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ञुषी पंचमी, गणेशोत्सव, पर्वाधिराज संवत्सरी के पावन दिनों में अग्रवन-आग्रा में हुआ रामकथा का मंगल आरंभ।।

निरंतर मौन साधना द्वारा विश्व को भजन की गहराई में ले जाए उसे मुनि कहते हैं।।

निरंतर वाणी से जगत को जागृत करें उसे ऋषि कहते हैं।।

भ्रम होना साधु का पराजय है।।

रामचरितमानस त्रिभुवनीय वैश्विक सदग्रंथ है।।

रामचरितमानस के नभमंडल में भी सात ऋषि है।

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एक बार त्रेता जुग माहीं।

संभु गए कुंभज रिषि पाहीं।।

रिषि पूछी हरिभगति सुहाई।

कही संभु अधिकारी पाई॥

-बालॉंड चौपाइ-४७.१

जासु कथा कुंभज ऋषि गाई।

भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई।।

-उत्तरकॉंड

इन बीज पंक्तियों का गान करते हुए मंगलवार शाम को ब्रजमंडल के सभी वनों में अग्र ऐसे अग्रवन आग्रा से रामकथा का आरंभ करते हुए बापु ने कहा की २३ साल पहले हम यहां आए थे।परमात्मा की असीम कृपा से इस ऐतिहासिक नगरी में रामकथा सेवा का अवसर मिल रहा है।उस वक्त ‘मानस तेज महल’ विषय पर संवाद हुआ था।।जग प्रसिद्ध ताजमहल और आंतरिक तेज महल की खोज की बातें हुई थी।।

बीच में बार-बार आग्रह आता रहा कि आग्रा में कथा मिले।यह मनोरथी ललित बार-बार विनय करता रहा बापु ने बताया,मेरी समझ में कथा के आयोजन का मनोहथी के रूप में ललित अधिकारी है क्योंकि कभी कथा भाग्य के कारण मिल जाती है,अधिकारी ना भी हो तो भी! यह सालों का अनुभव है।

कथा में बहुत कुछ हर प्रकार से करना पड़ता है। लेकिन ललित कहता रहा आप चिंता ना करें। ललित भाई की ‘करुणा निधान’ संस्था से जुड़े बहुत सहयोगी और यहां का गुजराती समाज भी जुड़ा और कहीं रिश्तेदार मित्र सभी ने मिलकर इस प्रेम यज्ञ में अपनी आहुतियां डाली है।।

बापु ने कहा आग्रा का मूल नाम तो अग्रवन है यह वृंदावन की ब्रज मंडल की भूमि है।जितने वन है कालांतर में इसी दायरे में यह अग्रवन भी ब्रजभूमि का हिस्सा था।बापु ने कहा इस आध्यात्मिक और ऐतिहासिक अनुराग की भूमि पर कथा गाने का अवसर मिला।इस परिवार का रामचरितमानस के प्रति लगाव भी इस कथा का कारण है।

ललित भाई और पूरी टीम को बापु ने बहुत साधुवाद दिया।।

बापु ने बताया योग ऐसा है गणेश उत्सव के दिन कथा शुरू हुई,आज संवत्सरी का दिन और सभी योगों के बीच में ऋषि पंचमी का दिन।ऋषियों के स्मरण का और मुनियों की वंदना के यह दिन है।। इसलिए सहज यह विषय उठाया गया और इसीलिए ऋषि शब्द वाली पंक्तियां उठाई।।

ऋषि शब्द तुलना में कम,६०-६५ बार आसपास यह शब्द मिलता है।।मुनि शब्द बहुत है।शायद गोस्वामी जी की आंतरिक प्रवृत्ति मुनि शब्द के प्रति झुकी है। यद्यपि यह दोनों एक है।।

सालों पहले बेंगलुरु में ‘मानस सप्त ऋषि’ कथा हुई थी।मानस में सप्त ऋषि है।साधुओं से जो सुना है वह आपको सुनाते हैं।शंकर भी कहते हैं मैंने साधु से सुना!तो किसी साधु से सुना होगा?प्रमाण तो है कागभुशुंजि जैसे परम साधु और कुंभज ऋषि से सुना है।लेकिन अंतर से जवाब मिलता है शंकर भगवान को ब्रह्मा जी ने साधु कहा है।।शिव स्वयं साधु है,वह आंतरिक साधुता की प्रेरणा से सुनते हैं। आकाश के नमो मंडल में सात ऋषि है,सप्तर्षि और आठवां अरुंधति का तारा है।।हमारे रामचरितमानस के नभमंडल में जो सात ऋषि है वहां:वाल्मीकि, वशिष्ठ मुनि,विश्वामित्र,याज्ञवल्क्य,महर्षि भारद्वाज, कुंभज(अगस्त्य) महर्षि अत्रि।।

पहले एक वस्तु मन में दर्ज होनी चाहिए मानस किताब नहीं है।यह रघुवंश की वार्ता नहीं है।केवल शास्त्र या केवल धर्मग्रंथ भी नहीं है।रामचरितमानस त्रिभुवनीय वैश्विक सदग्रंथ है।।मानस को जान से भी ज्यादा संभालो! हर पंक्ति के पीछे बड़ा राम रहस्य छीपा है।।जब आप किसी भी पंक्ति का गायन करेंगे तो आपके आसपास उन्ही पंक्ति के देवता या तो जो संदर्भ लिया है वह घूमते रहेंगे।।यह मेरा अनुभव है,अनुभव है,अनुभव है।।

