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राम मानस का पूर्वार्ध है, कृष्णा मध्य भाग में और करुणा उत्तरार्ध है।

विस्मृति परमात्मा का वरदान है,कृष्णस्मृति भी परम वरदान है।।

आकाश के नीचे सोने से उदारता आती है।।

लव-कुश कथा करते हैं तो ऐसा लगता है की छोटी-छोटी ज्योतियां सूर्य की आरती उतारती है।

कथा है सार्वजनिक,लेकिन व्यक्तिगत बनाकर सुनो।।

किल्लारी की भूमि से बिलकूल सादगी से राम जन्मोत्सव का हुआ गान।

लातुर के पास किल्लारी से बह रही रामकथा धारा में गुरुवार छठ्ठे दिन महाराष्ट्र के सभी स्थानों की चेतनाओं और साधु संतो को वंदन करते हुए बताया की कथा बार-बार पढ़ने से भी याद नहीं रहता! कुछ याद रखने की जरूरत नहीं,केवल हरिनाम याद रखो राम मानस का पूर्वार्ध है,कृष्ण मध्य भाग में और करुणा उत्तरार्ध है।यही तो रामकृष्णहरि,सत्य,प्रेम और करुणा है।।

रूमी का एक वाक्य है:व्हेनेवर यू अरे अलोन, रिमांइड योरसेल्फ,धेट गोड हेझ सेन्ड एवरीवन एल्स अ वे,सो धेट धेर इझ ओन्ली यू एन्ड हीम

(जब आप अकेले हो जाओ यह समझो कि परमात्मा ने सभी को अलग कर दिया ताकि आप और परमात्मा दो ही रह सको)

विस्मृति परमात्मा का वरदान है और कृष्णस्मृति भी परम वरदान है।।

रामचंद्र भगवान की जय के बदले प्रिय क्यों बुलाते हैं?बार-बार मैंने कहा है,राम सत्य तो है ही,मुझे प्रिय भी लगे।सत्य का जय होता है। जय बोलने से राम सत्य हो गए।यदि राम प्रेम है तो प्रिय है और सब का श्रेय है।।

कवितावली का दो पद वाल्मीकि के आश्रम का परिचय देते हैं।। जहां ८९ और १३८ दो पद है।बापू ने कहा कि साधक को संभव हो आकाश के नीचे सोना चाहिए और सप्तर्षि को देखा करो।एक-एक ऋषि का चिंतन उतरता है।।यह सब प्रयोग और अनुभव है।।आकाश के नीचे सोने से उदारता आती है।।

वाल्मीकि आश्रम की विशेषता में सप्तर्षि को देखकर मरा मरा बोल रहे हैं।मां जानकी जी का निवास है इसलिए भी यह भूमि विशेष है।जहां मॉं होती है वही घर है।लव कुश का जन्म हुआ। इस भूमि को छूने से शरीर का संताप चला जाएगा।यहां सीतावट है उनका दर्शन करने से पाप नाश हो जाएंगे।जानकी जी ने जहां चरण पड़े हैं-यह आश्रम की विशेषता है।।

बापू ने कहा कि चरण का दर्शन,चरण का वंदन, चरण स्पर्श,चरण रज,चरण पक्षालन,चरणामृत, चरण पूजा और चरण पादुका-यह चरणाष्टक रामचरितमानस का है।।

यहां सब अच्छे गाते हैं,कोई भी द्वेष नहीं और ऐसा ही स्वभाव तरक्की की तरफ ले जाएगा।

कवितावली में कुछ विशेष दर्शन वाल्मीकि का हमने किया।

अयोध्या में भगवान राम अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं सरस्वती दत्त दो विणा दो भाइयों को देकर सूचना दी: केवल कथा ही कहना,किसी के घर ठहरता नहीं किसी के घर कथा नहीं करना, लेकिन सार्वजनिक कथा करना।।लव-कुश कथा करते हैं तो ऐसा लगता है की छोटी-छोटी ज्योतियां सूर्य की आरती उतारती है।।कथा है सार्वजनिक लेकिन व्यक्तिगत बनाकर सुनो।।

अवध वासी कुछ दे तो लेना मत! आग्या गुरु से मिली और आशीर्वाद मॉं ने दिया।।सीता जी ने कहा राज्य देवता,कुल देवता,ग्राम देवता,वन देवता और सूर्य देवता को मैं तुम्हारी जिम्मेदारी सौंप रही हूं। अयोध्या में आए।।शारदीय विणा हाथ में लेकर कथा गली-गली गान हो रही है और केवल सीता चरित्र का गान करते हैं।।

