस में वेदांत रख दो फिर जो आनंद आएगा वह अलग है।। राम सत्य का प्रयोग करते हैं।। कृष्ण प्रेम का प्रयोगी है,महादेव करुणा का साक्षात प्रयोगी है।।
विश्राम शब्द 31 बार रामचरितमानस में आया जो राम के 31 बान है।।विश्राम और एक बार परम विश्राम जो निर्वाण संबोधि मुक्ति देता है।।
अमृत कहां है? स्त्रियों के होंठ पर,चंद्रमा में,पाताल में,समुद्र में,स्वर्ग में।।लेकिन सभी जगह पर अमृत काम नहीं करता। असली अमृत कथा का अमृत है जो हमें जीवंत रखता है।।

===============

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read