संगीत के घराने में बहुत ख्यात आग्रा घराना भी है। विषय की भूमिका के बाद यमुना महारानी को प्रणाम करते हुए और मानसिक स्नान करते हुए सभी को प्रणाम करते हुए बापु ने कहा निरंतर मौन साधना द्वारा विश्व को भजन की गहराई में ले जाए उसे मुनि कहते हैं।निरंतर वाणी से जगत को जागृत करें उसे ऋषि कहते हैं।।

वाणी से बोले या चुप रहे कौन श्रेष्ठ है?लेकिन कब बोलना और कब चुप रहना इतना विवेक जरूरी है। परम श्रोता के रूप में हनुमान जी कथा में उपस्थित रहते हैं।।

लंकाकांड के प्रसंग में इंद्रजीत से लक्ष्मण पराजित हुए।हनुमान जी पराजित हुए और भरत की भी पराजित हुए।जब लक्ष्मण गिरे तब संजीवनी बूटी खोजने के लिए हनुमान जी निकले और भरत जी ने बिना फने का बान लगाया,हनुमान जी गिरे।।तीन लोग इन प्रसंग में पराजित हुए हैं।

साधु की एक परिभाषा है यह है जिसको कभी,कहीं किसी पर संदेह न हो,संशय न हो,वहम ना हो और कभी भ्रम ना हो।।भ्रम होना साधु का पराजय है।।  तुलसी जी ने तीनों का पराजय का कैसा समाधान दिया इसलिए भी एक ग्रंथ की महानता को मैं गाता हूं।।

महादेव ने पूरा हृदय निकाल के हमारे सामने रख दिया है।। सत्य प्रकट करने का समय आए तो साधुता को बरकरार रखते हुए मुखर हो जाओ! ऋषि के मुख से रुचा और मुनि के मुख में रूत होगा फिर ग्रंथ महात्म्य,ग्रंथ परिचय में सात कांड,हर एक कांड की वंदना और पंचदेवों की वंदना के बाद गुरु वंदना का गान किया और सभी वंदनाओं को लेते हुए हनुमंत वंदना के गान करते हुए आज की कथा को विराम दिया गया।।

 

कथा-विशेष

वर्तमान योगी सरकार जीसे फिर पौराणिक नाम अग्रवन देने जा रही है वह आग्रा का पौराणिक इतिहास।।

आग्रावके बारे में कुछ रोचक तथ्य,अध्यात्म,पौराणिक एवं धार्मिक और ऐतिहासिक बातें भी है:

आग्रा का प्राचिन नाम अग्रवन(जो वर्तमान योगी सरकार फीर वो नाम रखने शायद जा रही है) या अग्रवान है।।

१-पौराणिक कथा:

महाभारत में आग्रा का उल्लेख अग्रवन नाम से मिलता है।।ये अपने समय में शूरसेन राज्य के अंदर था और यहीं कंस का बंदीखाना था।।

ब्रज के १२ प्रसिध्ध वनों में से एक अग्रवन है।

मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रज में ९१ वन थे,इसमें ये ८४ वें नंबर पर था।।

और कुछ ग्रंथो में १३७ वन भी बताये गये है।।

आज युपी सरकार सुप्रिम कॉर्ट के निर्देश पर पौराणिक वनों को फिर से जीवित करने का १० साल का मास्टर प्लान बना रही है।।

कहा जाता है कि आर्य लोग जब भारत आये तो उन्होने ५ जगह बस्ती बसाइ इसमें से एक आग्रा था।जीसे ‘आर्यगृह’ भी कहते थे।आर्यगृह/अग्रवन से आग्रा का नाम पडा़।

२-नाम कैसे पडा:

इतिहास कारों के ३ प्रमाण है:

अ-अगर/नमक से:आग्रा में नमकीन,खारी मीट्टी में नमक बनाने का बडा काम होता था।’अगर’ का मतलब होता है-नमक का मैदान।इसलिये अगर आग्रा देखो तो आज भी आग्रा में ‘नमक की मंडी’ नाम का बाजार है।जो मुगल काल से है।।

ब-ञुषी अंगिरा:कहा जाता है कि यहां ञुषी अंगिरा का आश्रम था।इसलिये इस क्षेत्र को अंगिरा क्षेत्र कहते है जो धीरे धीरे आग्रा बन गया।।

क-आगे वालां:सिकंदर लोदी जब दिल्ही से ग्वालियर जा रहा था तो यमुना के रास्ते यहां पहुंचा,और आगे राह कहते कहते आग्रा नाम पड गया।।

३-सच इतिहास क्या है?

हिन्दु पौराणिक कथाओं के मुताबिक प्राचिन काल में आग्रा का नाम अग्रवन था और आर्यों का निवास स्थान था।

लेकिन आधुनिक  इतिहास में इसका कोइ पक्का सबूत नहि मिला है।

डॉ भीमराव आंबेडकर युनिवर्सिटी-आग्रा विभाग के हेड प्रो.सुगम आनंद ने कहा था कि ऐतिहासिक रेकॉर्ड्स में आग्रा को अग्रवन कहने का कोइ प्रमाण नहि मिलता।।

मुगल काल में अकबर ने उसे अकबराबाद नाम दिया था,लेकिन अकबर की मृत्यु के बाद फिर से आग्रा नाम हो गया।।

तो संक्षिप्त में धार्मिक ग्रंथो में आग्रा-अग्रवन-ब्रज का एक पवित्र वन है।लेकिन सरकार इतिहास की किताबों में आग्रा नाम १००० साल से भी ज्यादा पुराना माना जाता है।।

== समाप्त ==

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