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सनातन हिंदु धर्म के रक्षक छत्रपति शिवाजी की कूलदेवी मॉं तुलजा भवानी की शक्तिपीठ पर पांचवे दिन की कथा का हुआ गान।।

साधुमत,लोकमत,राजमत,वेदमत-ये ऱाष्ट्र कल्याण का आधि भौतिक स्वस्तिक है।।

साधुमत की छाया में लोकमत होना चाहिए।।

शिक्षा व्यवस्था राज्यश्रित नहीं,ऋषि आश्रित होनी चाहिये।।

मौन और मानस का अनुष्ठान त्रिभुवनिय मानसिकता में शताब्दियों से चल रहा है।।

मंत्र,विधि,दक्षिणा,श्रद्धा और भोजन यह पांच यज्ञ में होना जरूरी है।।

दूसरों के लिए कुछ स्वाहा करना ही यज्ञ है।।

 

सनातन-हिंदु धर्म के रक्षक छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी मॉं तुलजा भवानी की शक्तिपीठ के ऐतिहासिक स्थान महाराष्ट्र के तुलजापुर में रामकथायात्रा पांचवे दिन में प्रवेश कर रही है तब बापू ने बताया की शिवाजी महाराज को तुलजा भवानी मॉं ने जो तलवार दी उनका नाम भवानी था।।

और गुजरात के राष्ट्रीय शायर झवेरचंद मेघाणी ने लोरी भी लिखी वह लोरी का गान करते हुए:

आभमां उगेल चांदलो ने जीजाबाई ने आव्या बाळ

रे शिवाजी ने मात हिंचोडे़..धणणण डूंगरा डोले.. वैश्विक हिंदुत्व गगन सिद्धांत वाले सनातन परंपरा की रक्षा के लिए शिवाजी ने काम किया।।

गुजराती में भवन्स की ओर से ‘नवनीत समर्पण’ नाम का एक मैगजीन निकलता है ।वहां राजेश व्यास ‘मिस्कीन’ एक बार मॉं के हजार नाम में एक-एक के बारे में लिखा था।

माता के अनेक नाम में से शंकराचार्य जी ने भवानी शब्द का आधार लिया।।गोस्वामी जी ने भी भवानी नाम का आधार बनाया।।

बापु ने कहा हमारे तलगाजरडा के रामजी मंदिर के सामने जो स्कूल थी वहां में पढ़ता था,उसी के कोने में भवानी माता का मंदिर था।।शंकराचार्य जी ने भवानी अष्टक लिखा और तुलसी जी ने नाम देते समय उमा अंबिका भवानी शब्द नारद के मुख से बुलवाया।।

बापू ने यह भी कहा कि मौन और मानस का अनुष्ठान त्रिभुवनिय मानसिकता में शताब्दियों से चल रहा है।।मैं बहुत छोटा था तब से मेरा मौन रहता था।।

भगवान राम ने यहां भी साधना की थी।।आज कुष्मांडा का नवरात्र है जो शीतल प्रकाश की अधिष्ठात्रि मानी जाती है।।

जब शिवाजी ने पूरा राज्य समर्थ स्वामी रामदास जी को समर्पित किया तब रामदास जी ने कहा कि राज तुं चला लेकिन ऊपर भगवे रंग का ध्वज लहराना चाहिए।।यह शहीदों का,समर्पण का रंग है।। महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय का विट्ठल रुक्माइ का कीर्तन का गान करते हुए बापू ने कहा कि राम कृष्ण हरि शब्द हमारे सौराष्ट्र के साधु मोहनदास बापू जसदन वाले अर्थ लगाते थे कि विट्ठल और रुक्मणी अलग नहीं है।।लेकिन जब विट्ठल जगत कल्याण के लिए दूर होते हैं तो साधु को अच्छा नहीं लगता।वह रोकने के लिए मॉं को कहते हैं विठ्ठोबा रुकमाइ! ऐसा भी एक अर्थ निकाल सकते हैं।।

भगवद्गोमंडल नाम का गुजराती शब्दकोश वहां स्वास्तिक के बारे में कितने ही अर्थ है।।वह कहते हुए बापू ने कहा:

