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मेरा मार्ग विश्वास का है। जो कुछ भी मैंने पाया है, वह विश्वास से ही पाया है – पूज्य मोरारी बापू

असुरी तत्वों के विनाश और सभ्यता की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने पड़ते हैं। 

आज दुनिया को ऐसे साधुचरित्र लोगों की ज़रूरत है, जिनमें केवल मानवता हो।

“मानस नालंदा विश्वविद्यालय”केआजकेचौथेदिनकेसंवादमेंपूज्यमोरारीबापूनेकहाकिकथाकीदोकेंद्रीयचौपाइयोंमेंसेपहलीचौपाईमेंवशिष्ठजीकेविश्वविद्यालयकासंकेतहै, जबकि दूसरी चौपाई में वाल्मीकि जी के विश्वविद्यालय का। वशिष्ठजी के विद्यापीठ में राम गए और सारी विद्या उनमें समा गई। वशिष्ठजी के विश्वविद्यालय का स्वभाव ऐसा है कि शिष्य गुरु को देखे और गुरु में रही सारी विद्या शिष्य में समा जाए।

बापू ने कहा कि गुरु स्वयं को पूरी तरह शिष्य में उतार देता है। इसके लिए शिष्य में चार गुण आवश्यक होते हैं। पहला – आर्त भाव। शिष्य को आर्त होना चाहिए। उसके हृदय से एक पुकार उठनी चाहिए। तब ऐसा आर्त शिष्य अपने प्रयास से नहीं, बल्कि गुरु की कृपा से प्राप्ति करता है। दूसरा – शिष्य को लक्ष्य प्राप्ति के लिए अर्थार्थी होना चाहिए। तीसरा – शिष्य को जिज्ञासु होना चाहिए। जिज्ञासा के तीन प्रकार होते हैं – ब्रह्म जिज्ञासा, भक्ति जिज्ञासा और धर्म जिज्ञासा। जिज्ञासु शिष्य में गुरु समा जाता है, फिर द्वैत मिट जाता है और अद्वैत प्रकट होता है – यही ज्ञान की भूमिका है। भगवान राम आर्त हैं, मनुष्य रूप में होने के कारण अर्थार्थी हैं और जिज्ञासा के साथ गुरुकुल आए हैं, इसीलिए वशिष्ठजी की सारी विद्या उनमें समा गई।

पूज्य मोरारी बापू ने आगे कहा कि गुरु महादानी होता है। वह अपना सर्वस्व शिष्य को अर्पण कर देता है। वह खाली को भर देता है और फिर भी उसमें कोई कमी नहीं आती। वाल्मीकि जी ने रामायण में “कांड”शब्दकाप्रयोगकियाहै।कांडहमेशामनुष्यमेंहोताहै।तुलसीदासजीकेरामपरमात्माहैं, और परमात्मा तक पहुँचने के लिए सोपान (सीढ़ियों) की आवश्यकता होती है, इसीलिए तुलसीदासजी ने मानस में “कांड”कीजगह“सोपान”शब्दकाप्रयोगकियाहै।

वशिष्ठजी के विश्वविद्यालय में पाँच विद्याएँ हैं – ब्रह्मविद्या, योगविद्या, अध्यात्मविद्या, वेदविद्या और लोकविद्या। वशिष्ठजी से शास्त्रविद्या प्राप्त कर भगवान राम विश्वामित्रजी के विश्वविद्यालय में जाते हैं। उन्होंने भगवान को शास्त्रविद्या प्रदान की।

बापू ने यहां स्पष्ट रूप से कहा कि, “यदि हमें अस्त्र-शस्त्र की विद्या प्राप्त होती, तो हम आक्रमणकारियों का सामना कर पाते।”

परंतु साथ ही बापू ने यह भी कहा: “मैं कभी भी शस्त्र या युद्ध के पक्षमें नहीं हूँ।असुरीतत्वों के विनाश और सभ्यताकी रक्षा के लिए शस्त्रविद्या आवश्यक है। इसी लिए भगवान कृष्णको भी युद्धमें उतरना पड़ा था।”

राम को विश्वामित्रजी ने बल-अतिबल विद्या, अस्त्र-शस्त्र विद्या, उद्धारक विद्या, यज्ञ विद्या और यात्रा विद्या प्रदान की थी। बल और अतिबल विद्याओं से व्यक्ति को भूख-प्यास नहीं लगती। अस्त्र-शस्त्र विद्या से राम असुरी तत्वों का विनाश करते हैं। उद्धारक विद्या से राम ने अहिल्या का उद्धार कर उसे स्वीकार किया। यज्ञ विद्या से राम ने ऋषियों के यज्ञ की रक्षा की, और यात्रा विद्या में विश्वामित्रजी राम को जनकपुरी ले जाते हैं। यात्रा विद्या द्वारा गुरु शिष्य को संसार का दर्शन कराता है।

