
दूसरे दिन की कथा के बाद परीक्षित ने कहा सीमित काल में,सीमित साधनों से लक्ष्य को पा लेना वह मेरा अनुभव है।
समय बहुत सीमित है और एकमात्र साधन-श्रवण है।।
मुजे आपके दिल तक पहुंचना है,उसे कामना मत समझना,कृपा समझना।।
कृष्ण जो कहता है वह सत्य है और कृष्ण स्वयं परम सत्य है।।
राम कहे वो सत्य,राम स्वयं परम सत्य है।।
शिव कहे वह सत्य और शिव स्वयं परम सत्य है।। ध्यान सत्य है,समाधि परम सत्य है।।
सातवें दिन परीक्षित ने कहा:परम सत्य की प्राप्ति हुई।।
परीक्षित वो है जो निर्णय करता है की जन्म से ही मृत्यु की यात्रा शुरू हो जाती है।।
जैसे हम कथा सुनते हैं तो हमारी भीतरी गति शुरू हो जाती है।।
भगवत कथा सुनते-सुनते यह अश्रु आ जाये तो समझाना हमारा श्रवण फल दे रहा है।।
जो धर्म विज्ञान की आलोचना करें वह धर्म पंगु है।
जिस ग्रंथ में वैज्ञानिक बात है वह सदग्रंथ है।।
परम पवित्र भागीरथि और भागवती गंगा की भूमि शुक्रताल पर चल रही रामकथा बुधवार जब पांचवें दिन में प्रवेश कर रही है तब अवधूत शिरोमणि परमहंस शुकदेव जी को प्रणाम करते हुए बापू ने कहा परीक्षित को इस गंगा के तट पर उनकी गति का उर्ध्व गमन हुआ है उस पर हम ध्यान खींचे। परमहंस शुकदेव जी के चरणों में बैठा है।परीक्षित जानता है कि मुझे पहले ही मार दिया गया है,उत्तरा के गर्भ में,कृष्ण ने जीवित किया था।मरे हुए को कौन मारेगा! परीक्षित वह है जो परमात्मा को चारों ओर से देखता है। हर एंगल से परमात्मा की खोज करता है।।ऐसी चेतन जो निर्णय करता है की जन्म से ही मृत्यु की यात्रा शुरू हो जाती है।जन्म वाला मृत्यु भी विक्षिप्त न कर पाया तक्षक वाली मौत विक्षिप्त कैसे करेगी!
उसे बुढ़ापा नहीं आया।वैसे परीक्षित की उम्र का पता नहीं है।लेकिन परीक्षित को गीता वाली ‘जरा’ भी स्पर्श नहीं कर पाई।।महाभारत कहता है सहदेव और नकुल का जो स्मरण करेगा उसे रोग स्पर्श नहीं कर पाएगा ऐसा लिखा है।।श्री कृष्ण आदि मध्य है तो व्याधि भी नहीं आयी।
एक-एक दिन की एक-एक घटना घटी है।पहले दिन परीक्षित के गुण का विकास होने लगा। सदगुण में वृद्धि हुई।जैसे हम कथा सुनते हैं तो हमारी भीतरी गति शुरू हो जाती है।।
लेकिन शास्त्र में गुण भी बंधन है तो बंधन मजबूत हुआ।।गुण वर्धन इतनी टोच तक गया जैसे यज्ञ की लौ धीरे-धीरे बढ़कर विलीन हो जाती है।।पहले दिन की कथा के बाद परीक्षित गुणातित हो गया।।दूसरे दिन की कथा में शुकदेव जी कहते हैं राजन! दूसरे दिन की कथा का अनुभव क्या है? परीक्षित ने कहा सीमित काल में,सीमित साधनों से लक्ष्य को पा लेना वह मेरा अनुभव है। समय बहुत सीमित है और एकमात्र साधन-श्रवण है।।
बस वही इंतहां में पास हुए।
जो तेरे आस-पास बैठे थे।
हम तेरे गम के पास बैठे थे।
इसलिए दूसरे गम उदास बैठे थे!
दोस्तों ने हंसा दिया जाकर।
अच्छे खासे उदास बैठे थे!
