
नाम,नामी को पराधिन कर देता है।
नाम का आश्रय खूब करो,निरंतर करो।।
कलयुग दोष का भंडार है लेकिन एक बड़ा गुण है: केवल नाम से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।।
शुक ही हमारा सुख है।
शोक मिट जाता है तब शुक बचता है।।
आदमी में शौक से तीन वस्तु छूट जाती है:ज्ञान,धैर्य लज्जा।।
शोक की जगह श्लोक आ जाए तो ज्ञान विज्ञान में परिवर्तित हो सकता है।।
यदि कथा सत्संग है तो फिर विवेक क्यों नहीं:बापु की पीडा़।।
सर्वश्रेष्ठ आश्रय कथा का आश्रय है।।
अवधूत शिरोमणि शुकमुनि की परम चेतनमयी भूमि शुक्रताल से बह रही रामकथा धारा गुरुवार को छठ्ठे दिन में प्रवेश कर रही है तब शुकदेव जी को प्रणाम करने के साथ एक बुद्ध पुरुष के चरणों में जिसका नितांत दृद्धाश्रय हो चुका है ऐसे राजर्षि परीक्षित को भी प्रणाम करते हुए बापू ने कहा की भागवत में स्वर्ग,सर्ग,अपसर्ग,आश्रय ऐसी १० बातें पूछी गई है लेकिन कोई भागवत के विद्वान ही इनमें ज्यादा उत्तर दे सकते हैं।।क्योंकि विद्वानों की परीक्षा भागवत में होती है।। इन दस में से मैं आपको आश्रय की ओर ले चलुं। यदि आश्रय नहीं है तो वह स्वर्ग भी,सर्ग और अपवर्ग भी काम नहीं आएगा।। लेकिन यह सब महापुरुष समझा सकते हैं।। महापुरुषों से सुनकर आपकी रुचि में बैठे तो ठीक है लेकिन एकमात्र आश्रय को हम देखें।।आश्रय नव प्रकार के हैं:एक है:नाम आश्रय-नाम का आश्रय।। नाम का आश्रय खूब करो,निरंतर करो।जो नाम में आपकी रुचि है।कलयुग दोष का भंडार है लेकिन एक बड़ा गुण है केवल नाम से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।यह बहुत सरल आश्रय है-नामाश्रय।अपने बुध्ध पुरुष के नाम का आश्रय।
परीक्षित को कथा सुनाकर शुक जा रहे थे तब परीक्षित कृष्ण के गुण का नहीं लेकिन शुक,शुक ही बोल रहे थे।।शुक ही हमारा सुख है।शोक मिट जाता है तब शुक बचता है।।
आदमी में शौक से तीन वस्तु छूट जाती है:ज्ञान,धैर्य लज्जा।।शोक की जगह श्लोक आ जाए तो ज्ञान विज्ञान में परिवर्तित हो सकता है।यद्यपि ज्ञान विज्ञान सापेक्ष है।।आदमी विज्ञान विषारद हो जाता है।।अश्रु दूसरा आश्रय है।बलात नहीं भाव जगने नाम से आंख में आंसू आ जाए।जिनके पास नाम आ गया नामी को कभी ना कभी आधिन होना पड़ेगा।।नाम नामी को पराधिन कर देता है।अश्रु आश्रय का शास्त्रीय नाम है-जलाश्रय।खूब भजन करते-करते शरीर में से पसीना आ जाए,आंसू आ जाए।।तीसरा है:थलाश्रय-एकांत में एक स्थान पर बैठकर जाप करना।।चौथा है:रूप का आश्रय।परम का रूप मन में जगह बना ले।।पांचवा है:धाम आश्रय-संकल्प करके किसी धाम में बैठ जाना।छठ्ठा- गुरु की दी गई कोई चीज का आश्रय।
भागवत गजब शास्त्र है,रामायण अजब शास्त्र है।। सातवां है विवेक का आश्रय।।
बिनु सत्संग बिबेक न होइ।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
बापू ने आज यह इंगित किया की कथा पंडाल में जो घटना घटती है।।बार-बार धमाल होती है उन पर बापू ने कहा कथा यदि सत्संग है तो फिर विवेक क्यों नहीं बैठता! बैठने के लिए इतना झगड़ा? यह क्या तमाशा है! मेरी मेहनत तो देखो!! मैं घर फूंक के निकला हूं। सालों से अकेले घूम रहा हूं।
एक कहानी बताई। एक अस्पताल में डॉक्टर मरीज को जांच करके एक चिट्ठी लिखकर जाता है कि दो दिन में स्वस्थ हो जाएगा।। दूसरे कमरे में चिट्ठी लिख कर गए कि यह मरीज यह दर्दी को ठीक होने में ५-७ दिन लगेंगे।तीसरे कमरे में दर्दी को चेक करके चिट्ठी लिखी की यह दर्दी कभी ठीक नहीं हो पाएगा।। जब जाना गया पहले कमरे में जो दर्दी था उसे किसी सांप ने डसा था। डॉक्टर ने जांच की और जहर उतारने के लिए दवाई आदि दी और दो-तीन दिन में जहर विष उतर जाने वाला है। दूसरे कमरे में रहे दर्दी को किसी पागल कुत्ते ने काटा और डॉक्टर ने जांच कर दवाइयां दी और देखा कि ५-७ दिन में वह भी ठीक हो जाएगा।लेकिन तीसरे कमरे में जो दर्दी था उस आदमी को किसी आदमी ने काटा है! इसका कोई इलाज नहीं।। यदि कथा सत्संग है तो फिर विवेक क्यों नहीं! बापू ने कहा यदि मैं वहां जाऊं और कोई पूछे कि इलाज क्या है? एक ही इलाज है:करुणा।जो में प्रयत्न कर रहा हूं।
बापु ने एकबार कहा था कि रामकथा शुरु होने से पहले कथा पंडाल में महाभारत होता है।
सर्वश्रेष्ठ आश्रय कथा का आश्रय है।।
कथा के प्रवाह में राम और लक्ष्मण जनकपुर नगर दर्शन के लिए गए और सीता जी भी देवी की पूजा के लिए आती है। राम और सीता का प्रथम परिचय प्रथम मिलन होता है।।
राम ने शील से अयोध्या,रूप से जनकपुरी और बाल से लंकापुरी को वश किया था।।धनुष भंग के बाद सिताराम जी सहित चारों भाइयों का विवाह और कन्या विदाय के बाद अयोध्या में समृध्धि बढती हैै।विश्वामित्र जी अयोध्या का छोडकरस वन में जाते है ये संक्षिप्त कथा का गान कर के बालकांड का समापन किया गया।।