२८ ग्रह में एक ग्रह स्वस्तिक है।।अष्ट कोणिय पिलर स्वास्तिक कहलाता है।।चारों दिशाओं में फैलती चार पर्णों वाली एक वनस्पति भी स्वास्तिक है।। हाथों को अदब से जोड़ के बैठने का अभिनय,जो अभिनय शास्त्रों के २४ प्रकार में से एक है।।स्वास्तिक थेरेपी भी है,हृदय रोग में काम आ सकती है।।गोख और गवाक्ष में एक स्वास्तिक गोंक है।। राशि चक्र की दक्षिण दिशा में,चार सितारों के समूह को स्वस्तिक कहते हैं।।तारामंडल की मदद से दिशा और समय का सूचन होता है।। स्वस्तिक को दक्षिण की दैवी घड़ी माना गया है।।ओम का अपभ्रंश स्वरूप स्वस्तिक है।।आदि भौतिक,आदि दैहिक, और आध्यात्मिक स्वास्थ्य के बारे में भी हम बात करेंगे वहां ओम अध्यात्मिक स्वस्तिक है।।धर्म,अर्थ काम आदि दैहिक,आधी भौतिक राष्ट्र को लागू पड़ता है।।यज्ञ कुंड के चार कोने वाला स्वस्तिक कुंड है।।यदि ठीक से जीना है तो चतुष्कोण यज्ञ कुंड, जैसे विवाहो में बनाते हैं वह रखना चाहिए।।

बापू ने कहा कि मंत्र,विधि,दक्षिणा,श्रद्धा और भोजन यह पांच यज्ञ में होना जरूरी है।।दूसरों के लिए कुछ स्वाहा करना ही यज्ञ है।।जैन परंपरा में इंद्रक विमान को स्वस्तिक कहते हैं।।एक प्रकार की सब्जी भी स्वस्तिक है।।एक प्रकार का कल्याणकारी द्रव्य है और एक प्रकार के घर का आकार भी स्वस्तिक माना गया है।।स्वस्तिक नाम का एक मिष्ठान है,स्वादिष्ट मनोहर पकवान है।।१०५ यंत्र के ६ विभाग में से एक भाग स्वस्तिक है।। गुजरात के विसनगर में एक नगर,आठ कोनें वाला,स्वस्तिकराज वल्लभनगर है।।लेकिन सब के कल्याण को स्वस्तिक कहते हैं।।

रामचरितमानस में नौ बार समाधि शब्द कहां लिखा वह बापू ने कहा और आधी भौतिक स्वस्तिक के बारे में बताते हुए कहा कि जिन में राष्ट्र कल्याण कैसे होना चाहिए वह सूत्र है।।यह स्वास्तिक के चार कोने है।जो रामचरितमानस से हमें मिलता है।। चित्रकूट में भरत जी के साथ जब सभा हुई।वशिष्ठ जी के मुख से यह संवाद मिलता है। वहां साधुमत, लोकमत,राजमत और वेदमत की बात की।।कल्याण राज का नारा आया।।कहते हैं कि बालकांड का आदि,अयोध्या कांड का मध्य(चित्रकूट की सभा) उत्तरकॉंड का अंत(सात प्रश्न वाला)वह जान ले वह संत है।। साधुमत और वेदमत के बीच में लोकमत और राजमत है।।राष्ट्र कल्याण के लिए जरूरी है।।वेदमत को पीछे रखा साधुमत को पहले लिखा है।।लेकिन लोकमत का अनादर नहीं है।।साधुमत की छाया में लोकमत होना चाहिए।।आखिरी व्यक्ति का मत लेना चाहिए बापू ने यह भी कहा कि हारे हुए का भी मत लो।।देश में आजकल जो घटनाएं घट रही है उस पर बापू का यह इशारा था की सिकंदर और पौरुष-पुरु के युद्ध में सिकंदर जीत गया और बंधक पौरुष से पूछता है कि आपके साथ कैसा व्यवहार करें? तब पौरुष ने कहा एक राजा के साथ दूसरा राजा व्यवहार करें ऐसा! मैं आज पराजित हूं,कल तूं भी पराजित हो सकता है।।लोकमत की प्रतिष्ठा होनी चाहिए।।एकमात्र साधुमत ऐसा है जो खरीदा नहीं जा सकता।। पहले साधुमत,फिर लोकमत,फिर राजनीति का मत तीसरे स्थान पर।।विनोबा जी के मत का भी आदर होता था।।इंदिरा गांधी वर्धा विनोबा जी के आश्रम में जाकर सादगी भरे कमरे में रहती थी।।चौथा वेद का सार आखिरी मत है।।यह राष्ट्र कल्याण का स्वस्तिक है।।कोई माने ना माने, लेकिन रेकॉर्ड हो रहा है।कभी ना कभी बाहर आएगा और कल्याण राज्य के लिए यह पूरा काम में आएगा।।

