Homeगुजरातकूल, कूख और कूप-तीनों साधु है वह सबबिधि साधु है।।

कूल, कूख और कूप-तीनों साधु है वह सबबिधि साधु है।।

प्रेम परीक्षा नहीं करता जन्म-जन्म प्रतिक्षा करता है।।

कथा मन को स्थिर करने के लिए नहीं,मन को शुद्ध करने के लिए है।।

रामचरित मानस में बहुधा ऋषि गृहस्थ है।।

ऋषि प्रतिष्ठा और मुनि निष्ठा के लोग हैं।।

ऋषि और मुनि को मिलाते हैं तो परम साधु,सब बिधि साधु बनता हैं।।

ब्रज मंडल के पौराणिक वनों में जो अव्वल है ऐसे अग्रवन-आग्रा की पावन भूमि पर बुधवार सुबह रामकथा के दूसरे दिन कुछ जिज्ञासा आई थी उसे रखते हुए बापु ने बताया कि:रामचरितमानस में ऋषि कम है और मुनि शब्द का ७०० से ज्यादा बार प्रयोग हुआ है।।

यहां श्रेष्ठ,निम्न,जाति वर्ण भेद में मत जाना।ऋषि और मुनि के भेद में न जाइए वर्ना अपराध हो जाएगा।।बहुधा ऋषि गृहस्थ है।वशिष्ठ के आश्रम के बारे में मुनि शब्द से माहिती नहीं मिलती,लेकिन यह ऋषि शब्द से माहिती मिलती है।।जहां गुरु गृह  शब्द है यद्यपि आश्रम है।गृहस्थाश्रम समझ लीजिए

गुरु गृह पढन गये रघुराई।

अल्पकाल विद्या सब आई।।

ऋषि बहुधा गृहस्थ होते हैं।।

वशिष्ठ और अरुंधती गृहस्थ है।सो संतान के माता-पिता है।।पूर्ण गृहस्थाश्रम है।।वाल्मीकि गृहस्थ नहीं है।लेकिन वाल्मीकि का आश्रम है वहां जानकी जी सगर्भा स्थिति में जाती है तब अपने मायके आई ऐसा लगता है।।

भारद्वाज गृहस्थ नहीं है।भारद्वाज के आश्रम के बारे में संकेत है।।कुंभज-अगस्त्य और लोपामुद्रा गृहस्थ है।अत्रि और अनसूया भी गृहस्थ है।।याज्ञवल्क्य गृहस्थ है।।मैत्रेयि और कात्यायिनी-दो पत्नी है।। हर प्रकार से संपन्न है।।

यह सातों ऋषि का विशेष प्रागट्य स्थान है। वाल्मीकि का प्रागट्य वल्मीक- मिट्टी का ढेर-गुजराती में राफडा़ से हुआ है।।यद्यपि प्रचेता की संतान है।।वशिष्ठ ब्रह्मोदभव है। ब्रह्मा के मानस पुत्र है।।विश्वामित्र गाधि राजा के पुत्र।।

फिर राजर्षि,ब्रह्मर्षि ऐसा भी हुआ है।क्षत्रिय कुल में प्रकट हुए हैं।।अत्रि महाराज गुणातित अवस्था में प्रगटे हैं।।कुंभज कुंभ-घडे से प्रगटे हैं।।विशेष स्थान से प्रगटे ।फिर भी यह अंतिम निर्णय नहीं।यह इति नहीं केवल वार्तालाप है।।

सामने मुनि वानप्रस्थी है,गृहस्थ नहीं है।।कुंभज रिषी भी है मुनि भी है।। तो यह एझ इट इझ-दर्शन है। वर्ण,जाति के रूप में ऋषि मुनियों को मत लेना।। एक वर्ण ब्राह्मण एक वर्ण साधु है।।केवल चेतना को परखना।।ऋषि प्रतिष्ठा और मुनि निष्ठा के लोग हैं।। ऋषि की पांच प्रतिष्ठा दिखती है।।आपके मन में यह रसायन आए तो ही स्वीकार करना।।जैसे बुद्ध ने सूत्र दिए की आपका आत्मा स्वीकार करें तो ही मानना।।रिषी की पांच प्रकार की प्रतिष्ठा होती है, और होनी चाहिए:एक-राज्य प्रतिष्ठा।दो-लोक प्रतिष्ठा।तीन-वेद प्रतिष्ठा।चार-धर्म प्रतिष्ठा।पांच कर्म प्रतिष्ठा।।जो सक्रिय है वह ऋषि है।कर्म के द्वारा प्रतिष्ठित है।।

