
कईं निराकार वादियों को रामनाम ने सगुन तक पहुंचा दिया।।
सगुण और निर्गुण का बोध कराने वाला राम का नाम है।।
रामनाम सेतु है।।
रामनाम से तुं है!
सत्य,प्रेम और करुणा तीन वस्तु प्राप्त करने के लिए श्रवण करो,स्मरण करो और तीसरा शरण-आश्रय करो।।
श्रवण जन्म है,स्मरण जीवन है और शरण निर्वाण बोधिसत्व है।।
ओशो की कर्मभूमि तपोभूमी जबलपुर से बह रही रामकथा धारा का आज दूसरा दिन।।विलंबित में रामस्तुति और नाम स्मरण के बाद भारी मात्रा में आये हुए संन्यासी साधु संत विभूतियों के साथ संवाद रचते हुए बापु ने ओशो की चेतना और चेतनवंती भूमि को प्रणाम करते हुए बापू ने बताया रामकथा का आरंभ सत्य है।जैसे कोई भी शास्त्र हो आदि,मध्य,अंत होता है।मर्यादा पुरुषोत्तम,विवेक पुरुषोत्तम,विवेक पुरुषोत्तम,विराग पुरुषोत्तम,वैराग्य पुरुषोत्तम,लीला पुरुषोत्तम,करुणा पुरुषोत्तम,प्रेम पुरुषोत्तम की यह कथा है।।और मध्य है वह प्रेम है। समापन है वह करुणा है।।
यह तीन सूत्रों में आबध्ध रामकथा है।।
कोई भी विचारधारा में मैं नहीं मानता की सत्य प्रेम और करुणा से इनकार हो।। रूमी कहता है परमात्मा को प्राप्त करने के कई रास्ते हैं,मैंने प्रेम वाला रास्ता चुना है।प्रेम मार्ग पसंद किया है।।भगवान बुद्ध भी अपनी बोली में कहते हैं संबोधि निर्वाण प्राप्त करने के कई मार्ग है,मैंने करुणा का मार्ग पसंद किया है।।मैं बुद्ध का प्रवक्ता नहीं लेकिन जिस तरह से मैंने बुद्ध को फिल किया है।। भगवान राम साक्षात ईश्वर,परम तत्व है।।
राम के दो रूप है:निर्गुण और सगुण।।यह उपनिषदीया उद्घोषणा है। सगुण रूप में दशरथ के पुत्र और निर्गुण रूप में जगत में व्याप्त है।।लेकिन यह सगुण और निर्गुण का बोध कराने वाला राम का नाम है।।रामनाम सेतु है।। निर्गुण और सगुण को जोड़ता है।। शब्द की क्रिडा करें तो रामसेतु का मतलब राम से तूं है! राम नहीं तो तू नहीं,मैं नहीं। ब्रह्म है राम कई निराकार वादियों को रामनाम ने सगुन तक पहुंचा दिया।।शुकदेव जी परम अवधूत है निर्गुण तत्व को मानते। लेकिन कृष्ण नाम,कृष्ण रूप और कृष्ण की कृपा निधानता,अकारण दूसरों को मुक्ति देने वाली करुणा ने शुकदेव जी के चित् को पकड़ रखा है।। मुझे चांद के धब्बों से लेना देना नहीं मुझे चांदनी से लेना देना है।।
सत्य वेदांत स्वामी ने ओशो को पिया और पचाया कभी हम पी जाते हैं,पचा नहीं पाते और होश खो बैठते हैं।।कृष्णमूर्ति ने होश अवेयरनेस को ही सब कुछ बताया है।। महात्मा गांधी ने सत्य का मार्ग पसंद किया।।
रामचरितमानस का आदि सत्य,मूल सत्य है।। महुआ में सत्य वेदांत जी और विनु भाई के साथ हम सालों पहले बैठे थे और विनु भाई ने सत्य वेदांत को आचार्य रजनीश के बारे में पूछा कि ऐरगैर बातें बहुत सी ऐसी बातें आपके गुरु के बारे में होती है? तब सत्य वेदांत ने जवाब दिया कि मेरे गुरु के बारे में औरों ने जो भी सुना हो लेकिन मुझे मालूम नहीं। मुझे इतना ही मालूम है वह मुझ पर कितना बरसे है।। परम की गति अती विचित्र होती है।
सत्य,प्रेम और करुणा तीन वस्तु प्राप्त करने के लिए श्रवण करो,स्मरण करो और तीसरा शरण-आश्रय करो।।श्रवण जन्म है,स्मरण जीवन है और शरण निर्वाण बोधिसत्व है।।अंतःकरण से सुनते हैं तो राम नाम मणि प्रकाश धीरे-धीरे दिखने लगता है। फिर एक नाद गूंज सुनाई देती है और आखिर में राम नाम की खुशबू आने लगती है।।
आंसु चमत्कार नहीं आंसू प्रमाण है।।
स्वामी अरुण आनंद जी-काठमांडू आश्रम-ने पंचशील नामक एक बुक लिखी है।। वहां वह कहते हैं पहला शील शुद्धि है।। शरीर,विचार,वस्त्र,आहार, अपनी हर प्रकार की शुद्धि।।जब तक सत्वगुन, रजोगुण और और तमोगुण है तब तक हम शुद्ध नहीं सत्व गुण है तब स्वच्छ है,लेकिन शुद्ध नहीं ।।शुद्ध वह है जो तीनों गुण से मुक्त है।। दूसरा है:संस्कार, तीसरा गुरु ने बताई साधना पद्धति,चौथा साधु का संग,पांचवा स्थान समाधि जो मेरी दृष्टि में परम विश्राम है।।
तुलसी का राम सुंदर है। सुजान है। कृपा निधान है अनाथ पर प्रीति करने वाला,बिना कारण करुणा करने वाला और निर्वाण देने वाला है।। निर्माण किया जाता है निर्वाण दिया जाता है।।
फिर कथा क्रम में तुलसीदास ने गाया हुआ लंबा रामनाम का वंदना प्रकरण,नाम वंदना का गान किया गया।।
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