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एएससीआई की स्टडी के अनुसार कंटेंट और कॉमर्स की एक मिली-जुली दुनिया में जी रही है ‘जेन अल्फा’

एएससीआई की ‘व्हाट द सिग्मा?’ स्टडी बताती है कि ‘जेन अल्फा’ कैसे एक ऐसी दुनिया का हिस्सा बन रही है और उससे प्रभावित हो रही है, जहाँ विज्ञापन, मनोरंजन और पहचान के बीच का अंतर लगभग खत्म हो चुका है।

मुख्य बातें:

जेन अल्फा के जीने के तौर-तरीके और भाषा पूरी दुनिया में एक जैसे हैं, लेकिन बड़ों को ये अक्सर दिखाई या समझ नहीं देते।

इस पीढ़ी के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दो अलग दुनिया नहीं, बल्कि एक ही हैं। फोन उनके लिए सिर्फ एक डिवाइस नहीं, बल्कि वह जगह है जहाँ वे अपनी असल जिंदगी जीते हैं।

छोटे बच्चे (7-12 साल) सीधे तौर पर दिखने वाले विज्ञापनों को तो आसानी से पहचान लेते हैं, लेकिन उनके पीछे छिपे कमर्शियल इरादों (जैसे ब्रांड का कोई छिपा हुआ मैसेज) को नहीं पकड़ पाते। वहीं बड़े बच्चे (13-15 साल) विज्ञापनों को लेकर ज्यादा समझदार हैं, फिर भी कहानियों से जुड़ी ब्रांडिंग के सामने वे कमजोर पड़ जाते हैं।

यह स्टडी एक जिम्मेदार मार्केटिंग सिस्टम बनाने के लिए प्लेटफॉर्म्स, क्रिएटर्स, विज्ञापनदाताओं, माता-पिता और स्कूलों की साझा भागीदारी की मांग करती है, ताकि बच्चों तक पहुँचने का तरीका पारदर्शी और सही हो। 

मुंबई | 17 मार्च 2026 — छोटे वीडियो अब व्लॉग्स में घुल-मिल गए हैं, जो आगे चलकर गेमप्ले में बदल जाते हैं और फिर ऐसा स्पॉन्सर्ड कंटेंट सामने आता है जो किसी दोस्त की सलाह जैसा लगता है। यहाँ स्क्रीन कभी बंद नहीं होती। जेन अल्फा डिजिटल स्ट्रीम को सिर्फ देखती नहीं, बल्कि उसी के भीतर रहती है। यह वह हकीकत है—जो पूरी तरह से डिजिटल दुनिया में डूबी और कमर्शियल रूप से सक्रिय है—जिसे एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) एकेडमी ने समझने की कोशिश की है।

‘फ्यूचरब्राण्ड्स कंसल्टिंग’ के साथ मिलकर एएससीआई एकेडमी ने ‘व्हाट द सिग्मा?’ नाम की एक अनोखी रिसर्च स्टडी जारी की है। यह अध्ययन 7 से 15 साल के बच्चों (जेनरेशन अल्फा) पर केंद्रित है, जिसमें देखा गया है कि वे इस हाइपर-डिजिटल माहौल में मीडिया और कंटेंट से कैसे जुड़ते हैं और कमर्शियल मैसेज को कैसे पहचानते व समझते हैं।

‘एएससीआई एडट्रस्ट समिट 2026’ में पेश की गई यह स्टडी छह भारतीय शहरों में की गई गहन रिसर्च पर आधारित है। इसमें घरों में जाकर इंटरव्यू लिए गए और भाई-बहनों व दोस्तों के बीच की बातचीत को समझा गया। साथ ही माता-पिता, शिक्षकों, काउंसलर्स, मनोवैज्ञानिकों, मार्केटर्स और किड-इन्फ्लुएंसर्स के साथ विस्तार से चर्चा की गई।

यह स्टडी बच्चों के कंटेंट और विज्ञापनों के साथ जुड़ाव के अलग-अलग पहलुओं की पड़ताल करती है। साथ ही यह भी समझती है कि माता-पिता, शिक्षक, विज्ञापनदाता और एल्गोरिदम बच्चों के डिजिटल एक्सपोज़र को किस तरह प्रभावित करते हैं।