जैसे श्रवण,कीर्तन,विष्णु स्मरण,पाद सेवनम,अर्चन, वंदन,दास्य,सख्य और आत्म निवेदन।। विभीषण में श्रवण से शुरू हुई यात्रा आगे बढ़ती है।।दीवारों पर राम-राम और रामायुध है वह विभीषण का कीर्तन है पास बैठा है और पाद सेवन है।।वैसे श्रवण से यात्रा शुरू होती है श्रवण सगर्भा है और उसे आठ प्रकार की प्राप्ति होती है।। बार-बार सुनिए तब घटना घटेगी।।
तीसरे दिन की कथा सुनकर सेवा का भाव आया। चौथे दिन की कथा के बाद कहा कि जीवन की प्रत्येक इंद्रियों में संयम आ गया है।। साधक की तीन दशा जैसे अंतर्मुख दशा जो चैतन्य,गोपीजन और शुकदेव जी में वह दिखाई दे रही है।।तब दसों दिशा में खो जाती है और अश्रुपात,व्याकुलता,बिरहाग्नि, स्तंभित दशा,पुकार,मूर्छा,बेहोशी,मृत्यु तक की दशा अर्ध बाह्य अवस्था आती है।
पांचवें दिन की कथा के बाद अहिंसा प्राप्त हुई है। इतनी अहिंसा आ गई कि अब तक्षक भी मुझे क्या मारेगा! छठे दिन की फलश्रुति अश्रु है।।भगवत कथा सुनते-सुनते यह भाव जागे तो समझाना हमारा श्रवण फल दे रहा है।।सातवें दिन शुकदेव जी कथा कह कर निकल जाते हैं और कहते हैं कि मैं जहां तक रहूंगा तक्षक नहीं आ पाएगा।। तक्षक आता है वह घटना घटती है।।जब तक तक्षक रूपी मृत्यु नहीं आएगा,अनुभव है सातवें दिन का परीक्षित ने कहा परम सत्य की प्राप्ति हुई।।सत्यम परम धीमहि।। बापू ने कहा मेरा बैकुंठ मेरी व्यास गादी ही है।मुजे आपके दिल तक पहुंचना है उसे कामना मत समझना,कृपा समझना।।
कृष्ण जो कहता है वह सत्य है और कृष्ण स्वयं परम सत्य है।।राम कहे वो सत्य,राम स्वयं परम सत्य है।। शिव कहे वह सत्य और शिव स्वयं परम सत्य है।। ध्यान सत्य है,समाधि परम सत्य है।।
कहा गया में उसका ध्यान करता हूं वो परम सत्य का ध्यान है।।
ब्रह्म सुख पांच प्रकार के बताए गए। एक ही नाम प्रसाद से ब्रह्मसुख। वैसे ब्रह्म एक ही है लेकिन बिलग बिलग कोने से दर्शन करते हैं। कोई दाइं और से कोई बांइ और से,कोई सामने से देखा है तो ब्रह्म अलग दिखाई देता है।।वैसे परमात्मा का नाम,लीला रूप और धाम यह चारों वस्तु भागवत कथा है।।ब्रह्म एक है,अविभाज्य है,अखंड है,समझने के लिए विभाग किया।।तो एक है अन्नंब्रहमेतिव्यजानात अन्य ही ब्रह्म है।।दूसरों को खिलाने की इच्छा ब्रह्म सुख है।। उपनिषद का दूसरा ब्रह्म प्राणों ब्रह्मेतिव्यजानात। अन्न आधारित प्राण किसी भी प्राणी को उद्वेग ना करना वह ब्रह्म सुख है।।तीसरा ब्रह्म मनोब्रह्मेतिव्यजानात्। मन को ब्रह्म कहा है।। हम पूरी जिंदगी मन से तकरार करते रहते हैं।और ऐसे पद भी मिलते हैं कि मन रूपी मृगले को मारो! लेकिन मन रूपी मृग को समझो।। म को जो करना है करने दो,एक दिन थक जाएगा हम साक्षी बन जाए।।ओशो कहते हैं मन को जहां जाने से रोकते हैं वहां सबसे पहले जाता है।।विज्ञान ब्रह्म है।। जो धर्म विज्ञान की आलोचना करें वह धर्म पंगु है।।जिस ग्रंथ में वैज्ञानिक बात है वह सदग्रंथ है।।आनंदोब्रह्मेतिव्यजानात्।आनंद ब्रह्म है। यह सब प्रसाद नाम प्रसाद से प्राप्त होता है।।
अयोध्या में राम जन्म के बाद एक महीने का दिन हुआ।।चारों भाइयों का नामकरण करने के बाद आज की कथा को विराम दिया गया तब बापू ने कहा कि चारों भाइयों राम के ही रूप है। चारों में ‘र’ कार और ‘म’ कार दिखते हैं।।