बापू ने स्पष्ट किया, “यह भाष्य नहीं है, यह केवल गुरु कृपा है।”

गुरु कृपा से कुछ बातें तभी समझी जा सकती हैं, जब शिष्य को तीन नेत्र प्राप्त हों। महादेव से जुड़े तीन शब्द शिष्य के तीन नेत्र बनते हैं – निज, अज और सहज। अज यानी अजन्मा – विश्वास कभी जन्म नहीं लेता, वह स्वभाव रूप में होता है। विश्वास स्वयं पर – निज पर – करना चाहिए। दूसरों पर किया गया विश्वास कभी-कभी विश्वासघात में बदल सकता है। व्यक्ति को स्वयं पर भरोसा होना चाहिए – खुद पर श्रद्धा होनी चाहिए, उधार का विश्वास नहीं! तीसरी आंख है – सहजता। व्यक्ति में सहज विश्वास होना चाहिए।

जब शिष्य के पास ये तीन दृष्टियां आ जाएं, तब वशिष्ठ विद्यापीठ और विश्वामित्र विद्यापीठ को गहराई से समझा जा सकता है। बापू ने कहा, “मेरा मार्ग विश्वास का है। जो कुछ भी मैंने समझा है, वह विश्वास से ही समझा है।”

तक्षशिला का अर्थ बताते हुए बापू ने कहा कि “तक्ष”यानीतराशनाऔर“शिला”यानीपत्थर।विद्यापीठमेंजोछात्रआताहै, वह पत्थर की तरह होता है – अलग-अलग प्रकार के पत्थर! विद्यापीठ का कुलपति उसे तराशता है और अनावश्यक भाग को हटा देता है। जैसे प्रत्येक हृदय में परमात्मा होता है, हर धागे में वस्त्र छिपा होता है और हर पेड़ में मूर्ति (काष्ठ-प्रतिमा) छिपी होती है। जब गुरु पेड़ पर से अनावश्यक लकड़ी हटा देता है, तब उसमें से सुंदर मूर्ति प्रकट होती है। प्रत्येक व्यक्ति में जन्म-जन्म के कई शरीर छिपे होते हैं। अवसर मिलते ही वे प्रकट होते हैं। जो आचार, विचार और संस्कार से जगत को दिशा दे – वही तक्षशिला है!

बापू ने कहा कि प्रकाश अच्छा है, लेकिन वह दोष भी दिखाता है। अंधकार में किसी भी वस्तु के गुण-दोष नहीं दिखते। अंधकार का भी अपना उजाला होता है। अंधकार और प्रकाश दोनों सापेक्ष होते हैं। साधना के लिए अंधकार उपयोगी होता है। हर हर किसी की अपनी विशिष्ट पहचान है – कोई भी व्यक्ति या वस्तु किसी और के समान नहीं होते।

बापू ने कहा: महादेवजी“नीलकंठ”हैं, काकभुशुंडी जी “शीलकंठ”हैं, याज्ञवल्क्य जी “दिलकंठ” हैं और तुलसीदासजी“ कीलकंठ” (कोकिलकंठ) हैं।

कथा क्रम में प्रवेश करते हुए पूज्य बापू ने शिव चरित्र को आगे बढ़ाया – सती द्वारा राम की परीक्षा, शिव के समक्ष सती का झूठ बोलना, शिव द्वारा सती का त्याग और अखंड समाधि में बैठना, पिता के यज्ञ में सती का देहत्याग, हिमालय में पार्वती रूप में पुनर्जन्म, शिव विवाह के बाद कार्तिकेय का जन्म और ताड़कासुर का विनाश, फिर पार्वती जी द्वारा रामकथा के श्रवण की जिज्ञासा तक की कथा का संक्षेप में वर्णन कर आज की वाणी को विराम दिया।

रामकथा में बिहार के राज्यपाल का भावपूर्ण स्वागत

आज रामकथा के चौथे दिन व्यासपीठ का अभिवादन करने के लिए बिहार के माननीय राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खान

साहब विशेष अतिथि रूप में उपस्थित हुए। व्यासपीठ को नमन कर उन्होंने पूज्य मोरारी बापू और श्रोताओं का शब्दों द्वारा स्वागत किया। अपने विद्वत्तापूर्ण वक्तव्य से उन्होंने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

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