शक्षा जब से वित्त और सत्ता आधारित हो गई, राज्यश्रित नहीं ऋषि आश्रित होनी चाहिए।।यह पैसे वालों के पास चली गई।।बड़ी-बड़ी संस्था वाले अपने विचार डालते हैं और वहां से जो फाल निकलता है वो सनातन को गालियां देते हैं!!धर्म संस्थानों में भी अपने सब का मत लेना चाहिए।। तुलसी जी ने वेद का सार लिखा:

यही मह रघुपति नाम उदारा।

अति पावन पुराण श्रुति सारा।।

शिवजी ने समाधि से उठकर सहज आसान लिया। तब भल अवसर जानकर पार्वती जी ने राम तत्व के बारे में जिज्ञासाये की और पूछा कि राम क्या है? पुरान वाला राम और दशरथ का बेटा राम एक है कि बिलग है?और राम का अवतार क्यों हुआ?सभी प्रश्नों के जवाब में शिव जी ने राम अवतार के विदविद कारणों को कहने का आरंभ किया।।

कल की कथा पांच माताओं को समर्पित हूइ।आज की कथा को शिवाजी की माता जीजाबाइ के चरणों में समर्पित किया गया।।

कथा-विशेष:

छठ्ठे दिन की कथा जहां होगी वो ओंकारेश्वर

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है।।

यह मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में मंधाता या शिवपुरी नामक द्वीप पर स्थित है।।

यह नर्मदा और कावेरी नदियों के संगम और नर्मदा नदी के तट पर बसा है।

इंदौर से लगभग ७७-किलोमीटर और उज्जैन से लगभग १४०-किलोमीटर दूर है।।

यह दुनिया का एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है,जिसका द्वीप प्राकृतिक रूप से ‘ॐ’ के आकार का है।

ममलेश्वर मंदिर: नर्मदा नदी के दक्षिणी तट पर ममलेश्वर (अमरेश्वर) मंदिर स्थित है।।

ओंकारेश्वर और ममलेश्वर दोनों को मिलाकर एक ही ज्योतिर्लिंग का रूप माना जाता है।

मान्यता है कि भगवान शिव हर रात यहां विश्राम करने आते हैं,इसलिए रात में यहां शयन आरती और चौसर (पासे) की व्यवस्था की जाती है।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में नर्मदा नदी के बीच ‘मानधाता’ या ‘शिवपुरी’ नामक द्वीप पर स्थित है,जो प्राकृतिक रूप से ‘ॐ’ के आकार का है।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्रमुख रहस्य और मान्यताएं:

‘ओम’आकार का द्वीप:यह पूरा द्वीप प्राकृतिक रूप से ‘ॐ’ के आकार में बना हुआ है और इसके चारों ओर नर्मदा नदी बहती है,जो एक प्राकृतिक जलहरी का रूप मानती है।।

आदि शंकराचार्य की गुफा:इसी स्थान के पास वह गुफा मौजूद है जहां आदि शंकराचार्य अपने गुरु गोविंद भगवद्पाद से मिले थे।।

राजा मानधाता और अमरेश्वर मंदिर:सूर्यवंशी राजा मानधाता की तपस्या के कारण इस पर्वत का नाम मानधाता पड़ा।।

यहां मुख्य ओंकारेश्वर के साथ ही ‘अमलेश्वर’ (ममलेश्वर) मंदिर के दर्शन की भी परंपरा है।विंध्य पर्वत की तपस्या: पौराणिक कथा के अनुसार,विंध्य पर्वत ने घमंड त्यागकर यहां भगवान शिव की छह महीने तक कठोर पार्थिव तपस्या की थी,जिससे प्रसन्न होकर शिव जी यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए।।

शिव और पार्वती का चौसर खेलना:ऐसी गहरी मान्यता है कि रात में शयन आरती के बाद भगवान शिव और माता पार्वती यहां चौसर (पासे) खेलते हैं। सुबह जब मंदिर के कपाट खुलते हैं, तो गर्भगृह में पासे बिखरे हुए और सेज (बिस्तर) मुड़ी हुई मिलती है।।

== समाप्त ==

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