
राम मृत्यु भी है, जीवन भी है।।
जो हनुमान राम को वश में रखते हैं, आज हनुमान जी को वश में करने के प्रयत्न चल रहे हैं!
रामकथा अमृत है।।
शिव मृत्यु है, शिवकथा अमृत है।।
ज्ञान में पहले जानना होता है, प्रेम में मान लिया जाता है।।
व्यासपीठजीवनपीठ है।।
भारत के आखिरी राज्य केरलम् की प्रकृति से हरी भरी भूमि कोच्चि से प्रवाहित रामकथा का मंगलवार चौथा दिन,बहुत सी जिग्नाषायें आई थी।वहां से शुरू करते हुए बापू ने कहा कि एक प्रश्न पूछा गया है:बापू!आप मृत्युलोक का महिमा गान कर रहे हो, मृत्यु को महोत्सव कह रहे हो।सुनने में अच्छा लगता है,वर्णन करने में अच्छा लगता है,लेकिन स्विकार करना मुश्किल है।।
बापू ने बताया कि हमारे जूनागढ़ के कवि जो अब नहीं रहे,श्याम साधु-जब मैं कुछ दिन वीरपुर में ठहरा था तो मिलने आए थे।नादुरस्त तबीयत थी और वह कह रहे थे की मृत्यु पर बहुत सोचा,बहुत बातें की,रचनायें की,लिखा,सम्मेलन में प्रस्तुत किया लेकिन मृत्यु दिखती है तब डर लगता है।।बापू ने कहा कि यह स्विकार को सलाम।हम गहराई से मृत्यु पर सोचे।। पार हो जाना,छलांग लगाकर लांघ लेना,मृत्यु को पी जाना,मृत्यु का मंथन करना-यह सब रामचरितमानस के एक-एक व्यक्ति ने किया है लेकिन यह स्विकार करने के लिए मुश्किल है।।
बापू ने प्रश्न पूछा कि भगवान कृष्ण को आप परमात्मा मानते हो?सनातन-वैदिक धर्म के विरोधी है तो ना मानते होंगे। लेकिन सब मानते हैं कृष्ण साक्षात भगवान है,परमात्मा है।।ज्ञान में पहले जानना होता है,प्रेम में मान लिया जाता है।।वह कृष्ण आपके घर आए,जिस रूप में आए। हम स्वागत करेंगे।।बंसी लेकर आये, सुदर्शन लेकर या पीतांबर पहन कर आए।कोई भी रूप में हम स्वागत करेंगे।।वही कृष्ण मृत्यु के रूप में आपके घर आएंगे तो स्विकार कर लेंगे।। तब कृष्ण जीस रूप में आए स्वागत।।गीता में कहा है मैं अमृत भी हूं मृत्यु भी मैं हूं।।इस मृत्युलोक में कृष्ण मृत्यु भी है,अमृत भी है याद रखना। कृष्ण मृत्यु भी है,शास्त्र प्रमाण है, किसको कृष्ण किस रूप में दिखे वह भागवत में लिखा है।।कृष्ण मृत्यु है,लेकिन कृष्णकथा अमृत है वह और लोक में ब्रह्म और परब्रह्म के रूप में होंगे लेकिन मृत्यु लोक में कृष्ण मृत्यु बनकर आए।। यदि आए तो स्विकार करना पड़ेगा।पहले थोड़ी तैयारी करनी पड़ेगी। क्योंकि मृत्यु वेडिंग है,शादी है ऐसा रूमी कहता है।।
राम को आप ईश्वर मानते हैं?राम अपने घर आ जाए राम ब्रह्म,पर ब्रह्म,परात्पर तत्व है। राम मृत्यु भी है राम जीवन भी है।। शास्त्र कहता है रामकथा अमृत है।।
मुझे दादा ने जो कहा था व्यास पीठ पर कथा करने जाओ तो शंकर के हृदय में जो कथा है वहां जीव से पोथी निकाल कर जीवन में लाना।जीव से निकाल कर जीह्वा और जीह्वा से जीवन में पोथी को लानी पड़ती है।।व्यासपीठजीवनपीठ है।।
सनातन धर्म को तोड़ने के लिए बहुत प्रयत्न चल रहे हैं, बापू ने कहा कि जो हनुमान राम को वश में रखते हैं,आज हनुमान जी को वश में करने के प्रयत्न चल रहे हैं!
शंकराचार्य,विवेकानंद,गांधी जी,नरसिंह महेता, टॉलस्टॉय को अपनी नात से बाहर रखने के प्रयास हुए।।शंकराचार्य परम पूज्य भी है परम प्रिय भी है। साधु का लक्षण स्विकार और दूसरा साधु का लक्षण किसी से तकरार नहीं।।किसी से क्या अपनी तकदीर से भी तकरार नहीं।।
भगवान शंकर को मानते हो? शंकर मृत्यु है।शिवकथा अमृत है।। मृत्यु लोक में यह तीनों आए हैं तो मृत्यु का स्विकार कैसे करें?श्रवण श्रृंगार है। पहले सुनो।श्रवण से समर्पण भाव आता है। मरण के बाद शरण परम बुद्ध पुरुष के पास पहुंचा देता है मरण के बाद जो बचता है वह संस्मरण है।। किसी की शरण में जाने से मृत्यु अमृत बनेगी।।
एक मंत्र:प्रमादीमध्यान्ह…..- जहां कहते हैं आप ही आदि,आप ही मध्य और आप ही अंत है।।दूसरे रूप में आप आदि नहीं अनादी है,मध्य भी नहीं और आपका अंत भी नहीं।यह महादेव को लागू पड़ता है जैन मुनि बता रहे थे कभी आरंभ में संशय होता है और धीरे-धीरे श्रद्धा में परिवर्तित होता है।। कभी आरंभ में श्रद्धा और अंत में संदेह होने लगता है। किसी को आरंभ मध्य और अंत में संदेह ही रहता है और किसी को आरंभ मध्य और अंत में श्रद्धा ही रहती है।।तो यह मंत्र हमें कहता है ऐसे महादेव का आश्रय करो तो मृत्युलोक से मुक्त हो जाओगे।।
प्रेम का मूल क्या है?शब्द प्रेम का मूल है।।मन राग को,बुद्धि वैराग को,चित् योग को,अहंकार रोग को जन्म देता है।।हृदय अनुराग को जन्म देगा।। मृत्यु लोक से पहले महामंत्र अस्तित्व में आया और मंत्र हा लोक का सर्जन करता है।।
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