
“विश्वास से कहूंगा की समाधि भाषा-संस्कृत मेरे त्रिभुवन दादा को जानती थी।।”
संस्कृत आधि,व्याधि या उपाधि भाषा नहि,समाधि भाषा है।।
संस्कृत भाषा नहि,देव गिरा,बानी,समाधि भाषा है।।
शास्त्र का अर्थ करने के लिए एक नया शास्त्र चाहिए,मैं उसे साधुसंहिता कहता हूं।।
साधु सब का बाप है,साधु का कोई बाप नहीं।।
कबीर मशाल लेकर चलते थे,मुझे भी मानस मशाल पर बोलना है,हो सके तो काशी में बोलना है।।
यह काल शास्त्रार्थ करने का नहीं,शास्त्र का सार समझ कर एक जगह बैठ जाने का है।।
शुकदेव तोता क्यों है?
ततक्षण जो साधुसंग करता है उसे तक्षक कुछ नहीं कर सकता।।
साधु की पंगत नहीं,संगत होती है।
साधु का कोई कुल नहीं होता,साधु कुल(टोटल) और कूल(ठंडा) होता है।।
साधु का कोई धर्म नहीं,साधु का मर्म होता है।।
साधु का कोई परिजन नहीं,सब प्रियजन है।।
शुक्रताल-मुझफ्फर नगर में शनिवार से शुरु हूइ रामकथा का रविवार दूसरे दिन में प्रवेश हुआ।
आरंभ में भागवत जी के मधुर श्लोक से हररोज कथा का मंगल आरंभ होता है।शुक तीर्थ की बहुत महिमावंत भूमि को प्रणाम करते हुए बापू ने कहा पतित पावनी भागीरथी गंगा,जिस भूमि पर भागीरथी और भागवत का मिलन हुआ।एक में पानी प्रवाहित है,एक में शुक की बानी प्रवाहित है। ऐसे संगम पर उपनिषद में शुकदेव जी महाराज की जो अवधूति थी है वह कैसी है?वोसमझने के लिए
निर्वाण उपनिषद का श्लोक है:
गगनसिद्धान्तःअमृतकल्लोलनदी।
अक्षयं *निरञ्जनम्। निःसंशयरिषिः।
निर्वाणो देवता।निष्कुलप्रवृत्तिः।
निष्केवलज्ञानम्। ऊर्ध्वाम्नायः।”
(अर्थ:उनका सिद्धांत आकाश के समान निर्लेप होता है,उनकी नदी अमृत की तरंगों वाली (आत्म-आनंद) होती है।वे अक्षय (कभी न नष्ट होने वाले) और निरंजन (दोष रहित) हैं।वे संशय-शून्य ऋषि हैं और निर्वाण ही उनकी इष्टदेवता है।)
उपनिषद में परमहंसों की पहचान के लिए कुछ मंत्र आते हैं।इनमें से यह मंत्र शुकदेव जी की पहली नजर की पहचान करा देती है।
वह गगन सिद्धांत शुक की अवधूति संकीर्ण नहीं आकाश की तरह विस्तरीत है।असीम है,सीमा में आबध्ध नहीं।शुकदेव जी तो युगों पहले की कथा है हमें तो भागवत जी में ज्यादा दर्शन हुआ है।लेकिन भीष्म बाणशैया पर थे और सब प्रश्न करने गए थे तब वहां शुकदेव जी भी खड़े हैं।।काश! ऐसे शुक की झलक मिल जाए!
गोपीगीत का एक श्लोक
प्रहसितं प्रियं प्रेम वीक्षणं विहरणं च ते-
आपको याद होगा।गोपी कहती है: हे कृष्ण! हे परम प्रिय! तुम्हारा हमारे सामने देखकर हंसना हमें वहां पहुंचा देता है।कोई भी साधुपुरुष,बुद्धपुरुष का मुस्कुराना ऐसा है।।आपका हमारे सामने प्रेम से देखना और आपका चल देना यही हमारा मंगल करने वाला ध्यान है।।
गोपियां बैठे कृष्ण या विराट कृष्ण का ध्यान नहीं करती,विहार करते कृष्ण का ध्यान करती है।
बापू ने बताया कि किसी ने पूछा है कि आपके दादा गुरु संस्कृत भाषा जानते थे कि नहीं?बापू ने कहा विश्वास से कहूंगा की समाधि भाषा-संस्कृत मेरे त्रिभुवन दादा को जानती थी।।
एक होती है आधि भाषा(शॉर्टहैंड लैंग्वेज),जो भरत की भाषा है।एक है उपाधि भाषा(वाल्मीकि ने क्रौंच वध देखा तो निकली)।साधु की व्यग्रता से निकली हुई उपाधि भाषा।।तीसरी व्याधि भाषा(बीमारी में से निकलती हुई भाषा), लेकिन सर्वश्रेष्ठ भाषा संस्कृत, देवगिरा है।संस्कृत भाषा नहीं,गिरा है,वाणी है, समाधि भाषा है।।
मेरे दादा संस्कृत जानते,नहीं जानते इनमें नहीं जाना लेकिन समाधि भाषा संस्कृत मेरे दादा को जानती थी।।
समाधि भाषा में कोई ग्रंथ आता है तब जानने वाले अर्थ करते हैं।।लेकिन संस्कृत जिन साधु को जानती है वह जो अर्थ करेगा वह विशिष्ट और बिलग होगा कबीर साहब का एक छोटा सा उलटी बानी है:
कबीर साहब की उलटी बानी।
बरसे कंबल भीगे पानी!
इसका अर्थ निकालने के लिए संहिता की जरूरत होगी।शास्त्र का अर्थ करने के लिए एक नया शास्त्र चाहिए,मैं उसे साधुसंहिता कहता हूं।।
साधु सब का बाप है,साधु का कोई बाप नहीं।
यहां अर्थ निकाले-कम(जल),बल(बल) यस्य तत्र कंबलं-मतलब दगजल-आंख का पानी,इतने आंसू गिरे की भीगे पानि(हाथ)।
यह गोपीभाव है।यह साधुसंहिता है।।संस्कृत त्रिभुवन दादा को जानती थी।।
कबीर मशाल लेकर चलते थे।मुझे भी मानस मशाल पर बोलना है और हो सके तो काशी में बोलना है।। कबीर साहब पर बोलने का बहुत मन है।।
यह काल शास्त्रार्थ करने का नहीं,शास्त्र का सार समझ कर एक जगह बैठ जाने का है।।
एक ही बुद्धपुरुष में हरेक रंग होते हैं।।काला रंग उदासीनता का प्रतीक है।लाल रंग प्रेम का प्रतीक, हरा रंग साधु का प्रतीक है।।
शुकदेव तोता क्यों है?शुक का रंग हरा होता है।गला-कंठ उदासीनता का और लाल चौंच प्रेम की बोली बोलती है।।
ततक्षण जो साधुसंग करता है उसे तक्षक कुछ नहीं कर सकता।।
साधु की पंगत नहीं,संगत होती है।साधु का कोई कुल नहीं होता,साधु कुल(टोटल) और कूल(ठंडा) होता है।।साधु का कोई धर्म नहीं,साधु का मर्म होता है।।साधु का कोई परिजन नहीं,सब प्रियजन है।।
सीताराम जी की वंदना को गा कर आज की कथा को विराम दिया गया।।

