Homeगुजरातसिध्ध संकल्प में नहि, शुध्ध संकल्प में मेरी रुचि है।

सिध्ध संकल्प में नहि, शुध्ध संकल्प में मेरी रुचि है।

एक साधु के नाते हमारा संकल्प जागृत या सुषुप्त अवस्था में कायम शुद्ध रहना चाहिए।।

सिद्ध संकल्प के बाद परचें आते हैं फिर लोग वाह वाही करते हैं।।

परचों में आदमी अंध हो जाता है,परिचय में सब कुछ देखने लगता है।।

शब्द औषधि है।।

जिनके हाथ कोई दान के लिए आगे नहीं बढा हो उनका हाथ शुद्ध भी है सिद्ध भी है।।

हमारी जूबॉं हक के बगैर का खाकर जल रही है।।

किसी का दर्शन औषधि है,यह चमत्कार नहीं और रस भी औषधि है।।

अमुक प्रकार की गंध भी औषधि है।।

रामकथा में राम जन्म की चौपाइयां गुंजी और त्रिभुवन को राम जन्म की बधाइयां दी गइ।।

स्वयंभूजडेश्वर महादेव मंदिर सगापरा धार पालिताणा से चल रही रामकथा शुक्रवार सांतवें दिन में प्रवेश कर रही है तब यहां की तपोभूमि की प्रगट-अप्रगटचेतनाओं और संतोमहंतो,आचार्य भगवंतों को प्रणाम करते हुए बापु ने बताया कि परचों और परिचय की भूमि पालीताणाहै।।विष्णुसहस्त्रनाम में एक मंत्र है वहां संकल्प शब्द का उल्लेख हुआ है।सिद्ध संकल्प शब्द लिखा है।। महाभारत अंतर्गत विष्णु सहस्त्रनाम और शुक्ल यजुर्वेद में पूरा स्तवन भी मिलता है।।

लोग हंमेशा बोलते रहते हैं कि फलां आदमी का संकल्प सिद्ध हुआ या तो मेरा संकल्प सिद्ध हुआ।। संकल्प सिद्ध होता है,अच्छी बात है लेकिन मेरा संकल्प सिद्ध हो इसे भी बेहतर मेरा संकल्प शुद्ध हो ऐसा हम सोच सकते हैं।।संकल्प सिद्ध करने की एक प्रक्रिया है।।साधना में सात मुद्दे है।लेकिन संकल्प सिद्ध करने में मेरी रुचि नहीं।।एक साधु के नाते हम संकल्प जागृत या सुषुप्त अवस्था में कायम शुद्ध रहना चाहिए।।सिद्ध संकल्प के बाद परचें आते हैं फिर लोग वाह वाही करते हैं।।परचों में आदमी अंध हो जाता है परिचय में सब कुछ देखने लगता है अध्यात्म जगत में परचे भी बहुत है वह मैं कबूल करूं लेकिन छोटे बड़े पर्चे अध्यात्म के लिए बहुत सामान्य बात है।।दिलीपरॉय जैसे विद्वान तो कह गए की चमत्कार आज भी होते हैं।।विदुषी महिला विमल ताई ठाकर ने कहा कि उनके कान की बीमारी जीदू कृष्णमूर्ति ने केवल हाथ रखकर ठीक कर दी थी।।

शब्द औषधि है।।जिनके हाथ कोई दान के लिए आगे नहीं बढा हो उनका हाथ शुद्ध भी है सिद्ध भी है।।हमारीजूबॉं हक के बगैर का खाकर जल रही है हमारी आंखें अन्य स्त्रियों में नजर बिगाड़ कर जल गई है तो मंत्र कैसे फलेगा! ऐसा शास्त्र कहते हैं।। किसी का दर्शन औषधि है,यह चमत्कार नहीं और रस भी औषधि है।।अमुक प्रकार की गंध भी औषधि है।।