एएससीआई की सीईओ और सेक्रेटरी जनरल मनीषा कपूरने कहा, “एएससीआई एकेडमी की स्टडी ‘व्हाट द सिग्मा?’ जेनरेशन अल्फा की डिजिटल लाइफ की एक जांच है—उन्हें जज करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर ढंग से समझने के लिए। उनके कल्चरल रेफरेंस पॉइंट्स पिछली पीढ़ियों से बिल्कुल अलग हैं। विज्ञापन को वे कैसे देखते हैं, यह जानकारी जिम्मेदार जुड़ाव के नए फ्रेमवर्क बनाने की दिशा में पहला कदम है, क्योंकि वे अभी हमारे देश के सबसे कम उम्र के मीडिया कंज्यूमर्स हैं। हमारा मकसद सभी स्टेकहोल्डर्स के बीच एक ऐसी सहयोगी बातचीत शुरू करना है, जो क्रिएटिविटी और जिम्मेदारी के बीच सही संतुलन बनाए रखे।”

स्टडी में सामने आईं पाँच प्रमुख बातें: 

  1. अलग-थलग होती पीढ़ी :जेन अल्फ़ा इंटरनेट के साथ बड़ी नहीं हो रही है, बल्कि वह इसके ‘अंदर’ ही बड़ी हो रही है। उनके रहन-सहन के तरीके, पसंद और भाषा पूरी दुनिया में एक साथ बदल रहे हैं। यह सब इतनी तेज़ गति से हो रहा है कि बड़े लोग अपने बच्चों की इस डिजिटल दुनिया को समझ ही नहीं पा रहे हैं। उनके संदर्भ बड़ों के लिए अनजान हैं और उनका ह्यूमर (मजाक) समझना कठिन है। फिर भी, मुंबई या वाइज़ैग के किसी बच्चे के लिए ये बातें उतनी ही स्वाभाविक और साझा हैं, जितनी कभी खेल के मैदान के खेल हुआ करते थे।
  1. बड़ों के प्रभाव में कमी : जैसे-जैसे माता-पिता और शिक्षक बच्चों की डिजिटल दुनिया से कट रहे हैं, उसकी जगह ‘एल्गोरिदम’ ने ले ली है। कभी न थकने वाला और बच्चों की पसंद को बारीकी से समझने वाला यह ‘फीड’, उनके दैनिक जीवन का सबसे प्रभावशाली हिस्सा बन गया है। माता-पिता खुद को ऐसी स्थिति में पाते हैं जहाँ वे स्क्रीन टाइम और डिजिटल उपभोग के नियम तो बना रहे हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि इन्हें लागू कैसे किया जाए। वे इस बात को लेकर भी अनिश्चित हैं कि इस धुंधले परिदृश्य में बच्चों के लिए क्या सही है और क्या गलत।
  1. समाज के रूप में डिजिटल :जेन अल्फ़ा पूरी तरह ऑनलाइन रहती है। उनके लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दो अलग दुनिया नहीं हैं, बल्कि ये मिलकर एक निरंतर चलने वाली हकीकत बनाते हैं। डिजिटल कंटेंट अब उनकी सोच को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा जरिया बन गया है। फोन उनके लिए कोई उपकरण नहीं है जिसे वे कभी-कभार उठाते हों, बल्कि वह एक ऐसा स्थान है जहाँ वे अपनी जिंदगी जीते हैं।
  1. कंटेंट का असीमित संसार : कंटेंट अब एक ऐसा ब्रह्मांड बन गया है जिसकी कोई तय सीमा नहीं है। विज्ञापन, मनोरंजन और व्यापार—ये सब मिलकर शॉर्ट्स, मीम्स, व्लॉग्स और गेम्स की एक ऐसी धारा बन गए हैं जिन्हें एक-दूसरे से अलग करना नामुमकिन है। जेन अल्फ़ा यह नहीं चुन रही है कि उन्हें क्या देखना है, बल्कि वे उस ‘फीड’ के भीतर ही रह रहे हैं। बच्चे अपनी मर्जी से कुछ चुन रहे हैं या बस उसे बिना सोचे-समझे देख रहे हैं, इसके बीच का अंतर अब खत्म हो गया है।
  1. विज्ञापनों को पहचानने में धुंधलापन : छोटे बच्चे (7-12 साल) केवल उन्हीं विज्ञापनों को पहचान पाते हैं जो बिल्कुल सीधे तौर पर दिखते हैं। इन्फ्लुएंसर प्रमोशन, गेमिंग के बीच आने वाले विज्ञापन और व्लॉग स्पॉन्सरशिप उन्हें सिर्फ मनोरंजन की तरह लगते हैं। बड़े बच्चों (13-15 साल) में विज्ञापनों की समझ थोड़ी बेहतर हुई है, फिर भी वे अपनी पसंद या किसी कहानी में घुले-मिले ब्रांड संदेशों को नहीं पकड़ पाते। लगातार चलने वाली इस मीडिया स्ट्रीम में, क्या विज्ञापन है और क्या नहीं, इसमें फर्क करने की क्षमता सभी स्तरों पर कम देखी गई है।