वाल्मीकि की यहां तीन चार गीनती है:बच्चे जाए और गायें अवध वासियों ने सीता पर जो कलंक लगाया था वह कथा गान से मिटे।

पूरा जनमत राम के विरुद्ध चला गया था यह जनमत प्रायश्चित करें।जनमत परिवर्तन हो जाए। इसके पीछे फिर जानकी अयोध्या की साम्राग्नी  बने झुंड के झुंड सुन रहे हैं।

कोई परिचय नहीं फिर भी दिल खींचता है तो समझना जन्म जन्म का परिचय है।कालिदास कहते हैं अकारण क्रोध आ जाए,किसी को देखकर तो समझना किसी जन्म का द्वेष है।।जन-जन के हृदय में यह बालक अपने पिता की ओर माता की स्थापना कर रहे हैं।।

बसती बसतीपर्वत पर्वत गाता जाए बंजारा,लेकर दिल का इक तारा!

भगवान राम अपने महल प्रसाद में खड़े थे वह भी सुन रहे थे।उन्हें लगा मुझे इतना आकर्षण क्यों हो रहा है! लक्ष्मण और भरत को बुलाकर कहा कि यह दोनों बालक को बुलाओ। दोनों ने आश्रम के ऋषि कुमारों को प्रणाम करते हुए कहा की राजाधिराज बुला रहे हैं।।तीव्रता कुश की होती है लेकिन यहां लव तेज है।।पूछते हैं आप कौन हो? हमारे गुरु ने मना किया है,किसी के घर में कथा मत करना।।राम जी ने कहा कथा मत करो लेकिन घर तो आओ! राम ने उसका पूजन किया अच्छे स्थान पर बिठाया और कहा कि मेरे नगर ने आपकी कथा सुनी है मैं भी थोड़ा सुन तो कुछ दूं।चांदी की थाल में १८ हजार स्वर्ण मुद्रिका दे रहे हैं तब कहा कि हमारे गुरु ने मना किया है,आप किसी की सेवा में लगा देना!! फिर कहा कि आप यज्ञ पूर्णाहूति में आना और यज्ञ में गए तो दोनों ने देखा सीता जी की सुवर्ण की मूर्ति है।।हमारी मां की मूर्ति क्यों?लेकिन फिर कहा कि मां के समान होगी।।बच्चे क्या जाने यह सीता जैसी नहीं,सीता ही है!

जब राम को कहा गया कि आप दूसरी बार विवाह करो तब राम ने कहा कि राजा राम ने रानी सीता का त्याग किया है,लेकिन राम ने जानकी का त्याग नहीं किया है,यज्ञ रुक सकता है तो कोई बात नहीं लेकिन पुनःविवाह नहीं करूंगा।।बाद में स्वर्ण की मूर्ति रखी गई।।

सबको लगता है इसके साथ हमारा नाता है।जनमत बदला।लोगों के आंसू में जानकी पर संशय का पाप था वह बह गया।।रामकथा क्या नहीं कर सकती? मानसिकता,अपराध,कलंक को धो देती है।। राम के यज्ञ विश्राम के कुछ दिन गायन होता रहा।।

फिर क्या हुआ?वह हम कल कहेंगे…

कथा प्रवाह में रामकथा को सरोवर की उपमा दी गई।चार घाट और फिर बापू ने कहा की कथा सुनो तो भूतों को लेकर,पंच महाभूत को लेकर सुनो। जल तत्व हमारी आंख से निकले,अग्नि तत्व जिज्ञासा के रूप में,आकाश की तरह खाली होकर सुनो,वायु तत्व हनुमान जी की उपस्थिति है ऐसा अनुभव मानकर और धरती से जुड़े रहकर सुनो।। जानकी की उपासना से राग-द्वेष,अविद्या,माया, अस्मिता,अभिनिवेश मिट जाते हैं।भूत प्रेत भाग जाते हैं।।संघर्ष हमेशा आसुरी तत्वों को ही प्रकट करता है।।रावण के प्रागट्य के बाद राम जन्म के पांच कारण की संक्षिप्त में बात करके अयोध्या में श्रृंगी ऋषि के द्वारा यज्ञ हुआ।।यज्ञ में से प्रसाद पा कार सभी रानियां को खिलाये गए और कौशल्या की गोद में परम तत्व ने अवतरण किया और रामनवमी में अयोध्या में भगवान राम का जन्म होता है।।वह जन्म का गान करके किल्लारी की भूमि से पूरे त्रिभुवन को राम जन्म की बधाई देते हुए आज की कथा को विराम दिया गया।।

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