
तर्क-विचार करने का अधिकार,विशेषण मुक्त, शास्त्र संमत और विज्ञान को लेकर चलना-सनातन के चार स्तंभ है।।
आंसू की व्यवस्था जिसके पास होती है,यह पहले प्रमाण नहीं मांगेगा,प्रणाम करेगा।।
जिसकी आंख निर्धन नहीं,सधन होगी।।
कृपा जब द्रवीभूत होती है,तो करुणा होती है।।
साधु का धन्यवाद होना चाहिए जय-जय कार नहीं
मानस बधाई को नहीं,भलाई को महत्व देता है
बलवान की बधाई और भलवान की भलाई होती है
साधु का जय नहीं धन्य की जरूरत है,इसलिए धन्यवाद से भी ऊंचा शब्द साधुवाद आया।।
साधु के लिए धन्य ब्रह्म के लिए जय है।।
अंतरयात्रा-भीतरी यात्रा में तीन का महत्व है:तन शुध्धि,मन शुध्धि और भाव शुध्धि।।
बहिर यात्रा परिग्रही अंतर यात्रा अपरिग्रही होती है
वस्तु,वसु और विचारों का भी परिग्रह नहीं।
बहिर यात्रा में पूजन अर्चन होता है,अंतर यात्रा में भजन होता है।।
हर मुखरता बहिर यात्रा है,मौन अंतर यात्रा है।
साधन संपन्न होना बहिर यात्रा है,साधना संपन्न होना अंतर यात्रा है।
‘पद’ यात्रा बहिर यात्रा है,सद यात्रा अंतर यात्रा है
हरी-भरी चाय की वादियों से आच्छादित केन्या के सुंदर नगर केरिचो जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांति और सौम्यता के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है वहां मोरारी बापू की रामकथा का चतुर्थ दिवस,बापू ने अपने सहज,सरल और करुणामय वचनों से कथा
आरंभ करते हुए कहां की वो दृश्य की कल्पना करें वह आलोचक लोचन से नहीं अपलक लोचन से देखें।कोई भी घटना दृश्य को दो दृष्टि से देखा जा सकता है:विचारकों की दृष्टि होती है।।और सनातन धर्म की व्याख्या में चार स्तंभ है:पहला स्तंभ है तर्क, विचार करने का अधिकार,विशेषण मुक्त-शास्त्र संमत और विज्ञान को लेकर सनातन चलता है।। किसी को भी अपना मत,तर्क की छूट है।।यहां दृष्ट तर्क की मना है,इष्ट तर्क की मना नहीं।।हम आलोचक लोचन से देखते हैं।।एक दृष्टि अपलक लोचन है।।सतत प्रतिक्षा और आप अलग-अलग लोचन से कुरुक्षेत्र का रथ या कोई भी रथ हो।।
डॉक्टर राधाकृष्णन ने गीता भाष्य विचारक की दृष्टि से,तर्क की कसौटी पर कस के देखा है।।
भक्त सुह्रद होता है,आंसू की व्यवस्था जिसके पास होती है,यह पहले प्रमाण नहीं मांगेगा,प्रणाम करेगा जिसकी आंख निर्धन नहीं,सधन होगी।।रुक्मणी का विनय महाभारत में वह पद आया वहां अपलक लोचन और पलकों को गुजराती में पांपण कहते हैं यह पलकें कृष्ण दर्शन में पापिनी(पापण)-बाधा बनती है।।
कृपा और करुणा में अंतर है।।कृपा जब द्रवीभूत होती है द्रावण बनती है तो करुणा होती है।।हम जब पढ़ाई करते थे कठोर कृपा नाम का एक पाठ पढ़ने में आता था।।कृपा कठोर भी हो सकती है। करुणा में लेनदेन नहीं होती,आंखों की लेनदेन होती है।।कृपा बुद्धि से चलती है।हमारी स्थिति नहीं की कृपा की कठोरता हम सह पाये।।
मानस का दर्शन करते-करते गुरु कृपा से अब ऐसा लगने लगा है यह अद्भुत मौलिक और अनटच सूत्र से भरा है।।रामचरितमानस में जय जय कार बहुत आता है लेकिन जय में रुचि नहीं।यह मौलिक रहस्य है गोस्वामी जी और मेरे बुद्धपुरुष को भी जय शब्द में रुचि नहीं थी।।साधु का धन्यवाद होना चाहिए जय जय कार नहीं।मानस बधाई को नहीं भलाई को महत्व देता है।बलवान की बधाई और भलवान की भलाई होती है। साधु का जय नहीं धन्य की जरूरत है,इसलिए धन्यवाद से भी ऊंचा शब्द साधुवाद आया।।साधु के लिए धन्य ब्रह्म के लिए जय। जिसमें जय होता है वो रथ दूसरा ही होता है।।
यहां अंतर यात्रा भीतरी यात्रा रथयात्रा में तीन बातों का महत्व है:शरीर शुद्धि जरूरी है।कीमती नहीं स्वच्छ वस्त्र जरूरी है।।मन की शुद्धि जरूरी है। मन अचल और निर्मल होना चाहिए।।यह भाथा-त्राण को कटी भाग पर कस के बंधना पड़ता है।मन भी अचल मजबूत होना चाहिए,सतेज होना चाहिए। भाव शुद्ध होनी चाहिए।।स्वामी रामतीर्थ की डायरी में यात्रा के आठ लक्षण लिखे हैं।मेरी दृष्टि में वो यात्राष्टक है।।स्वामी रामदेव पूर्ण सिंह सरदार को कहते हैं बहिर यात्रा भीड़ में,अंतर यात्रा अकेला करनी पड़ती है।बहिर यात्रा परिग्रही अंतर यात्रा
अपरिग्रही होती है।वस्तु,वसु और विचारों का भी परिग्रह नहीं।बहिर यात्रा में पूजन अर्चन होता है अंतर यात्रा में भजन होता है।।
भजन करते समय आहार पर बहुत ध्यान रखना चाहिए।सनातन धर्म भोजन के लिए कहता है जो बल की वृद्धि करें,आयुष्य की वृद्धि करें,रूप की कांति बढ़ाये और बुद्धि की शुद्धि करें ऐसा धर्म शास्त्र सम्मत आहार जो हम इष्ट देव को भोग लगा सके ऐसा आहार लेना चाहिए।।
हर मुखरता बहिर यात्रा है,मौन अंतर यात्रा है।साधन संपन्न होना बहिर यात्रा है,साधना संपन्न होना अंतर यात्रा है।’पद’ यात्रा बहिर यात्रा है,सद यात्रा अंतर यात्रा है।।ध्वज एक है पताका अनेक होती है इसलिए सत्य एक और शील अनेक है।।
फिर कथा प्रवाह में सती भल अवसर देखकर शंभू के पास जाकर अपना संकल्प प्रकट करती है और राम तत्व के बारे में पूछती है।राम ने अवतार क्यों लिया?उनके कारण भी पूछती है और शिवजी राम जन्म,राम प्रागट्य के पांच कारण की बात बताते हैं।।
== समाप्त ==

