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श्रीमद् भागवत की अवतरण भूमि शुक्रताल से गुंजी मोरारिबापु की मानस की पंक्तियां।।

मेरे मन में अवधूतो,परमहंसों,बुद्ध पुरुषों के प्रति शायद जन्म-जन्म का लगाव रहा है।।

मैं विश्वास से कहता हूं शुकदेव जी चिरंजीवी नहीं,अमर है।।

रामचरितमानस स्वयं पक्षी तीर्थ है।।

साधु का ध्यान मूर्ति का नहीं मूर्तिमंत ध्यान है।।

सुक सनकादि भगत मुनि नारद।

जे मुनिबर बिग्यान बिसारद।।

सुक सनकादि सिध्ध मुनि जोगी।

नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी।।

पूंछेहुं रामकथा अति पावनि।

सुक सनकादि संभु मन भावनि।।

द्वापर युग में महर्षि-ब्रह्मर्षि शुकदेव जी ने पहलीबार पृथ्वि के धरातल पर राजर्षि परीक्षित को श्रीमद भागवत सुनाया वो भागवत जी की अवतरण भूमि,श्री सुखदेव आश्रम,शुक्रताल-मुझफ्फर नगर(यु.पी.) से शनिवार शाम को मोरारिबापु के श्री मुख से इन पंक्तियों के गान से नव दिवसीय रामकथा का शुभारंभ हुआ।।

आरंभ में शुक्रतीर्थ महामंडलेश्वर उमानंद जी गुरु कल्याण देव जी,हनुमंत धाम महामंडलेश्वर केशवानंद जी महाराज,गायत्री उपासक ब्रह्मचारी जी एवं अन्य संतो के पवित्र हस्तों से दीप प्रागट्य हुआ।।महामंडलेश्वर श्री उमानंद जी ने स्वागत भाव रखा।।

सबसे पहले बापू ने परम पावनी भगवती गंगा के तट पर पुनः एक बार रामकथा गाने का अवसर प्राप्त हुआ वह सब का बड़ा भाग्य बताते हुए कहा बाल अवधूत,आरंभ में निर्गुण में निष्ठा रखने वाले और बाद में उत्तम श्लोक से चित् कृष्णा में खींचा गया ऐसे अवधूत शिरोमणि,परमहंस,बुद्धपुरुष शुकदेव जी महाराज के चरणों में प्रणाम करते हुए कहा यह भागवत भूमि एक बड़े महापुरुष,अवधूत कल्याण देव जी महाराज की भी भूमि है।।यहां आत्म साक्षात्कार और परोपकार की बात अभी ही स्वामी जी ने बताई।

बापू ने कहा मेरे मन में अवधूतो,परमहंसों,बुद्ध पुरुषों के प्रति शायद जन्म जन्म का लगाव रहा है।। इससे पूर्व पंच कथाएं हो चुकी है।।गोपी गीत का १८वां श्लोक इस भूमि पर गाया गया था।।

सबसे पहले तो यहां एक यात्रा में आया था।मां आनंदमयी मां भी हयात थी और उन्हीं के आश्रम में हम ठहरे थे।लेकिन किसी कारण नींद नहीं आ रही थी।पूरी रात भागवत जी के दशम स्कंध का पाठ किया था।।

यह कथा इजिप्त में होने वाली थी लेकिन दुनिया की राजकीय स्थिति के कारण परिवर्तन होता रहा।।पहले इस कथा का नाम शुकदेव जी के नाम पर करना था लेकिन यहां शुकतीर्थ शब्द बार-बार आता है तो यह कथा शुकतीर्थ नाम पर होगी।।

पूरान अंतर्गत और अन्यान्य ग्रंथों में और विशेष महाभारत के शांति पर्व में धर्म मोक्ष प्रकरण में व्यास जी ने स्वयं शुकदेव जी के जीवन के बारे में प्रकाश डाला है।।

व्यास जी हिमालय में विचरण कर रहे हैं और इस भूमि पर आते हैं उनके मन में इच्छा हुई कि सूर्य जैसा तेजस्वी,जल जैसा सरल,तरल,शीतल,आकाश जैसा व्यापक,पर्वत जैसा अचल,धरती के समान सहनशील,क्षमाशील पुत्र का में पिता बनुं।।ऐसा अवधूत पुत्र के लिए बहुत काल तक व्यास जी ने तपस्या की।।भगवान शंभू प्रसन्न होते ही कहा कि आप जैसा पुत्र चाहते हैं ऐसा कोई योनि से नहीं आ सकता।वह अयोनिज हो सकता है।।माता-पिता के विहार से ऐसा पुत्र नहीं आ सकता। लेकिन आप अरणीमंथन करें और अरणि मंथन से ऐसा पुत्र प्राप्त हो सकता है।।

भगवान शुकदेव जी अरणि मंथन से प्राप्त होते हैं। अन्य ग्रंथों में अलग-अलग कथा मिलती है।।

शुकदेव जी महाराज के बारे में क्या कहे! चिरंजीवियों कि यदि है।लेकिन वह चिरंजीवी,दीर्घायु है,अमर नहीं है।।मैं विश्वास से कहता हूं शुकदेव जी चिरंजीवी नहीं,अमर है।।और अजर का सवाल ही नहीं,जरा उसको स्पर्श ही नहीं हुई थी।कईं महापुरुषों यहां शुकदेव जी के दर्शन होते हैं।। रामचरितमानस स्वयं पक्षी तीर्थ है।।शुक पक्षी है तोता है।।

बालकांड में कई विशेष स्वभाव के पक्षी दिखेंगे। पक्षी भी गति करते हैं।।रामचरितमानस के सातों कांड गति का प्रतीक है।।साधु का ध्यान मूर्ति का नहीं मूर्तिमंत ध्यान है।।परमात्मा की शरणागति हम सूत्रों के रूप में कर सकते हैं लेकिन साधु की शरणागति हम प्रत्यक्ष रूप में कर सकते हैं।।परमात्मा को हम मानसिक भोग लगा सकते हैं साधु को प्रत्यक्ष भोग लगा सकते हैं।।

पूरा रामचरितमानस पक्षी तीर्थ है तो बालकांड गति का प्रतीक है। अयोध्या कांड प्रगति का प्रतीक है। अरण्य कांड में नीज गति,सुंदरकांड शरणागति, लंका कांड उर्दव गति और उत्तराकॉंड परम गति का निर्देश करता है।।

फिर ग्रंथ माहात्म्य सात कांड।सात सोपान रूपी सीडी और पहले कांड में सात मंत्र और वंदना प्रकरण के सात श्लोक से लोक तक की यात्रा करवाते तुलसी की चौपाई सोरठा लिखते हैं और विधि प्रकार की वंदनाओं के बाद गुरुवंदना और आखिर में हनुमंत वंदना का गान करके आज की कथा को भी राम दिया गया।।

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