रणछोड़ गिरि बापू दिगंबर रहते और श्मशान में पड़े रहते थे।।एक बार भैरवनाथ बाबा के दर्शन करने के लिए रणछोड़ गिरी जाते हैं। इस वक्त महाराजा साहब और महारानी भी दर्शन करने के लिए आए और दिगंबर को देखकर महाराज ने कहा कि यहां जाहिर में नग्न दिगंबर शोभा नहीं देता।।और रणछोड़ गिरी बापू ने कोई जवाब नहीं दिया।।लेकिन महाराज ने एक सॉल मंगा कर दी और कहा कि यह पहन लो।। बापु दर्शन होने के बाद फिर दूर खड़े थे महाराजा निकले और वह देख ऐसे ही रणछोड़ गिरी बापू ने सॉल आकाश में फेंक कर जला दी! सॉल को जला दे वह बड़ा की कोई किसी को सॉल पहना है वह बड़ा? सिद्धि में सब शक्यहै।।लेकिन रणछोड़ गिरी बापू ने सॉल इसलिए जला दी वो किसी और को साधु बड़ा कर दिखाता है।।

निजामाबाद में अकाल पड़ा।वहां का नवाब अमजद अली ने अपने सभी धर्मगुरुओं को बुलाकर कहा की प्रार्थना करो,जब तक बारिश ना हो प्रार्थना करो। और एक साल हो गया। सब थक गए लेकिन बारिश नहीं पड़ती थी।।उसी वक्त वहां से समर्थ स्वामी रामदास निकले।।सब ने कहा कि हम थक गए हैं। कुछ करो वरना राजा हमें छोड़ने वाला नहीं।। तब स्वामी रामदास जी ने एक पत्थर पर हनुमान जी का चित्र अंकित किया और सफेद चादर रख कर कहा कि अब मंत्र बोलो और एक ही घंटे में अनराधार बारिश हुई।। यह सिद्ध का पर्चा नहीं साधु का सीधा परिचय है।।इसीलिए मैं इस भूमि को परिचय की भूमि कहता हूं।।शुद्धि भी जरूरी है लेकिन सिद्धि के लिए प्रक्रिया में से पसार होना है तो सात सोपान है मेरी रुचि शुद्ध संकल्प में है,सिद्ध संकल्प में नहीं।। एक-हो सके उतना एकांत का सेवन करो।ये कठिन है अथवा भजन करते-करते ऐसा स्वभाव कर दो की भीड़ में भी हमारा एकांत बचा रहे।। दो-मौन रहो। तीन-प्राण बल बढ़ाओ।रंगअवधूतनारेश्वर के संत और पूज्य मोटा ने भी यह प्रयोग किए हैं।।चार अपने मन को सद्गुरु की रज से निर्मल रखो। पांच देह शुद्धि भी जरूरी है।।छह-चित् की एकाग्रता रखो सात- अहंकार ना करो।। साधु को परचे के बदले सीधा अपना परिचय देना चाहिए।।

यहां पार्थ हरियाणी ने एक दीर्घ रचना लिखकर भेजी साधु के बारे में,वह भी बापू ने पठन किया।। और शिव के अनेक संकल्प में एक संकल्प कथा का श्रवण करना। एक संकल्प था राम की निरंतर सेवा करने के लिए शिव में से हनुमान बनने का और राम की बारात में जाने का।। राम का युद्ध देखने का और जब राम राजा बने तब वहां जाकर अनपाईनी भक्ति मांगने का संकल्प था।।

शिव पार्वती के समक्ष राम जन्म के कारणों की कथा कह रहे हैं।।तब वक्ताओं के लक्षण बताते हुए बापू ने संवाद किया और शिव ने कहा कि ईश्वर समर्थ है।किसी कारण बिना भी हो अवतरण कर सकते हैं।। रावण के त्राल से पृथ्वी और देवताओं अकुला गए और प्रार्थना करने के लिए गाय का रूप लेकर गए।। प्रार्थना के बाद प्रतिक्षा हुई और राम, समर्थ,ईश्वर,खुद परमात्मा मनुष्य का रूप लेकर अयोध्या के राजा दशरथ के राजमहल में,मॉं कौशल्या की कूख में अवतरण करते हैं। ईश्वर समर्थ है वह उर में भी रह सकते हैं और उदर में भी रह सकते हैं।। परमात्मा का अवतरण हुआ और माता ने एक छोटे बच्चे की तरह बनाया और मनुष्य तत्व कैसे होता है वह बात करी।।

राम जन्म की चौपाइयों का गान हुआ।सबको बधाइयां बांटी गई और यहां की व्यास पीठ से पूरे त्रिभुवन को राम जन्म की बधाई देते हुए आज की कथा को विराम दिया गया।।

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