
जिसमें कृष्ण का प्रभाव,राम का स्वभाव, महादेव का सद्भाव, काम का अभाव और नाम का निभाव दिखे वहां भरोसा रख देना चाहिए, क्योंकि यह बुद्धपुरुष का लक्षण है।।
धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्ष शास्त्र रस से भरा होना चाहिये।।
चारों शास्त्र में प्रेमरस भर दे उस शास्त्र का नाम रामायण है।।
मंथन का मतलब स्वाध्याय,अध्ययन दूसरों को सुनना है।।
संगीत का रियाझ भी मंथन है।।
भगवद कथा सब की प्राण प्रतिष्ठा कर देती है।।
वाल्मीकि आश्रम रामायण तीर्थ और मेरा तलगाजरडा मेरा त्रिभुवन तीर्थ है।।
किल्लारी की धन्य धरा पर चल रहा रामकथा गान शुक्रवार को सातवें दिन पर पहुंचा तब बताया कि धर्मशास्त्र रस से भरा होना चाहिए।अर्थशास्त्र में भी रस होना चाहिए।।अर्थ की तीन गति:दान भोग और नाश है।।
पांडुरंग दादा कहते थे धन तीन वस्तु से आता है:मिलता हुआ,किसी से मिला हुआ वारिस का, कमाया हुआ और किसी ने भेजा हुआ।।लक्ष्मी समुद्र मंथन से ही मिलती है।कथा करने में भी बहुत मंथन करना पड़ता है,डूबा रहना पड़ता है।। मंथन का मतलब स्वाध्याय,अध्ययन दूसरों को सुनना और संगीत का रियाज भी मंथन है।।
यह मंथन रूपी पात्र के तलों में यदि जहर है तो निकल जाएगा।
शास्त्र प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए नहीं अपनी निष्ठा को पुष्ट करने के लिए है।चैतन्यमहाप्रभु जी कहते थे प्रतिष्ठा सुकरीविष्टा है।
अर्थ में प्रेम होना चाहिए। कामशास्त्र में प्रेम ना हो तो केवल विलास ही रह जाता है।मोक्ष भी रुखा सुखा नहीं रस युक्त होना चाहिए।चारों शास्त्रों में रस जगे वह प्रेम है और प्रेम जगाये वो रामायण है। भगवद कथा सब की प्राण प्रतिष्ठा कर देती है। यह प्रेम शास्त्र है।
भगवान कृष्ण भागवत के दशम स्कंध में रुक्मणी की सैया पर बैठे हैं तब संवाद चलता है। कहते हैं अपहरण किया है।लेकिन वही बात कुमारसंभव में शिव पार्वती से भी कहते हैं।
कृष्ण कहते हैं इसके साथ विवाह करने का कोई फायदा नहीं।लेकिन समाज के शिशुपालों,दंतवक्रों, साल्वों और जरासंधो को को दिखाने के लिए यह किया है। मेरे साथ ब्याह करने का क्या फायदा? में पराक्रमी नहीं हूं।पराक्रमी होता तो सामने से आक्रमण करता। में समंदर के नीचे बेट द्वारिका में छिपा हूं। मेरे पास कोई वैभव नहीं।।मैं तेरे वश में नहीं आने वाला ट।
जो पुरुष पत्नी के वश होता है वह गध्धा,बिल्ली या कुत्ता बन जाता है उसे नौकर की तरह रहना पड़ता है। लेकिन रुक्ष्मणि कहती है कि आप द्वारिका के दरिया में नहीं छीपे लेकिन सोने की द्वारिका को अपने डूबा दी है।।आप उल्टा चलने वाले बोलते हैं लेकिन दुनिया से अलग आपका रास्ता है।।
बापू ने कहा कि ६८ तीर्थ की बात होती है तब मुझे जो याद है जहां,
मानसरोवर मानस तीर्थ,कैलाश गौरीशंकर तीर्थ। अयोध्या सत्य तीर्थ,वृंदावन प्रेम तीर्थ,काशी करुणा तीर्थ,जगन्नाथ पुरी जगदीश तीर्थ,द्वारिका शारदा तीर्थ,बद्रीनाथ नर-नारायण तीर्थ,रामेश्वर सेतु बंध तीर्थ,चित्रकूट ब्याह तीर्थ,गंगा भक्ति का तीर्थ, सरस्वती ब्रह्म विद्या का तीर्थ,यमुना कर्म तीर्थ, प्रयाग संगम का तीर्थ,पुष्कर राज राजवी तीर्थ, कालडीश्रृृंगेरी शंकर तीर्थ,वाल्मीकि आश्रम रामायण तीर्थ और मेरा तलगाजरडा मेरा त्रिभुवन तीर्थ है।।
राम को वाल्मीकि का आश्रम अच्छा लगा। वहां पर्वत,जल और वन देखे।तीनों के तीन-तीन लक्षण है पर्वत ऊंचाई अचलता और अस्मिता देता है।।जल मधुरता,शीतलता और स्वच्छता प्रदान करता है। वन के तीन लक्षण सघनता-गहन,आहार और प्राणवायु प्रदान करता है। साधु वृक्ष है,सरिता है,पर्वत है,
राम तो सब जगह है लेकिन बैराग्य और भक्ति सर्वत्र नहीं।
वाल्मीकि ने १४ स्थान बताएं। जिन के श्रवण समुद्र के समान हो,जिनकी दृष्टि चातक जैसी हो जिनकी घ्राणेद्रिय को परमात्मा की खुशबू आती हो।।
बापू ने बताया कि जिसमें कृष्ण का प्रभाव,राम का स्वभाव,महादेव का सद्भाव,काम का अभाव और नाम का निभाव दिखे वहां भरोसा रख देना चाहिए क्योंकि यह बुद्धपुरुष का लक्षण है।।
भूसुंडी के न्याय से राम चित्रकूट में आते हैं वहां तक की कथा ले जाकर आज की कथा को विराम दिया गया।।
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