मुनि प्रतिष्ठा से असंग है,अधिकारी जरूर है।। मुनियों की पांच निष्ठा होती है:एक-ईष्ट में निष्ठा।

दो-नाम निष्ठा।तीन-आत्म निष्ठा।चार-गुरु निष्ठा।

पांच-ग्रंथ निष्ठा।।

ऋषि और मुनि को मिलाते हैं तो परम साधु,सब बिधि साधु बनता हैं।।एक गृहस्थ है एक विरक्त है लेकिन कोई निम्न या श्रेष्ठ नहीं है।सब प्रणम्य है।

जासु कथा कुंभज ऋषि गाई।

भगति जासु में मुनि ही सुनाई।।

वहां कुंभज ऋषि और मुनि दोनों रूप में दिखते हैं। ऋषियों में राजर्षि,देवर्षि,महर्षि भी होते हैं। लेकिन ज्यादा शब्द ब्रह्मर्षि है।।आप वर्ण संकीर्णता में न जाए तो ब्राह्मण ऋषि है।जरा भी वर्णसंकर्ता पैदा ना हो-यह शब्द स्वामी रामसुखदास जी महाराज के हैं गीता जी में जितने भी लक्षण है वो जहां मिले वह ब्राह्मण है।चाहे ब्रह्म कूल में चाहे अन्य कूल में या अजन्मा भी हो।।वर्ण जन्म से नहीं कर्म से होता है। फिर भी जन्म का महत्व जरूर है।।

जैसे भरत का कूल भी साधु है,कूख भी साधु है और कूप भी साधु है-वह सबबिधि साधु है।।

रघुकूल,कैकई की कूख और भरत कूप।।

प्रेम परीक्षा नहीं करता जन्म-जन्म प्रतिक्षा करता है कथा मन को स्थिर करने के लिए नहीं,मन को शुद्ध करने के लिए है।।

रामकथा के तेहि अधिकारी।

जिनके संत संगति अति प्यारी।।

जैसे सत्यनारायण की कथा में आखिर में प्रसाद होता है।रामनाम का कीर्तन यह कथा का प्रसाद है हनुमंत वंदना के बाद राम के अवतार कार्य में सहयोग किया वो सबके चरणों में तुलसी जी ने प्रणाम वंदना की।।

बाद में सीता राम जी की वंदना की।।

बार-बार तुलसी जी के पीछे पड़ गए लोग कहते हैं तुलसी की नारी निंदक है! लेकिन गुरु की वंदना में श्री शब्द लगाया है। वहां श्री का मतलब सीताजी है श्री संप्रदाय भी है।।जहां सीताराम जी की वंदना की गई।।नारी के तीन रुप हमारी धारा ने देखे हैै

दक्ष के वहां जन्मी बेटी के लिये लिखा है:

उमा अंबिका भवानी।

हमारी धारा में मध्य का बडा महत्व है।उमा पुत्री के रुप में,अंबिका माता के रुप में और भवानी शिव पत्नि के रुप में।।

यहां सिताराम जी की वंदना में लिखा है:

जनक सुता जग जननि जानकी।

अतिसय प्रिय करुणा निधान की।।

मध्यमें मातृ शरीर का बहूत महत्व दिया गया है।।

भगवान बुध्ध ने भी मध्यम मार्ग का बडा आदर किया है। तो यहां दिखाते हैं तुलसी जी ने नारी को आगे रखा है और वंदना की है।।हमारी इस धारा में मध्य का बड़ा आदर किया है।।जैसे बुद्ध ने भी किया है।।मां मध्य में है।।

नाम की वंदना,नाम महिमा के पूरे प्रकरण की कुछ पंक्तियों का गान करते हुए राम नाम का सार और नाम महाराज का महत्व दिखाकर आज की कथा को विराम दिया गया।।

== समाप्त ==

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