निर्माण किया जा सकता है और निर्वाण दिया जा सकता है।।
परम विश्राम व्यक्तिगत है,सामूहिक नहीं।।
या तो आप रहो या ईश्वर रहे! वही एकांत है।।
वही परम विश्राम वाला एकांत है जहां मैं भी नहीं हूं तू भी ना रहे!
बुद्धपुरुष कभी जाता नहीं,आत्मा नहीं मरती तो महात्मा कैसे मरे!
सायन्स मैदान जबलपुर से इस सदी के महान दार्शनिक ओशो के जन्मोत्सव पर चल रही रामकथा के तीसरे दिन परम पावन चेतनाओं को प्रणाम करते हुए ढेर सारे ओशोसन्यांसी और बहुश्रुत श्रोताओं से संवाद करते हुए बापू ने बताया कि बहुत सी जिज्ञासा यह आई है।।सब जानने की कोशिश मत करो कुछ अननोन रह जाए वह भी जरूरी है!
प्रश्न ऐसा था कि सुनते सुनते सामूहिक विश्राम मिलता है।जैसे भौतिक जीवन में रात को सब विश्राम में चले जाते हैं। तो कथा सामूहिक परम विश्राम एक साथ बहूतों को दे सकती है कि नहीं? बापू ने कहा कि यहां तुलसी ने लिखा है: पायो परम विश्राम।। इसका मतलब है एक ही व्यक्ति को मिलता है।। विश्राम एकांतिक मसला है। सामूहिक आराम मिल सकता है।। हम पीटी करवाते हैं तो विश्राम शब्द बोलते हैं लेकिन यह पीटी के लिए है।। परम विश्राम कोई देते हैं तब हम पाते हैं।।
जैसे मैंने कहा था निर्माण किया जा सकता है और निर्वाण दिया जा सकता है।। हमारा कोई कर्तव्य नहीं है।।परम विश्राम व्यक्तिगत है,सामूहिक नहीं।। रात्रि में विश्राम शब्द लगा देते हैं लेकिन शब्द ब्रह्म की हमारी जानकारी इतनी नहीं है।। बुद्धपुरुष भगवान बुद्ध ने निर्वाण कहा,कबीर ने पूरा पाया ऐसा कहा,शंकराचार्य जीसे मोक्ष कहते हैं,गरुड़ कृतार्थ भाव कहते हैं,पार्वती ने कृत्य कृत्यता कहा। सब एक ही बात है।। इतने पक्षी सुन रहे हैं लेकिन केवल गरुड़ बोला है कि मैं परम विश्राम पाया।। पाया नहीं तो विरोध में खड़े हो गए! बुद्ध के समय में।। कोई अधिकारी पा लेते हैं।कोईसंबोधि कहे समाधि भी कह सकते हैं।।
रूमी कहते हैं सही विश्राम तभी मिलता है आप अकेले ईश्वर के साथ हो।।बापू ने कहा कि यदि परमात्मा साथ हो तो अकेले कैसे? मुझे कहना है आप और ईश्वर दो होंगे तो वहां एकांत खत्म हो जाता है।।या तो आप रहो या ईश्वर रहे! वही एकांत है। वही परम विश्राम वाला एकांत है वहां मैं भी नहीं हूं तू भी ना रहे।।
कथा में आनंद तब आएगा जब आप और हम यह महसूस करें कि यहां कोई नहीं है।।कोई अन्य बोल रहा है कोई अन्य सुन रहा है।।
ओशो ने कहा था जब मैं ना रहूं तब आपके मार्गदर्शन देने वाला कोई परम बुद्ध मिल जाए तो उनसे प्राप्त करना।कोई सहज चेतना से मार्गदर्शन पाना या तो भाव से अंदर से पुकार करना मैं आपके पास हूं।। विनोबा जी ने भी यही कहा कि पूरे भाव से पुकारो! क्योंकि बुद्धपुरुष कभी जाता नहीं आत्मा नहीं मरती तो महात्मा कैसे मरे!
उपनिषद का एक मंत्र जहां तुलसी ने चार घाट पर रामकथा रचाई उन पर प्रकाश डालता है:
अथ: अश्वलायलोभगवंतंपरमेष्ठीनाम्
उपसमित्योवाच: अधि: भगवन्नब्रहमिद्यान्
वरिष्ठानसदासदभी: सेव्यमानाम्निगुढानाम्
यथाचिरातसर्वपापनययोहयपरात्परं….
अश्वलायलो नाम का ऋषि पितामह ब्रह्मा के पास जाता है और कहता है जो ब्रह्मविद्या निर्गुण है उन पर मुझे कुछ कहो।। वेदांत का मतलब ज्ञान का भी अंत है।। ऐसा ओशो ने कहा वेदांत का मतलब जहां ज्ञान का भी अंत है।। विद्वानों को पवित्र करने वाली विद्या वह मुझे कहो! तब बताया कि यह चार सूत्र से ब्रह्म विद्या के द्वार खुलते हैं वह है:श्रद्धा,भक्ति,ज्ञान और योग।।
बुद्धपुरुष को याद करेंगे तो आंसू आएंगे तब समझना आंसू नहीं बुद्धपुरुष खुद आए हैं।।पहली पीठ है जहां विश्वास बोलता है और श्रद्धा सुनती है दूसरी पीठ जहां परम विवेकी याज्ञवल्क्य बोलते हैं और भक्ति सुनती है।।और तीसरी भूसुंडी की पीठ जहां ध्यान बोलता है।।ध्यान पीपल के नीचे होता है पीपल का एक अपना संगीत होता है।।और ध्यान से सुनने के बजाय आप में बैठा ध्यान सुने।। वहां गरुड़ सुनता है और चौथा योग है जो तुलसी का घाट है।। वहां दीनता प्रपन्नता बोलती है और तुलसी का मन सुनता है। यही अर्थ यह उपनिषद् के मंत्र का है फिर राम कथा के प्रवाह में एकबार के कुंभ के मेले में भरद्वाज के आश्रम में याग्यवलक्यआये।।कुंभ खतम होते जाने लगे तब भरद्वाज ने पैर पकडे और कहा की मेरे मन में संशय है,रा तत्व क्या है?अविनाशी शंभु लगातार रटते है वह राम और दशरथ का बेटा,अयोध्या के राजकुमार दोनों एक है की भिन्न?
और जागबलिक मुनि शिव चरित्र से आरंभ करते है।।
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