फ्यूचरब्रैंड्स कंसल्टिंग के संस्थापक और निदेशक संतोष देसाईने कहा, “पिछली पीढ़ियों के लिए डिजिटल मीडिया सिर्फ एक जरिया था, लेकिन इस पीढ़ी के लिए यह वह दुनिया है जिसमें वे अपनी पूरी जिंदगी जीते हैं। कंटेंट के साथ उनका रिश्ता बहुत निजी और सीधा है, जिसे माता-पिता और बड़े शायद पूरी तरह समझ नहीं पा रहे हैं। इस रिपोर्ट में न केवल यह देखा गया है कि वे क्या देखते हैं, बल्कि यह भी कि एल्गोरिदम, कंटेंट और विज्ञापन उनकी सोच को कैसे गढ़ रहे हैं। यह रिपोर्ट जेन अल्फा की वास्तविकताओं को समझने की एक कोशिश है, ताकि यह तय किया जा सके कि एडवर्टाइजिंग इकोसिस्‍टम में बच्चों की सुरक्षा के लिए किस तरह के मजबूत घेरे बनाने की ज़रूरत है।”

समस्या से समाधान की ओर: रिपोर्ट में सुझाए गए चार रास्ते

यह रिपोर्ट एक ऐसे व्यावहारिक और सिद्धांतों पर आधारित दृष्टिकोण का प्रस्ताव करती है, जिसमें स्कूलों सहित पूरे इकोसिस्‍टम की भागीदारी हो। इसके लिए चार मुख्य रास्ते सुझाए गए हैं:

  • सार्वभौमिक संकेत:पूरे इकोसिस्‍टम को विज्ञापनों या कमर्शियल इरादों को दर्शाने के लिए आसान और यूनिवर्सल संकेतों पर काम करना चाहिए। ऐसे डिजाइन तैयार करने चाहिए जिससे बच्चे उस विज्ञापन या ब्रांड मैसेज को आसानी से पहचान सकें, जो अभी उन्हें दिखाई नहीं देता।
  • पूरे इकोसिस्‍टम की साझा जिम्मेदारी:विज्ञापनदाताओं, प्लेटफॉर्म्स, क्रिएटर्स, स्कूलों और माता-पिता—सबकी भूमिका तय होनी चाहिए। कोई भी एक पक्ष अकेला बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता, इसके लिए सबका साथ आना ज़रूरी है।
  • भविष्य के लिए तैयार सुरक्षा उपाय:सुरक्षा और बेहतरी से जुड़े टूल्स, जैसे कि ‘पैरेंटल कंट्रोल’, को केवल सेटिंग्स के विकल्प के तौर पर नहीं रखना चाहिए। इसके बजाय, इन्हें सीधे बच्चों के कंटेंट देखने के अनुभव का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
  • स्कूलों में मीडिया और विज्ञापन साक्षरता:स्कूलों में औपचारिक शिक्षा के माध्यम से बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से मीडिया साक्षरता दी जानी चाहिए। उन्हें यह समझना सिखाना होगा कि विज्ञापन कैसे काम करते हैं और उनके पीछे का व्यावसायिक इरादा क्या होता है।

पूरी रिपोर्ट यहां उपलब्‍ध है- [LINK]

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